कन्नूर: LDF के किले में कैसे सेंध लगा पाएगा UDF? समझिए समीकरण
केरल के विधानसभा चुनाव में कन्नूर जिला लेफ्ट के लिए गढ़ जैसा है। 2021 के चुनाव में ज्यादातर सीटों पर LDF को ही जीत मिली थी।

कन्नूर जिला, Photo Credit: Khabargaon
केरल के नक्शे को अगर उत्तर से दक्षिण की ओर देखा जाए तो कासरगोड के ठीक नीचे जो जिला दिखेगा वही है कन्नूर। समुद्र तट पर बसा कन्नूर जिला कासरगोड के अलावा कोझिको़ और वायनाड से घिरा हुआ है। एक सिरे पर कर्नाटक का कोडगू जिले की सीमा भी लगी हुई है। पुडुचेरी का माहे जिला भी इसी जिले से सटा हुआ है। देश की नेवी के अफसरों को ट्रेनिंग देने वाली नवल अकेडमी इसी जिले के एजिमाला में है। देश के सबसे शहरीकृत जिले में शामिल कन्नूर जिला लंबे समय से लेफ्ट का गढ़ बना हुआ है। कांग्रेस के अलावा भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य कई दलों ने भी यहां खूब कोशिश की लेकिन उनके लिए इस जिले में खुद को मजबूत कर पाना आसान नहीं रहा है।
केरल को कई मुख्यमंत्री देने वाले इस जिले की पहचान पूर्व सीएम ई के नयनार, मौजूदा सीएम पिनराई विजयन और पूर्व मंत्री के के शैलजा जैसे नेताओं की वजह से रही है। बीते कई साल से केरल में पैर जमाने की कोशिश कर रही बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कन्नूर में ही अपनी गतिविधियां तेज की हैं। साल 2000 से साल 2016 के बीच इसी जिले में कुल 69 राजनीतिक हत्याएं हुईं जिसमें 31 लोक RSS/बीजेपी के और 30 लोग लेफ्ट के थे। यह दिखाता है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कितनी ज्यादा है और किस स्तर पर दशकों से लड़ाई लड़ी जा रही है।
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ऐतिहासिक महत्व रखने वाले कन्नूर जिला सांस्कृतिक रूप से बेहद अहम है। चेर साम्राज्य का हिस्सा रहे इस जिले में बाद के दिनों कोलत्तिरी राजाओं ने भी शासन किया। इन्हीं राजाओं के शासन में कन्नूर के कारोबारी संबंध अरब के देशों और पर्शिया से बने। इसी जिले के पजहस्सी राजाओं ने लंबे समय तक अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी और दशकों तक खुद को ब्रिटिश शासन से बचाए रखा।
आजादी की लड़ाई में भी कन्नूर ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जब एनी बेसेंट ने होम रूल लीग की स्थापना की तो यह संगठन थलासरी में खूब सक्रिय था और वी के कृष्ण मेनन जैसे नेता यहीं से निकली। इसी थलासरी के पिनराई गांव में ही साल 1939 के अंत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की नींव पड़ी। पय्यनूर ने नमक सत्याग्रह में अहम भूमिका निभाई। के केलप्पन की अगुवाई में 13 अप्रैल 1930 को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कोझिकोड से पय्यनूर की यात्रा शुरू की थी और 21 अप्रैल को नमक बनाकर कानून का विरोध किया था। अंग्रेजों ने इस आंदोलन का दमन किया। बाद में उलियात कड़व पय्यनूर की घटना ने केरल में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को और तेज कर दिया।
2021 में क्या हुआ था?
2021 में भी एक बार फिर से यह जिला लेफ्ट के लिए मजबूत किला साबित हुआ और कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन को यहां कुछ खास कामयाबी नहीं मिली। कुल 11 सीटों वाले कन्नूर जिले की 8 सीटों पर LDF को जीत मिली थी। केरल में सत्ता से दूर रहे गए UDF गठबंधन को इस जिले में सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं, एक सीट पर लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने जीत हासिल की थी। 2026 में अगर कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचना है तो उसे इस जिले में अपने प्रदर्शन में न सिर्फ सुधार लाना होगा बल्कि कम से कम 6-7 सीटें जीतनी ही होंगी।
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विधानसभा सीटों का इतिहास
कुल 11 सीटों वाला यह जिला विधानसभा सीटों की संख्या के हिसाब से तो बड़ा माना जाता है। 11 में से 7 लोकसभा सीटें कन्नू लोकसभा में आती हैं। तालीपरंबा सीट पर साल 1977 से ही सीपीआई जीतती आ रही है। 2021 में पार्टी ने एक बार फिर से पूर्व एमएलए, पूर्व मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेा एम वी गोविंदन को उतारा और वह फिर से यह सीट जीतने में कामयाब रहे। इस सीट पर कांग्रेस, केरल कांग्रेस, बीजेपी और SDPI तक जोर लगा चुके हैं लेकिन लेफ्ट को यहां हराना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।
इरिक्कुर विधानसभा सीट लंबे समय से कांग्रेस नेता के सी जोसेफ का गढ़ बनी हुई थी। 2021 में वह चुनाव नहीं लड़े और कांग्रेस ने सजीव जोसेफ को चुनाव में उतारा। तमाम बातें हुईं, विरोध हुआ, गुटबाजी की खबरें आईं लेकिन सजीव जोसेफ यहां से चुनाव जीतने में कामयाब रहे और चर्चा है कि वह फिर से यहां से चुनाव लड़ सकते हैं।
