logo

मूड

कासरगोड: LDF-UDF में होती है कांटे की टक्कर, खाता खोल पाएगी BJP?

IUML के सहारे इस जिले में UDF मजबूत दिखता है और LDF को कड़ी टक्कर देता है। इसी जिले में बीजेपी भी लगातार अपना खाता खोलने की कोशिश करती दिख रही है।

kasargod district of kerala

कासरगोड जिला, Photo Credit: Khabargaon

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement
Group2

अगर आप केरल के नक्शे को देखेंगे तो सबसे उत्तर में कर्नाटक से लगता हुआ जो जिला है उसका नाम है कासरगोड। जिस तरह केरल अपनी धार्मिक विविधता के लिए मशहूर है उसी तरह केरल का मुकुट कहा जाने वाला यह जिला भी है।  नेल्लीकुन्नू और मलिक दिनार मस्जिद, मल्लिकार्जुन मंदिर, मधुर मंदिर और बेला चर्च जैसे धर्म स्थलों वाला यह जिला ऐतिहासिक तौर पर भी समृद्ध रहा है। बेकाल किला, चंद्रगिरी किला और होसदुर्ग किला इसके इतिहास को बयां करते हैं। नदियों, खूबसूरत घाटियों और एक तरफ समुद्र वाला यह जिला कर्नाटक और केरल की सीमा पर स्थित है।

 

राजनीतिक स्थिति देखें तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) के इस गढ़ में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने भी अपनी जगह बनाई है। पिछले कुछ चुनावों से जिले की एक-दो सीटों पर IUML काफी मजबूत स्थिति में रही है। इस जिले में कांग्रेस बेहद कमजोर स्थिति में दिखती है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी अपनी जगह बनाती दिख रही है।

 

कासगरोड लोकसभा में कुल 7 सीटें आती हैं जिसमें पांच सीटें कासरगोड जिले की हैं और दो सीटें कन्नूर जिले की हैं। लोकसभा की बात करें तो 1989 से कासरगोड लोकसभा सीट पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) जीतती आ रही थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के राजमोहन उन्नीथन ने यहां बाजी पलट दी और मौजूदा सांसद का टिकट काटने के बावजूद सीपीएम यहां से हार गई। 2024 में सीपीएम ने फिर से उम्मीदवार बदला लेकिन फिर से राजमोहन उन्नीथन ही जीते। पिछले तीन लोकसभा चुनाव मे हर बार बीजेपी के वोट इस सीट पर बढ़े हैं लेकिन अभी भी वह जीत से दूर ही है। 

 

यह भी पढ़ें: एक अंग्रेज के पैर पड़े और बदल गई पूरे देश की तकदीर, क्या है केरल की पूरी कहानी?

 

साल 1984 के मई महीने की 24 तारीख को बने इस जिले में होसदुर्ग और कासरगोड तालुके को शामिल किया गया था। इससे पहले ये इलाके कन्नू जिले में आते थे। इस जिले के पूर्व में कर्नाटक के कोडगू और दक्षिण कर्नाटक जिले आते हैं। पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में कन्नूर जिला आता है। अलग-अलग भाषाओं वाले इस जिले को केरल का मुकुट भी कहा जाता है। इस जिले में तमाम किले और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरें आज भी मौजूद हैं। केरल के पहले मुख्यमंत्री EMS नंबूदरीपाद इसी जिले की निलेश्वरम सीट से विधायक चुने गए थे। अब इसी सीट का नाम त्रिकारीपुर हो गया है।

2021 में क्या हुआ था?

