अनाज था फिर भी 40 लाख लोग भूखे मर गए, बंगाल में पड़े अकाल की पूरी कहानी
ना फसल खराब हुई थी और ना ही अनाज की कमी थी फिर भी बंगाल ने एक ऐसा अकाल देखा जिसमें 40 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। पढ़िए बंगाल के अकाल की पूरी कहानी।

बंगाल भुखमरी की कहानी, Photo Credit: Khabargaon
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की एक सड़क का एक दृश्य है, जिसके दोनों किनारों पर सफेद पट्टियां नहीं बल्कि कंकाल बिछे हुए हैं और बीचों-बीच है एक बच्चा। जिसका वज़न उसकी उम्र से भी कम था। कोई गिनने पर आ जाए तो शरीर की हड्डियां गिन दे। ऐसा बच्चा। वह अपने हाथ के बल लेटा हुआ है। उसमें इतनी भी शक्ति नहीं बची कि अपनी करवट फेर सके और ना ही इतनी कि ऊपर भिन्नाते गिद्धों को हांक सके और इतनी तो बिल्कुल भी नहीं कि मुंह बाये, जीभ लटकाए कुत्ते को दुर-दुरा सके। ये सब भूखे थे। गिद्ध, कुत्ता और बच्चा लेकिन यह दृश्य किसी को हैरान नहीं कर रहा था क्योंकि कोलकाता की सड़कों पर ऐसी ही हज़ारों तस्वीरें दिखने लगी थीं। भूख ने चलते-फिरते इंसानों को कंकाल में बदल दिया था।
ज़िंदा इंसानों को गिद्ध, कुत्ते और सियार नोच-नोचकर खा रहे थे। लोग कूड़े से घास और कचरा बीनकर खाने को मजबूर थे। ऐसा आलम था कि लोग सांपों से डर नहीं रहे थे। बल्कि उन्हें पकड़कर खाने लगे थे लेकिन सात समंदर पार लंदन में बैठा ब्रिटिश प्रधानमंत्री कह रहा था, 'जब इतनी ही भुखमरी है तो गांधी अब तक क्यों नहीं मरा। ये भारतीय खुद भुखमरी के जिम्मेदार हैं क्योंकि वे खरगोश की तरह बच्चे पैदा करते हैं।'
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यह कहानी साल 1943 के बंगाल अकाल की है। जब चावल के एक-एक दाने के लिए बंगाल के लोग तरस रहे थे। जब खाकर जान बचाने के लिए कचरा भी कम पड़ने लगा था और जब कोलकाता की सड़कों पर गिट्टियां कम और इंसानी देह और उन्हें नोचकर खाते वाले कुत्ते और गिद्ध ज्यादा दिखने लगे थे। बंगाल में यह सब घट रहा था और ये सब क्यों हो रहा था? क्योंकि बरतानिया हुकूमत को विश्वयुद्ध में अपनी पताका फहरानी थी। नाज़ी हिटलर को हराना था। जो अपने मुल्क में यहूदियों का कंप्लीट सफाया कर रहा था तो ब्रिटेन ने अपने सैनिकों का पेट भरने के लिए बंगाल को अकाल के गाल में धकेल दिया और लगभग 40 लाख लोगों को भूखे मार दिया।
सरकारी कागजों में इस घिनौने कृत्य को नाम दिया गया, 'डिनायल पॉलिसी' और इसे लागू करने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री का नाम था विंस्टन चर्चिल। चर्चिल को ब्रिटेन के इतिहास का सबसे महान प्रधानमंत्री कहा जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में अलाइड पावर्स की जीत ने चर्चिल को ब्रिटेन के बाकी प्रधानमंत्रियों की तुलना में अलग लीग में खड़ा कर दिया था।
द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी राष्ट्रों को हराने वाला की फीगर। नाजी जर्मनी के खिलाफ लड़ते हुए, “We shall fight on the beaches” जैसी उनकी लाइनें दशकों बाद भी याद की जाती हैं। एक समय जब ब्रिटिश सैनिकों को रण छोड़कर भागना पड़ा था, उसके बाद चर्चिल ने जिस तरह से मित्र राष्ट्रों को एकजुट किया, वह द्वितीय विश्वयुद्ध का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
मगर हम आपको बताएंगे कि क्यों ब्रिटिश अधिकारियों ने ही चर्चिल की तुलना हिटलर से करनी शुरू कर दी थी? बंगाल के चालीस लाख लोगों की मौत का ज़िम्मेदार चर्चिल। क्या था 1943 का बंगाल फैमिन और कैसे चर्चिल की एक नीति ने लाखों लोगों की जान ले ली? जिसके लिए आज तक कभी भी ब्रिटेन ने औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर भारत से माफी नहीं मांगी है तो शोनार बांग्ला इस किस्त में कहानी बंगाल के भयानक अकाल, विस्टर्न चर्चिल की डिनायल पॉलिसी और मानव सभ्यता के एक सबसे क्रूरतम अध्याय की।
बंगाल में क्यों आया अकाल?
