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मतभेद और बगावत से जन्मी नई पार्टी, क्या है पुडुचेरी के CM रंगासामी की कहानी?

पुडुचेरी के मौजूदा मुख्यमंत्री एन रंगासामी लंबे समय तक कांग्रेस में ही हुआ करते थे लेकिन शरद पवार और ममता बनर्जी की तरह उन्होंने भी अपनी नई पार्टी बनाई।

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एन रंगासामी, Photo Credit: Social Media

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चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश यानी पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव का एलान हो चुका है। सबसे कम चर्चा पुडुचेरी की ही है लेकिन ऐतिहासिक रूप से बेहद अहम इस क्षेत्र की राजनीति कम रोचक नहीं है। मौजूदा वक्त में एक ऐसे दल की सत्ता है जो कांग्रेस से ही टूटकर निकला है। ठीक वैसे ही जैसे ममता बनर्जी ने कांग्रेस से निकलकर तृणमूल कांग्रेस बनाई और वैसे ही जैसे शरद पवार ने कांग्रेस छोड़कर अपनी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी बनाई थी। मौजूदा वक्त में ऑल इंडिया एन आर कांग्रेस (AINRC) के नेता एन रंगासामी पुडुचेरी के मुख्यमंत्री हैं। चौथी बार मुख्यमंत्री पद पर काबिज चल रहे रंगासामी पहली बार इस पद पर जब पहुंचे थे तब वह कांग्रेस के ही नेता थे। बाद में उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई और अब इसी के जरिए सत्ता में हैं।

 

साल 2021 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो कुल 30 विधानसभा सीटों में से रंगासामी की AINRC ने कुल 16 और बीजेपी ने 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। दोनों पार्टियों ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। इसमें से AINRC को 10, भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 6, द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) को 6, कांग्रेस को 2 और 6 निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली थी। इस तरह बीजेपी और AINRC ने मिलकर आसानी से सरकार बना ली थी और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी। इस बार भी कांग्रेस और डीएमके वाले गठबंधन का मुकाबला सत्ताधारी AINRC और बीजेपी के गठबंधन से होना है। 

 

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क्या है रंगासामी की कहानी?

 

साल 2001 से 2008, 2011 से 2016 और 2021 से 2026 तक पुडुचेरी के मुख्यंत्री रहे एन रंगासामी ने साल 2011 में कांग्रेस से नाता तोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी। इससे पहले उन्होंने 1990 के पुडुचेरी विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनाव लड़ा और विधायक बने। तत्तनचावडी विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर वह लगातार चार बार चुनाव जीते और 2011 में कांग्रेस छोड़ने तक इसी सीट से विधायक रहे। 2021 में फिर से इसी सीट से चुनाव जीतकर वह विधायक और मुख्यमंत्री बने हैं।

 

सीएम की कुर्सी तक पहुंचने से पहले यानी 1991 से 2001 के बीच वह तीन अलग-अलग मुख्यमंत्रियों की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे और उनकी खुद की बारी 2001 में आई। 2001 में पी शनमुगम को हटाकर कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था। 2006 का चुनाव जीतने के बाद फिर से उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, 2008 के सितंबर में उन्हें हटाकर कांग्रेस ने वी वैतिलिंगम को मुख्यमंत्री बना दिया था। रंगासामी की नाराजगी की बड़ी वजह यही थी।

 

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बगावत की वजह

 

हुआ कुछ यूं कि रंगासामी के मुख्यमंत्री रहते ही उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी थी। महीने भर की मशक्कत के बाद रंगासामी अपनी सरकार नहीं बचा पाए थे और पार्टी हाई कमान के कहने पर उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना ही पड़ा था। इस्तीफा देते समय उनका कहना था कि वह हाई कमान के संपर्क में थे। उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की थी।

 

दरअसल, मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से ही रंगासामी कांग्रेस से दूर हो गए थे। कांग्रेस ने साफ कहा था कि चुनाव के बाद तय होगा कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा। वहीं, रंगासामी चाहते थे कि उन्हें ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया जाए। जब बात नहीं बनी तो रंगासामी ने कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ अपने विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया। 

 

इस्तीफा देकर अलग हुए रंगासामी ने न सिर्फ पार्टी बनाई बल्कि कई तत्कालीन विधायक भी उनके साथ चले गए। चुनाव हुए और नतीजे आए तो हर कोई हैरान था। नई नवेली AINRC ने सबसे ज्यादा 15 सीटें जीत लीं। वहीं, उनकी पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई। AIADMK को 5, DMK को 2 और एक निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली। इस तरह कांग्रेस छोड़कर भी रंगासामी सत्ता में लौटे और निर्दलीयों की मदद से सरकार बना ली।

 

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2016 आते-आते AIADMK से गठबंधन टूटा और AINRC अकेले ही चुनाव में उतरी। नतीजा यह हुई कि रंगासामी खुद तो सीट बदलकर इंदिरा नगर से जीत गए लेकिन उनकी पार्टी सिर्फ 8 सीटें ही जीत पाई। कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और रंगासामी नेता विपक्ष बन गए। 2021 में रंगासामी ने बीजेपी से गठबंधन किया और आसानी से सत्ता में लौट आए।

 

मौजूदा वक्त में कांग्रेस और डीएमके में पुडुचेरी को लेकर स्पष्ट तौर पर गठबंधन नहीं हो पाया। AINRC और बीजेपी में सीटों की संख्या तो तय हो गई है लेकिन कौन, किस सीट पर लड़ेगा इसको लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। इस बार रंगासामी के सामने चुनौती दोहरी है। उन्हें अपनी पार्टी को मिलने वाली ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करनी होगी, वरना बीजेपी यहां भी बड़े भाई की भूमिका में आ सकती है।


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