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शराबबंदी या कैश स्कीम... महिलाओं की बंपर वोटिंग से NDA दिख रही आगे?

बिहार में महिलाओं ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने 8 फीसदी ज्यादा वोट डाले हैं। आखिर इसकी क्या वजह रही और इसस फायदा किसे हो सकता है? समझ सकते हैं।

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बिहार में वोटिंग के लिए खड़ीं महिलाएं। (Photo Credit: PTI)

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बिहार ने वोटिंग में रिकॉर्ड बना दिया है। आजादी के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव में वोटिंग ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इसमें भी महिलाओं ने तो गजब ही कर दिया। वैसे तो पिछले 3 साल से ही महिलाएं, पुरुषों से ज्यादा वोटिंग कर रही हैं। मगर इस बार तो महिलाओं ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस बार पुरुषों और महिलाओं के वोटिंग प्रतिशत में 8.8% का अंतर रहा है। इससे पहले इतना ज्यादा अंतर 2015 के चुनाव में रहा था।


महिलाओं की बढ़ती वोटिंग को सभी पार्टियां अपनी जीत बता रही हैं। बीजेपी ने दावा किया कि महिलाओं ने सुशासन और विकास के लिए एनडीए के पक्ष में निर्णायक रूप से मतदान किया है।


बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने X पर वोटिंग का डेटा जारी करते हुए दावा किया कि यह ऐतिहासिक बदलाव है। उन्होंने कहा, 'बिहार में महिलाओं ने निर्णायक रूप से मतदान किया है। विकास और सुशासन के विश्वास रखने वाला एम फैक्टर- महिला फैक्टर असली स्विंग फैक्टर बनकर उभरा है।'

 

 

उन्होंने आगे कहा, 'राजनीतिक पंडितों को बिहार की राजनीति को सिर्फ जाति के चश्मे से देखना बंद करना चाहिए।' उन्होंने कहा, 'बिहार की राजनीति का नया व्याकरण जेंडर+गवर्नेंस है।'

 

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कैसा रहा महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत?

चुनाव आयोग ने मंगलवार को बिहार में दोनों चरणों में हुए चुनाव में वोटिंग का आंकड़ा साझा किया था। बिहार में पहले चरण में 121 सीटों के लिए 6 नवंबर को वोटिंग हुई थी। पहले चरण में कुल 65.08% वोटिंग हुई थी। इसमें से 69.04% महिलाएं और 61.56% पुरुषों ने वोट किया था। पहले चरण में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में 7.48% वोटिंग ज्यादा की थी।


वहीं, दूसरे चरण में 122 सीटों के लिए 11 नवंबर को वोट डाले गए थे। कुल मिलाकर 68.76% वोटिंग हुई। 74.03% महिलाओं और 64.1% पुरुषों ने वोट डाले। इस तरह से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 10% ज्यादा रहा।

 

कुल मिलाकर, दोनों चरणों में मिलाकर बिहार में 66.91% वोटिंग हुई। इसमें महिलाओं ने 71.6% और पुरुषों ने 62.8% वोटिंग की। महिलाओं और पुरुषों के वोटिंग प्रतिशत में 8.8% का फर्क रहा।

 

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क्यों ये अपने आप में रिकॉर्ड है?

क्योंकि आजादी के बाद से कई दशकों तक वोटिंग में महिलाएं पीछे ही रहती थीं। 2010 के चुनाव से यह ट्रेंड बदला है। 2010 के बाद से वोटिंग में महिलाएं हर बार पुरुषों को पीछे छोड़ दे रही हैं।


2010 के चुनाव में पहले बार महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट डाले थे। 2010 में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 54.49% और पुरुषों का 51.12% रहा था। इसके बाद 2015 में भी 60.48% महिलाओं और 53.32% पुरुषों ने वोट किया था। 2015 पहला चुनाव था, जब महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 60% से ज्यादा था। इसकी बड़ी वजह सीएम नीतीश कुमार ने 'शराबबंदी' का एलान किया था।


2020 के चुनाव में महिलाओं और पुरुषों के वोटिंग प्रतिशत में लगभग 5 फीसदी का अंतर था। पिछले चुनाव में 59.69% महिलाओं और 54.45% पुरुषों ने वोट किया था।

 

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क्या रही महिलाओं की ज्यादा वोटिंग की वजह?