 

इस जिले की पांच सीटों में से तीन पर लेफ्ट और दो पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) को जीत मिली थी। लेफ्ट को मिली तीन सीटों में से एक पर सीपीआई और दो पर सीपीएम को जीत मिली थी। यानी कासरगोड जिले में UDF के मुकाबले LDF 3-2 से आगे था। लेफ्ट ने दो सीटों पर 25 हजार से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। वहीं, एक सीट मंजेश्वर पर IUML को सिर्फ 745 वोटों से जीत मिली थी।

विधानसभा सीटों का इतिहास

 

मंजेश्वर सीट पर साल 2011 से ही IUML का कब्जा है और वह लगातार चार बार (एक उपचुनाव समेत) इस सीट पर चुनाव जीत चुकी है। इस सीट पर अब IUML के मुकाबले दूसरे नंबर पर बीजेपी रहती है और पिछले चुनाव को देखते हुए बीजेपी को उम्मीद है कि इस बार वह इस सीट पर अपनी किस्मत बदल पाएगी।

 

यह भी पढ़ें: केरल: BJP ने जारी की उम्मीदवारों की पहली लिस्ट, नेमोम से लड़ेंगे राजीव चंद्रशेखर

 

कासरगोड विधानसभा सीट पर 1977 से ही IUML जीतती आ रही है और यह सीट उसके किले में तब्दील हो चुकी है। एक बार यहां से T A इब्राहिम चुनाव जीते और फिर लगातार 7 साल सी टी अहमद अली को जीत मिली। पिछले तीन चुनावों से एन ए नेल्लीकुन्नू यहां के विधायक हैं। पिछले तीन चुनाव से इस सीट पर भी बीजेपी ही नंबर दो पर है। हालांकि, यहां जीत और हार का अंतर बड़ा रहा है।

 

उद्मा विधानसभा सीट 1991 से सीपीएम के कब्जे में है। लगातार अपने उम्मीदवार बदलने वाली सीपीएम ने हर दो चुनाव के बाद उम्मीदवार बदले हैं। दो बार पी राघवन, दो बार के वी कुन्हीरामन, दो बार के कुन्हीरामन और फिर 2021 में सी एच कुन्हांबू यहां के विधायक बने हैं। लगातार कोशिशों के बावजूद कांग्रेस इस सीट को जीत नहीं पा रही है और बीजेपी अभी भी यहां खुद को उतनी मजबूत स्थिति में नहीं ला पाई है।

 

कन्हनगाड विधानसभा सीट 1977 से ही सीपीआई मजबूत स्थिति में है। बीच में सिर्फ 1987 में कांग्रेस को जीत मिली वरना हर चुनाव में सीपीआई ने जीत हासिल की है। तीन बार के कुमारन, दो बार एम नारायणन और एक-एक बार एम कुमारन और पी बालन यहां के विधायक रहे हैं। साल 2011 से अब तक ई चंद्रशेखरन यहां से चुनाव जीत रहे है। कांग्रेस के लिए यह सीट भी टेढ़ी खीर साबित हो रही है और लेफ्ट के इस गढ़ में उसकी बात नहीं बन पा रही है।

 

त्रिकारीपुर विधानसभा सीट 1977 से पहले निलेश्वरम के नाम से जानी जाती थी। 1977 में नए सिरे से हुए गठन के बाद से यहां से सीपीआई एक भी चुनाव नहीं हारी है। केरल के मुख्यमंत्री रहे ई के नयनार भी दो बार इसी विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे। 2021 में सीपीएम के एम राजागोपालन ने केरल कांग्रेस के एम पी जोसेफ को बड़े अंतर से हराकर इस सीट पर जीत हासिल की थी।

 

यह भी पढ़ें: केरल में BJP की आहट से डर गया लेफ्ट? कहीं बंगाल की तरह साफ न हो जाएं

 

जिले की स्थिति


क्षेत्रफल- 1992 वर्ग किलोमीटर
साक्षरता दर- 90.09%
विधानसभा सीटें-5
नगर पालिका-3
ब्लॉक पंचायत-6
ग्राम पंचायत-38
गांव- 129

 

विधानसभा सीटें:- 5
LDF-3
UDF-2

 


और पढ़ें