अकाल पर बात करने से पहले हम यह जानेंगे कि आखिर यह स्थिति पैदा कैसे हुई? प्रथम विश्वयुद्ध के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध में भी Allied Powers और Axis powers आमने-सामने थे। Allied Powers में उन पांचों देशों का नेतृत्व था, जो आज सुपरपावर कहलाते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, चाइना, फ्रांस और रूस। दूसरी तरफ जर्मनी, इटली और जापान Axis powers की तरफ से इस युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे। यह दुनिया में अब तक का सबसे बड़ा युद्ध है, जिसमें 4-5 करोड़ आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। भले ही अंतिम नतीजों में जापान के सरेंडर के बाद इस युद्ध का अंत हुआ लेकिन जापान की टेक्नॉलजी और उसकी सेना काफी मजबूत थी।
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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 में जापान की सेना बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। जापान ने सिंगापुर, मलाया और बर्मा यानी कि आज के म्यांमार पर कब्जा कर लिया था। जापान द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में इतना मजबूत इसलिए था, क्योंकि उसने लगभग सात दशक पहले से ही खुद को पूरी तरह बदलना शुरू कर दिया था। 1868 में मेजी राजवंश की बहाली के बाद जापान ने फैसला किया कि वह पश्चिमी देशों की तरह ही आधुनिक बनेगा। उसने ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी से तकनीक, उद्योग, शिक्षा और सैन्य व्यवस्था सीखी। फैक्टरियां बनाईं, रेलवे ट्रैक बिछाए और एक अनुशासित सेना खड़ी की। सिर्फ तीस-चालीस सालों में वह एशिया का सबसे ताकतवर देश बन गया था। 1895 में चीन को और 1905 में रूस को हराकर उसने दुनिया को बता दिया कि वह कोई कमजोर देश नहीं है।
युद्ध के वक्त उसकी ताकत का मुख्य आधार उसकी नौसेना थी, जिसके पास दुनिया के सबसे अच्छे एयरक्राफ्ट कैरियर और लड़ाकू विमान थे। उसके सैनिक बहुत अनुशासित और प्रशिक्षित थे, खासकर फॉरेस्ट वॉरफेयर में। 1937 से चीन में चल रहे युद्ध की वजह से जापानी सैनिक काफी ट्रेंड हो चुके थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि यूरोप में जर्मनी से लड़ते हुए ब्रिटेन और अमेरिका की सेनाएं व्यस्त थीं, इसलिए दक्षिण-पूर्व एशिया में जापान के लिए रास्ता आसान रहा।
बर्मा पर कब्जे की कहानी जनवरी 1942 से शुरू होती है। जापान की पंद्रहवीं सेना थाईलैंड की सीमा से बर्मा में घुसी। उसका मेन मकसद था बर्मा रोड को बंद करना, जो चीन को हथियार और सामान पहुंचाने का रास्ता था। साथ ही बर्मा के तेल और अनाज पर भी कब्जा करना। जापानी सेना बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थी। पहले उसने दक्षिणी बर्मा पर कब्जा किया, फिर मौलमीन और रंगून तक पहुंच गई। ब्रिटिश और भारतीय सेनाएं वहां तैनात थीं लेकिन वे संख्या में काफी कम थीं। ब्रिटिश सैनिकों को एक तरफ जंगल की लड़ाई का अनुभव नहीं था और दूसरा आपूर्ति की कमी थी। सित्तांग नदी के पुल पर ब्रिटिशों को भारी नुकसान हुआ। जापानियों ने घेराबंदी और पीछे से हमले की रणनीति अपनाई। मार्च में रंगून और मई 1942 तक पूरा बर्मा जापान के कब्जे में था। हालात ऐसे बन गए कि इस युद्ध में ब्रिटिश सेना को वापस भारत की ओर भागना पड़ा था।
ब्रिटेन और जापान के बीच युद्ध क्यों हुआ?