2015 के विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने शराबबंदी करने का वादा किया था। उनके इस वादे का यह असर हुआ था कि महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 60% के पार चला गया था। कई सीटों पर तो यह 70% से ज्यादा था। 


इस बार भी बिहार के चुनाव में शराबबंदी मुद्दा बना था। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो शराबबंदी हटा ली जाएगी। प्रशांत किशोर के इस वादे को काफी 'साहसिक' माना गया, क्योंकि बिहार में महिलाएं शराबबंदी के पक्ष में रहती हैं।


इसके अलावा, एनडीए की '10 हजारी स्कीम' को भी मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। चुनाव तारीखों के एलान से पहले 26 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' शुरू की थी। उस दिन 75 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये डाले गए थे। इसके बाद 3 अक्टूबर को सीएम नीतीश कुमार ने भी इस योजना के तहत 25 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये डाले। इस योजना के तहत 1 करोड़ महिलाओं को 10-10 हजार रुपये दिए गए। सरकार ने इसके लिए 10 हजार करोड़ रुपये खर्च किए।

 

 

इंडिया ब्लॉक ने एनडीए की इस स्कीम पर सवाल उठाते हुए इसे 'रिश्वत देना' बताया था। हालांकि, बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था। बीजेपी नेताओं का कहना था कि इन पैसों से गरीब महिलाओं को अपना कारोबार शुरू करने में मदद मिलेगी। 


लेकिन क्या सिर्फ इसी कारण महिलाओं की वोटिंग बढ़ी? नहीं। असल में पिछले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में देखा गया है जहां महिलाओं के लिए स्कीम का एलान किया गया है, वहां फायदा मिला है। इसे ध्यान में रखते हुए महागठबंधन ने भी 'माई-बहिन मान योजना' शुरू करने का वादा किया है। इस योजना के तहत जरूरतमंद महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की मदद दी जाएगी। 

 

 

इतना ही नहीं, महागठबंधन के सीएम उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने तो यहां तक एलान कर दिया था कि सरकार बनने के बाद 14 जनवरी को महिलाओं के खाते में इस योजना का पूरे एक साल का पैसा भेज दिया जाएगा। उन्होंने कहा था कि 14 जनवरी के दिन पूरे एक साल का 30 हजार रुपये माताओं-बहनों के खाते में डाल दिया जाएगा।

 

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महिलाओं की ज्यादा वोटिंग से किसे फायदा?

माना जा रहा है कि महिलाओं का ज्यादा वोटिंग करना एनडीए और नीतीश कुमार के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।


लोकनीति-CSDC के पोस्ट पोल सर्वे के मुताबिक, 2020 के चुनाव में 167 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोटिंग की थी। इसमें से 92 सीट एनडीए सीट को मिली थी। जेडीयू ने पिछली बार 43 सीटें जीती थीं, जिसमें से 37 सीटों पर महिलाओं की वोटिंग ज्यादा थी। इसी तरह बीजेपी ने 74 सीटें जीती थीं, जिसमें से 55  सीटों पर महिलाओं ने ज्यादा वोट डाला था।


महिला वोटरों को नीतीश कुमार के पक्ष में माना जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महिलाओं का वोटिंग बढ़ना नीतीश कुमार के पक्ष में जा सकता है। नीतीश कुमार जब से सीएम बने हैं, उसके बाद से हर चुनाव में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत बढ़ा ही है और इसका फायदा उन्हें ही मिला है। इस बार भी ज्यादातर एग्जिट पोल एनडीए की ही सरकार बनने का अनुमान लगा रहे हैं।


खैर, इस बार महिला वोटरों को साधने के लिए एनडीए और महागठबंधन, दोनों ने ही महिलाओं के लिए कैश स्कीम का वादा किया है। अब देखना है कि इस बार महिलाएं किसकी सरकार बनवाती हैं?


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