अझिकोड विधानसभा सीट पर फिलहाल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPM का कब्जा है। 2021 में IUML के दो बार के विधायक के एम शाजी सिर्फ 6 हजार वोटों के अंतर से यहां से चुनाव हार गए थे। इससे पहले वह लगातार दो चुनाव जीतकर लेफ्ट के गढ़ में जगह बनाने में कामयाब हुए थे। उनके पहले यहां से लगातार लेफ्ट ही जीतता आ रही थी। सिर्फ एक बार साल 1987 में कम्युनिस्ट मार्क्सवादी पार्टी के टिकट पर एम वी राघवन ने यहां से जीत हासिल की थी।
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कन्नूर विधानसभा सीट से लगातार तीन बार के सुधाकरण चुनाव जीते थे। वह केंद्र में गए, उपचुनाव हुआ तब भी कांग्रेस जीती लेकिन 2016 से मामला पलट गया है। अब लेफ्ट के साथ चल चलने वाली कांग्रेस (सेक्युलर) दो बार से यहां से चुनाव जीत रही है। 2021 में कांग्रेस के सतीशन पचानी सिर्फ 1745 वोटों के अंतर से हारे थे। इससे पहले 2016 में भी वह 1196 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे। यानी यह ऐसी सीट है जिस पर कांग्रेस बार-बार जीत के करीब आकर हार जा रही है।
धर्मादम विधानसभा सीट प्रदेश की सबसे हाई प्रोफाइल सीट मानी जाती है क्योंकि दो बार के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन 2016 से इसी सीट से जीतक मुख्यंत्री बन रहे हैं। उनके पहले एख बार के के नारायणन ने सीपीएम के लिए यह सीट जीती थी। यानी अब तक इस सीट पर सीपीएम का ही कब्जा रहा है। हर बार यहां से सीपीएम के मुकाबले लड़ने वाला उम्मीदवार काफी पीछे रह जाता है यानी कि यह सीट सीपीएम के लिए बेहद मजबूत है।
कन्नूर जिले की दूसरी हाई प्रोफाइल सीट मत्तनूर है। प्रदेश की बहुचर्चित नेताओं में से एक के के शैलजा साल 2021 में इसी विधानसभा सीट से चुनाव जीती थीं। उनसे पहले दो बार सीपीआई के ही ई पी जयराजन विधायक बने थे। 2011 में यह सीट दोबारा अस्तित्व में आई थी। यह सीट भी लेफ्ट के लिए बेहद मजबूत सीटों में गिनी जाती है और विपक्ष यहां बेहद कमजोर है।
पेरावूर विधानसभा सीट पर भी 2006 में के के शैलजा चुनाव जीत चुकी हैं। 2011 में कांग्रेस के सनी जोसेफ ने उन्हीं को चुनाव हराकर यहां कांग्रेस की वापसी कराई थी। उसके बाद वह लेफ्ट के दो और नेताओं को हराकर लगातार तीन बार के विधायक बन चुके हैं। इस बार कहा जा रहा है कि के के शैलजा को इसी सीट से फिर से उतारा जा सकता है।
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इस जिले को पय्यनूर विधानसभा सीट कासरगोड लोकसभा में आती है। इस सीट पर आज तक सीपीएम के अलावा कभी भी कोई दूसरी पार्टी चुनाव ही नहीं जीत सकती है। पिनराई विजयन भी 1996 में इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं। 2021 में टी आई मधुसूदन को यहां से उतारा गया था और उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार से दोगुने ज्यादा वोट लेकर जीत हासिल की थी। इसका मतलब है कि यह सीट भी सीपीएम का मजबूत गढ़ है।
कल्लियासेरी विधानसभा भी कन्नूर जिले में है लेकिन कासरगोड लोकसभा में आती है। यहां भी पिछले तीन चुनाव से लेफ्ट का ही कब्जा है और सीपीआई यहां से जीतती आ रही है। यहां भी लेफ्ट को जितने वोट मिलते हैं, विरोधी उसके आधा वोट ही ले पाते हैं।
इस जिले की बाकी दो सीटें वताकारा लोकसभा क्षेत्र में आती हैं। तलासेरी विधानसभा सीट भी इसी लोकसभा क्षेत्र में है और यह सीट भी लेफ्ट का गढ़ है। 1957 से लेकर अब तक यहां लेफ्ट के अलावा कोई चुनाव नहीं जीत पाया है। 1977 से लेकर अब तक यह सीट सीपीएम के कब्जे में है। पू्र्व सीएम ई के नयनार और के बालकृष्णन जैसे नेता इस विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। पिछले दो चुनाव से सीपीएम के ए एन शमसीर यहां से चुनाव जीत रहे हैं। इस बार उनकी जगह नए उम्मीदवार को मौका मिल सकता है।
कुतुपरंबा विधानसभा सीट भी वताकारा लोकसभा क्षेत्र में आती है। इस सीट पर भी दो बार के के शैलजा और पिनराई विजयन जैसे नेता चुनाव जीत चुके हैं। लगातार पार्टी बदलने के लिए मशहूर के पी मोहनन ने साल 2021 के चुनाव में जेडीयू छोड़कर आरजेडी ज्वाइन की थी और सबको हैरान करते हुए यह सीट जीत ली थी। बीजेपी ने दो बार यहां से सी सदानंदन मास्टर को टिकट दिया लेकिन वह तीसरे नंबर पर ही रहे हैं।
विधानसभा सीटें
UDF-2
LDF-8
अन्य-1
जिले की स्थिति
क्षेत्रफल- 2093 वर्ग किलोमीटर
नगर निगम-1
तहसील-3
ब्लॉक-8
विधानसभा क्षेत्र-11
नगर पालिका-11
तालुका-5
गांव-133
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