मगर ब्रिटेन और जापान आखिर एक दूसरे के आमने-सामने आए क्यों थे? यह एक ऐसा सवाल है जिसे जानना बेहद ज़रूरी है। ब्रिटेन और जापान के बीच युद्ध की शुरुआत 7 दिसंबर 1941 को हुई, जब जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर नौसैनिक अड्डे पर अचानक हमला कर दिया। उसी दिन एशिया में 8 दिसंबर को जापान ने ब्रिटिश उपनिवेशों मलाया, सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग पर भी हमले शुरू कर दिए। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने पहले ही अमेरिका से वादा कर रखा था कि अगर जापान अमेरिका पर हमला करेगा, तो ब्रिटेन तुरंत उसके खिलाफ युद्ध छेड़ देगा। इसलिए 8 दिसंबर 1941 को बिना देर किए ब्रिटेन ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। यह मित्र राष्ट्रों की एकजुटता का उदाहरण था, जिसमें ब्रिटेन, अमेरिका और उनके सहयोगी एक साथ जापान और जर्मनी के खिलाफ लड़ रहे थे।
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संक्षेप में कहें तो जापान की शुरुआती ताकत उसके लंबे आधुनिकीकरण और सैन्य तैयारी से आई थी लेकिन जैसे-जैसे युद्ध लंबा चला, संसाधनों की कमी और अमेरिका की विशाल औद्योगिक शक्ति के सामने वह पीछे रह गया। बर्मा पर कब्जा उसकी सबसे बड़ी शुरुआती जीतों में से एक था, जो ब्रिटेन के लिए काफी बड़ा झटका साबित हुआ।
डिनायल पॉलिसी क्या थी?
अब आते हैं, जापान के बर्मा पर कब्जे के बाद की स्थिति पर। ब्रिटिश सरकार को डर था कि अब जापान बंगाल के रास्ते भारत पर हमला करेगा। इस डर से बचने के लिए ब्रिटिशर्स ने बंगाल में एक नीति लागू की जिसे डिनायल पॉलिसी के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब था कि अगर जापानी सैनिक भारत आएं भी तो उन्हें बंगाल में कुछ भी न मिले। न ही भोजन और न ही परिवहन का साधन। इस पॉलिसी के तहत उनके विस्तार को प्रभावित करने की योजना थी लेकिन इस नीति का खामियाज़ा आम बंगालियों को भुगतना पड़ा।
इस नीति के दो अहम हिस्से थे, परिवहन के विकल्पों को नष्ट करना। पहला हिस्सा था नावों को छीनना या नष्ट करना। बंगाल में नदियां और डेल्टा क्षेत्र बहुत हैं और वहाँ के लोगों का मुख्य परिवहन नावों से ही होता था। आज भी है। ब्रिटिश सरकार ने तटीय जिलों जैसे मिदनापुर, खुलना, बाकेरगंज और बारीसल से लगभग 66 हज़ार बड़ी नावों को या तो जब्त कर लिया या फिर नष्ट कर दिया। इन नावों से मछली पकड़ी जाती थी और चावल या दूसरे सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जाते थे। नावें नहीं बचीं तो मछुआरे बेरोज़गार हो गए। बाज़ार तक सामान पहुंचना बंद हो गया और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह से ठप हो गई। ब्रिटिश सरकार की प्राथमिकता में कभी भी बंगाली या भारतीय लोगों का हित नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने एक बार भी बंगालियों के हित में नहीं सोचा। उल्टा उन्होंने बंगालियों पर क्रैकडाउन शुरू कर दिया।
सरकार ने अपनी दूसरी नीति के तहत चावल को छीनना या नष्ट करना शुरू किया। इन तटीय इलाकों में चावल की अच्छी पैदावार होती थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने किसानों और व्यापारियों से अतिरिक्त चावल जब्त कर लिया या फिर नष्ट कर दिया, ताकि अगर जापानी सेना कब्जा कर भी ले, तो उसके पास पर्याप्त अनाज ना हो। ऐसे में हालात ये बने कि कुछ जगहों पर तो चावल को नदियों तक में फेंक दिया गया। हालांकि, जब्त करना पहली प्राथमिकता थी, ताकि इसका इस्तेमाल किया जा सके…। आम भारतीयों के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश सैनिकों के लिए।
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इन दोनों कदमों का मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ जापानी सेना को रोकना था लेकिन इसका असर आम बंगाली लोगों पर पड़ना शुरू हो गया। ठीक उसी वक्त बर्मा पर जापान के कब्ज़े की वजह से बंगाल को बाहर से चावल आने का रास्ता भी बंद हो गया। यहां तक फिर भी सब ठीक था। लोगों के पास जितना भी स्टॉक था, उससे वह कुछ महीने और गुजारा कर सकते थे। हालांकि, परिस्थितियाँ सब के लिए इतनी अनुकूल नहीं थी। रोजी और रोटी दोनों पर असर पड़ना शुरू हो चुका था। मगर इसके बाद एक ऐसा तूफान आया, जिसने पश्चिम बंगाल को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
तूफान जिसने बंगाल का भविष्य तहस-नहस कर दिया
16 अक्टूबर 1942 को बंगाल की खाड़ी में काफी बड़ा तूफान आया। इस तूफान ने बंगाल और ओडिशा को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया। यह तूफान कितना भयानक था इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बताया जाता है उस दौरान हवा की स्पीड 225 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच गई थी। इस आपदा में तेज हवाएं और बहुत ऊँची लहरें साथ-साथ आईं, जिसने पूरे इलाके को तबाह कर दिया। हवा इतनी तेज़ थी कि लोगों को उठाकर पेड़ों से टकरा देती थी। हालात ऐस थे कि रूपनारायण नदी के किनारे टूट गए और समुद्र का पानी अंदर की तरफ बह आया। कंटाई जैसे इलाकों में तो लहरें 20 फीट तक ऊंची थीं। पूरी ज़मीन पर नमकीन पानी और रेत की मोटी परत जम गई। जिससे यह तो तय हो गया था कि अगले एक दो साल तक ज़मीन में कोई फसल पैदा नहीं होगी। कई जीवित बचे लोगों की याद में यह 1943 के भयानक अकाल की सीधी शुरुआत थी।
मगर इस प्राकृतिक आपदा के बावजूद भी पुलिस और सेना डिनायल पॉलिसी के तहत बचे हुए चावल के भंडार नष्ट करती रही। उधर ब्रिटिश सरकार इस तबाही को जापानियों तक नहीं पहुंचने देना चाहती थी। ऐसे में ब्रिटिश सरकार ने अखबारों से कई हफ़्तों तक इस तबाही की खबर न छापने को कहा ताकि जापानियों को पता न चल जाए कि तटीय क्षेत्र डिफेंसलेस है। बाढ़ से तालाब और स्थानीय पानी के स्रोत भी गंदे हो गए थे। जल्द ही हैजे जैसी महामारी फैलनी शुरू हो गई, जो तूफान और भूख के कारण पहले से कमज़ोर लोगों पर और कहर बरपाने लगी। करीब 7400 गांव आंशिक या पूरी तरह बर्बाद हो गए। बंगाल की सबसे उपजाऊ धान की खेती की 1000 स्क्वायर किलोमीटर की जमीन पूरी तरह खराब हो गई। मिदनापुर सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से एक था और भारत छोड़ो आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र भी। जब पूरा बंगाल इस आपदा से कराह रहा था, जिला मजिस्ट्रेटों ने पुलिस को आदेश दिया कि “भारत छोड़ो” आंदोलन में शामिल गाँवों को तब तक राहत न दी जाए जब तक वे सरेंडर न कर दें। इस भीषण तूफान में 60 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। हालांकि, आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक मारे जाने वालों की संख्या लगभग 14 हज़ार थी।
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इस तूफान ने एक ऐसी स्क्रिप्ट लिख दी थी, जिसकी वजह से आने वाले महीनों में 40 से 50 लाख लोगों की मौत या कहें तो इंस्टिट्यूशनल मर्डर हुआ। नावें न होने से जो थोड़ा-बहुत चावल था, वह भी एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुँच पाया। जिसके चलते अनाज की कीमतें आसमान छूने लगीं।
इस आपदा के बाद की स्थिति के कारण फसल की उपज मुश्किल हो गई। लोग रोजी-रोटी की तलाश में इधर-उधर भागने लगे। जब अगले साल भी फसल नहीं हुई, तो परिणाम यह हुआ कि 1943 में बंगाल में भयानक अकाल पड़ा। लगभग 40 लाख लोग भूख से और भूख संबंधी बीमारियों से मर गए। बहुत से इतिहासकार मानते हैं कि यह अकाल पूरी तरह प्राकृतिक नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार की इन नीतियों और गलत प्राथमिकताओं की वजह से यह अकाल ट्रिगर हुआ।
जब इंसानों पर पालतू कुत्तों ने भी कहर बरपाया
इस अकाल के कारण पश्चिम बंगाल और खासकर राजधानी कलकत्ता की सड़कों पर लोगों का चलते-चलते गिरकर मर जाना आम हो गया था। सभ्य समाज में यह सामान्य नहीं था लेकिन कलकत्ता जैसे शहरों में सड़कों पर लोगों का मरना रोज की बात हो गई थी। भूख के कारण सूख के ठूंठ हो चुके दुबले-पतले लोग सड़कों पर चलते-चलते गिरकर मर जाते थे।
मौतें इतनी ज्यादा होने लगीं कि सरकार को लाश उठाने के लिए अलग टीम बनानी पड़ी, जिसका काम सिर्फ फुटपाथ से शव हटाना था। मरते हुए बच्चों के पास गिद्ध और कुत्ते उनका मांस खाने के लिए इंतजार करते थे। ज़रा खुद सोचिए यह दृश्य कितना डरावना रहा होगा लेकिन पश्चिम बंगाल में यह नजारा आम हो गया था। ज़िंदा लोग भी इतने कमजोर हो चुके थे कि उनमें मरे हुए लोगों को दफनाने या अंतिम संस्कार करने की ताकत तक नहीं थी। इसलिए लाशें नालों में फेंक दी जातीं या नदी किनारे घसीटकर ले जाई जातीं, जहां कुत्ते, सियार और गिद्ध उन्हें खा जाते थे। कुत्ते भी इतने भयानक हो गए कि कमजोर लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। एक पत्रकार ने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान एक नहर के सिर्फ 7 मील के हिस्से में 500 खोपड़ियां और कंकाल गिने थे।
इस अकाल ने बंगाल की सड़कों को मौत की धीमी चलने वाली पटरी बना दिया। हालात इतने बुरे हो गए कि लोगों में दुख मनाने या मरे हुए लोगों की रक्षा करने की ताकत भी नहीं बची थी। सड़कें जानवरों के लिए खुला भोजन बन गईं। मुर्शिदाबाद जैसे शहर में भी सड़कों पर लाशों के ढेर लगे रहते थे और उनपर कुत्ते, सियार और गिद्ध मांस नोचते हुए दिखाई देते थे। इतिहासकार मधुश्री मुखर्जी अपनी किताब चर्चिल्स सिक्रेट वॉर में एक सर्जेंट के हवाले से लिखती हैं, 'सर्जेंट जॉन क्राउट को एक छोटी लड़की का डरावना नजारा याद है, वह अभी मरी नहीं थी लेकिन एक सियार ने उसकी बांह फाड़कर खा ली थी। गाँव के कुत्ते और सियार जैसे जानवर, जो आमतौर पर नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, वे डरावने जीव बन गए थे। वे कमजोर लोगों पर हमला करने लगे, क्योंकि लोग इतने कमज़ोर हो चुके थे कि वह अपनी रक्षा तक नहीं कर सकते थे। प्रकृति का क्रम पूरी तरह टूट गया था। शहर की इज्जत बचाने के लिए सरकार ने इन भूखे लोगों को बीमार भिखारीकहा और पुलिस-फौज की गाड़ियों से उन्हें पकड़कर लोगों की नजरों से दूर कर दिया।'
जनम मुखर्जी अपनी किताब 'हंगरी बंगाल: वॉर, फैमिन एंड द एंड ऑफ अंपायर' में भी तब के हालातों का जिक्र करते हैं। वह लिखते हैं कि तब मिदनापुर में सड़क किनारे गिद्ध और कुत्ते इंसानी शवों के लिए लड़ते दिखते थे। हिंदूओं के दाह-संस्कार के लिए लकड़ी नहीं थी, इसलिए लाशें नहरों या नदियों में धकेल दी जाती थीं। वहां सूजी हुई लाशें बहुतायत में तैरती रहती थीं। ढाका में एक सरकारी अनाज की दुकान के सामने बारह साल के एक लड़के की लाश मिली थी। सियार और गिद्धों ने उसे आधा खा लिया था। संभवतः तब जब वह भूख से बेहोश पड़ा था। देखकर ऐसा लग रहा था कि जानवर ने उसकी मौत का इंतजार नहीं किया, बल्कि रात में तब हमला किया जब वह भूख से बहुत कमजोर हो चला था।
खैर किताबों से इतर कहा यह भी जाता है कि लोग भूख से इतने तड़प रहे थे कि उन्होंने जानवरों को खाना शुरू कर दिया था। हालांकि, मधुश्री और जनम मुखर्जी जैसे इतिहासकार मानते हैं कि इस तरह के मामले कहीं दर्ज नहीं हुए, इसलिए इन दावों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
बंगाल अकाल पर सरकारी सर्जन-जनरल की रिपोर्ट में लिखा था, बहुत कम लोग सिर्फ भूख से मरे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भूख मुख्य वजह नहीं थी। पश्चिम बंगाल में ये मौतें एक साथ नहीं हुईं। मौत धीरे-धीरे आई। गरीबी और कुपोषण यहां पहले से थे और फिर अचानक बड़ी संख्या में मौतें होने लगीं।
भूख से मरने की हालत में शरीर बस सूखकर खत्म नहीं हो जाता बल्कि यह एक जटिल लड़ाई है, जो शरीर और दिमाग को अंदर से खोखला कर देती है, विकृत कर देती है और अंत में पूरी तरह नष्ट कर देती है। शरीर इतना कमजोर हो जाता है कि सब कुछ टूटने लगता है। एक-एक करके अंग काम करना बंद कर देते हैं, जिसे मेडिकल की भाषा में ऑर्गन फेलियर कहते हैं। बंगाल में हज़ारों लोग इन वजहों से रोज़ मर रहे थे। चर्चिल की डिनायल पॉलिसी ब्रिटिशों की एक युद्ध-रणनीति थी, जो जापानियों को रोकने के नाम पर लागू की गई लेकिन इसकी कीमत लाखों निर्दोष बंगालियों को जान देकर चुकानी पड़ी।
अब सवाल यह है कि विंस्टन चर्चिल की पॉलिसी आखिर थी क्या और उससे ऐसी क्या स्थिति पैदा हो गई, जो लोगों को भूख से मरना पड़ा? वह भी एक ऐसा राज्य जहां कृषि ही जीविका का सबसे बड़ा साधन है।
चर्चिल ने क्यों भारतीयों को मरने के लिए छोड़ दिया?
विंस्टन चर्चिल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। पश्चिम बंगाल में अकाल से हुई मौतों का ज़िम्मेदार चर्चिल को ही बताया जाता है। पहला कारण उनकी नीतियां थीं और दूसरा उस अकाल के दौरान दिए गए उनके बयान। भारतीयों के प्रति चर्चिल की नफरत से एक चीज़ तो स्पष्ट होती है कि उन्होंने जानबूझकर भारतीयों को मरने के लिए छोड़ दिया। उन्होंने अनाज का आयात रोका, विदेशी मदद ब्लॉक की और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह के कारण लाखों लोगों की जान के आगे युद्ध को ज्यादा महत्व दिया।
अकाल के दौरान हुई वॉर कैबिनेट की बैठकों में दो वॉयसराय लिनलिथगो और वेवेल ने चर्चिल से कई बार रिक्वेस्ट की कि दूसरे देशों से अनाज का आयात करें लेकिन चर्चिल ने बार-बार उनके आग्रह को ठुकरा दिया। वॉर कैबिनेट लंदन में निर्णय लेने वाली सबसे टॉप संस्था थी। प्रधानमंत्री होने की हैसियत से विंस्टन चर्चिल इसके नेता थे। भारत पर इसका पूरा एकाधिकार था। वॉर कैबिनेट ब्रिटेन के मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों का एक छोटा समूह था। सैन्य प्राथमिकताएं, जहाजों का बंटवारा और उपनिवेश की राजनीतिक समस्याओं के अंतिम फैसले सब वॉर कैबिनेट ही लेती थी।
वॉर कैबिनेट में चर्चिल ने फैसला लिया कि युद्ध के बीच अनाज का आयात संभव नहीं है। मगर चर्चिल ने सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं की थी। यह एक सोची-समझी प्राथमिकता थी, जहां बंगाली लोगों की जान ब्रिटिश सैनिकों की जीत के लिए कुर्बान कर दी गई। कई देशों ने इस अकाल के दौरान भारत को मदद की भी पेशकश की। नवंबर 1943 में कनाडा के प्रधानमंत्री ने 1 लाख टन गेहूं और जहाज दिया। चर्चिल ने जहाज का इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई, जिससे कनाडा ने मदद रद्द कर दी।
1943 में एक मीटिंग हुई जिसमें चर्चिल ने कहा कि कमजोर बंगालियों का भुखमरी से मरना मजबूत यूनानियों से कम गंभीर है। चर्चिल ने यूनानियों की मदद को ज्यादा तवज्जो दी। सितंबर 1942 में उन्होंने भारत के सचिव से कहा था, 'मैं भारतीयों से नफरत करता हूं। वे घिनौने लोग हैं जिनका धर्म घिनौना है।' 1943 में मदद की गुहार पर चर्चिल ने कहा था कि भारतीय खरगोशों की तरह बढ़ते हैं। 1943 के बंगाल अकाल में चर्चिल की सोच माल्थस की थी। वह अकाल का दोष खुद पीड़ितों पर डालते थे और जनसंख्या वृद्धि को अकाल और महामारी का मुख्य कारण मानते थे।
चर्चिल को सबसे ज़्यादा नफरत महात्मा गांधी से थी। अकाल को डिनाई करते हुए चर्चिल का कहना था कि अगर भुखमरी है, तो फिर गांधी भूख से क्यों नहीं मर गए? 1943 में ही महात्मा गांधी के उपवास के दौरान चर्चिल ने उन्हें “दयनीय बूढ़ा आदमी” कहते हुए कहा कि साम्राज्य के दुश्मन के सामने झुकना नहीं चाहिए।
अब बात कि चर्चिल ने युद्ध को प्राथमिकता क्यों दी? चर्चिल के अनुसार सबसे पहली जरूरत थी कि बड़ी संख्या में सैनिकों को रोजाना खाना मिले। 1943 की शुरुआत में फील्ड मार्शल आर्चिबाल्ड वेवेल ने वॉर कैबिनेट को बताया कि सप्लाई की कमी से सैनिकों और युद्ध में इस्तेमाल किए जा रहे जानवरों का राशन पहले ही कम कर दिया गया था। 1944 में वायसराय ने अनुमान लगाया कि सैनिकों के लिए 12 महीने में 7 लाख 24 हजार टन अनाज चाहिए तो सबसे पहले उन जरूरतों को पूरा किया जाए। वायसराय पर एक दबाव यह भी था कि बंगाल से थोड़ा और चावल निकालें ताकि सिलोन (श्रीलंका) को सप्लाई मिले, जो कि जापान के खिलाफ अहम ठिकाना था यानी कि ब्रिटिश सैनिकों का एक बेस।
ब्रिटिश सेना की सफलता कलकत्ता में बंदूकें, इस्पात और कपड़ा बनाने से भी जुड़ी हुई थी। सरकार ने फैक्ट्री मजदूरों को भी खाना देने को प्राथमिकता दी ताकि मजदूर हड़ताल ना कर दें। अगर ऐसा होता तो इससे उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता था। सरकार ने कंपनियों को कहा कि वह अपने कर्मचारियों के लिए तीन महीने का अनाज स्टॉक रखें, ताकि बाजार में कुछ भी हो, तो उत्पादन किसी भी परिस्थिति में ना रूके।
खैर भारत में यह पुरानी सैन्य परंपरा थी कि सैनिकों के लिए छह महीने का अनाज स्टॉक में रखा जाए। द्वितीय विश्व युद्ध में यह डिनायल पॉलिसी के रूप में सामने आया। सरकार ने गांवों से अतिरिक्त चावल जबरन ले लिया ताकि अगर जापानी सेना आक्रमण करे तो उसे खाना न मिले। यह अनाज सेना के गोदामों में रख दिया गया। अकाल की इस परिस्थिति में भारत बर्मा से भी चावल का आयात कर सकता था लेकिन जापान के कब्जे के बाद यह मुमकिन नहीं रहा। इस वजह से भारतीय खाद्य आपूर्ति पर बहुत बुरा असर पड़ा। जापानी सेना के कब्जे से पहले यह अनाज का एक बड़ा स्रोत था, जो कि ब्रिटिश हुकूमत के लिए अब दुश्मन का मोर्चा बन चुका था। युद्ध से पहले भारत दक्षिण-पूर्व एशिया पर बहुत निर्भर था। हर साल बर्मा और थाईलैंड से 10 से 20 लाख टन चावल का आयात होता था। 1934 और 1936 में जब भारत अनाज संकट से जूझ रहा था तो वह बर्मा का चावल ही था जिसने बड़े पैमाने पर भुखमरी और पलायन को रोका था। बर्मा के चावल को खोना ऐसा था, जैसे सूखे में पानी के स्त्रोत को अचानक बंद कर दिया जाए।
बर्मा खोने के बाद वायसराय ने प्रांतों के गवर्नरों को कहा कि चावल की समस्या में देश के बाहर से कोई मदद नहीं मिल सकती, हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इससे बंगाल में जबरन और आक्रामक तरीके से अनाज इकट्ठा करने की योजनाएं चलीं। लाखों भारतीय किसानों की छोटे-छोटे खेतों की फसल को इकट्ठा करके सैनिकों और वॉर मजदूरों के मुंह में डाला जाता था, ताकि साम्राज्य की युद्ध मशीन चलती रहे।
महात्मा गांधी से चिढ़ते थे चर्चिल
वॉर कैबिनेट के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द महात्मा गांधी थे। 1943 में वह लगातार उपवास पर थे। कैबिनेट चाहती थी कि महात्मा गांधी को रिहा करने की बजाय हिरासत में भूख से मरने दिया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि उनकी मौत की खबर कम फैले इसलिए उन्हें यमन या सूडान भेज दिया जाए। जब वायसराय की कार्यकारी परिषद ने स्वास्थ्य कारणों से गांधी की रिहाई की सलाह दी तो चर्चिल ने परिषद के सदस्यों को 'काले लोग' कहा और वायसराय को उनकी सलाह मानने से मना कर दिया।
युद्ध की शुरुआत में चर्चिल भारत की आजादी के किसी भी विचार से बहुत नाराज थे। 1940 में जब भारत के सचिव लियोपोल्ड एमरी ने राष्ट्रवादियों का सहयोग पाने के लिए भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का सुझाव दिया, तो चर्चिल ने कैबिनेट में इतना गुस्सा किया कि दूसरे सदस्य शर्म से बाहर चले गए। चर्चिल ने कहा कि वह भारत में ब्रिटिश राज खत्म करने की बजाय जंगल में जाकर लड़ना पसंद करेंगे। वह कहते थे कि हिंदू-मुस्लिम झगड़ा ब्रिटिश राज का मजबूत आधार है और भारतीयों को एक करने का विचार उन्हें भारत से बाहर का रास्ता दिखा देगा।
जब एमरी ने राहत मदद की गुहार लगाई थी, तो चर्चिल ने कहा कि भारतीय खरगोशों की तरह बढ़ते हैं और संकट का कारण उनकी ज्यादा जनसंख्या है, ब्रिटिश नीति नहीं। एमरी और चर्चिल के बीच यह तनाव 1944 में चरम पर पहुंच गया था। एमरी का सब्र टूटने लगा था। उन्होंने प्रधानमंत्री चर्चिल से खुलकर कह दिया कि उनकी सोच और हिटलर की सोच में ज्यादा फर्क नहीं है। बाद में एमरी ने लिखा था कि भारत के मामले में चर्चिल पूरी तरह समझदार नहीं लगते।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल की नीतियों की वजह से पश्चिम बंगाल में लगभग 40 से 50 लाख लोगों की मौत हो गई लेकिन ब्रिटिश सरकार ने 1943 के बंगाल अकाल के लिए कभी भी आधिकारिक रूप से कोई माफी नहीं मांगी। कांग्रेस के नेता शशि थरूर इस मुद्दे पर काफी मुखर रहे हैं। अपनी किताब “इंग्लोरियस एम्पायर” में भी वह इस वीभत्स घटना का ज़िक्र करते हैं… और 2015 के मशहूर ऑक्सफोर्ड यूनियन डिबेट में वह कहते हैं, यह अकाल ज्यादातर ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों की वजह से पैदा हुआ था। यानी कि यह इंसान द्वारा बनाई गई एक त्रासदी थी। थरूर ने चर्चिल की तुलना 20वीं सदी के सबसे बुरे नरसंहार करने वाले हिटलर जैसे तानाशाहों से की थी। वह कहते हैं कि चर्चिल के हाथों पर भी इतना ही खून है, क्योंकि उनके फैसलों से 40 लाख से ज्यादा मौतें हुईं। थरूर मांग करते हैं कि ब्रिटेन अपनी औपनिवेशिक क्रूरताओं, जिसमें यह अकाल भी शामिल है, को स्वीकार करे और कम से कम माफी मांगे या प्रतीकात्मक मुआवजा दे।
तो यह कहानी थी बंगाल के अकाल की और एक ऐसे पॉलिसी की जो लाखों लोगों की मौत का गवाह बना लेकिन ब्रिटेन चर्चिल को इस क्रूरता के लिए नहीं बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की जीत के लिए याद करता है। आज जब भी फिलिस्तीन की बात होती है तो यही ब्रिटेन मानवीय रूप से उसके पक्ष में खड़ा दिखता है। पीड़ितों के प्रति संवेदनशील दिखता है, लेकिन इतने क्रूर विस्टर्न चर्चिल को महानतम प्रधानमंत्री बताने से नहीं चूकता।
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