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रजनीकांत से तक कमल हसन तक, सियासत में 'चूके', विजय क्यों उत्साहित हैं?

थलापति विजय को उम्मीद है कि राज्य में तमिलगा वेत्री कझगम की सरकार बन रही है। यह उम्मीद न तो कमल हासन रख पाए, न रजनीकांत।

Vijay

थलापति विजय। Photo Credit: PTI

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यह सच है कि तमिलनाडु की सियासी जमीन, फिल्म अभिनेताओं के लिए बहुत उपजाऊ रही है लेकिन हर अभिनेता का कद बढ़कर करुणानिधी, एमजरामचंद्रन (MGR) या जे जयललिता की तरह रहा हो, ऐसा भी नहीं है। कई नेता ऐसे हैं, जो राजनीति में तो धूम-धमाके से आए लेकिन धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंच गए। इरादा बड़े सामाजिक और आर्थिक क्रांति का करके आए थे लेकिन राज्यसभा की एक सीट तक समझ गए। पार्टी तो बन गई लेकिन जनता ने साथ नहीं दिया तो सब गंवा बैठे। विजय भी सियासत में जोर-शोर से उतरे हैं, द्रविड़ आंदोलन के नए चेहरे बने हैं लेकिन क्या राह उनके लिए आसान है?

करुणानिधि और MGR कट्टर दोस्त थे। साल 1969 में सीएन अन्नादुरई के निधन के बाद करुणानिधि मुख्यमंत्री बने। उन्हें आगे बढ़ाने में एमजी रामचंद्रन की अहम भूमिका रही। सत्ता में आने के बाद दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। MGR का मानना था कि सरकार और पार्टी में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, जबकि करुणानिधि को लगा कि MGR सरकार के कामकाज में जरूरत से ज्यादा दखल दे रहे हैं।

MGR ने DMK छोड़कर 1972 में AIADMK पार्टी बनाई और तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उनके बाद जयललिता ने भी AIADMK संभाली और 5 बार CM बनीं। विजयकांत ने 2005 में DMDK पार्टी बनाई जो सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाती रही। सरत कुमार ने DMK छोड़कर अपनी पार्टी बनाई, बाद में BJP में शामिल हो गए। कमल हासन ने 2018 में MNM पार्टी लॉन्च की लेकिन सफलता नहीं मिली।
 

चुनाव से पहले ही चुनावी मैदान छोड़ गए थे रजनीकांत

मेगास्टार रजनीकांत ने 31 दिसंबर 2017 को राजनीति में आने का एलान किया था। उन्होंने 'रजनी मक्कल मंद्रम' (RMM) नाम से एक संगठन बनाया था। यह माना जा रहा था कि वह सियासत में आ रहे हैं। वह अगर आते तो बड़ा जनसमर्थन उनके साथ होता। वह तमिल सिनेमा के ऐसे सुपरस्टार हैं, जिनके मंदिर हैं। उन्होंने आध्यात्मिक राजनीति का वादा किया और साल 2021 के विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना बनाई।

चुनाव से बहुत पहले उन्होंने विदा ली। दिसंबर 2020 में अपनी बिगड़ती सेहत और कोविड-19 महामारी के खतरों का हवाला देते हुए, उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी लॉन्च करने से पहले ही राजनीति में न आने का फैसला किया। जुलाई 2021 में उन्होंने अपने संगठन को भंग कर दिया। रजनीकांत ने साफ कहा कि भविष्य में उनकी राजनीति में आने की कोई योजना नहीं है।

कमल हासन हिट होने आए थे, फ्लॉप होकर चले गए 

कमल हासन ने 21 फरवरी 2018 को मदुरै में अपनी राजनीतिक पार्टी 'मक्कल नीधि मय्यम' (MNM) की शुरुआत की। उनकी पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई, लेकिन करारी हार मिली। खुद कमल हासन खुद कोयंबटूर दक्षिण से चुनाव गंवा बैठे। 

चुनावी असफलताओं के बाद पार्टी के कई बड़े नेताओं ने MNM छोड़ दी। 2026 के विधानसभा चुनाव में कमल हासन, DMK गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले थे। DMK ने शर्त रखी कि आपको MNM नहीं, DMK के चिह्न पर चुनाव लड़ना होगा। कमल हासन की राजनीतिक पकड़ को देखकर उन्होंने स्टालिन मोल-भाव पर उतर आए।

एमके स्टालिन ने जितनी सीट ऑफर की, कमल हासन संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने चुनाव न लड़ने का फैसला किया। डीएमके ने उन्हें राज्यसभा भेजा था, उन्होंने पार्टी को बिना किसी शर्त के समर्थन दे दिया। उनकी फिल्में तो हिट रहीं लेकिन अभी तक सियासी हिट नहीं मिल पाया है।

सीनियर असफल, फिर विजय इतने उम्मीद में क्यों हैं?

विजय सोशल मीडिया पर करुणानिधि और MGR जैसी छवि बनाने में कामयाब हुए हैं। उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। उनकी रैलियों में हजारों लोग उमड़ रहे हैं। जहां जा रहे हैं, उनके समर्थक उन्हें घेर ले रहे हैं। प्रशासन के लिए भी उनकी रैलियों को संभालना भारी पड़ रहा है। बेहद कम वक्त में उन्होंने बड़ा जानाधार खड़ा कर लिया है। 2 फरवरी 2024 को उन्होंने औपचारिक तौर पर अपनी पार्टी का गठन किया लेकिन उससे पहले ही अपनी सियासत शुरू कर दी थी। 

 

विजय ने तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की स्थापना से पहले 'विजय मक्कल इयक्कम' (VMI) के माध्यम से कई साल से जमीनी स्तर पर काम कर रहे थे। राज्य में द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) की पारंपरिक लड़ाई है। दो बड़े दल हैं, दोनों बड़े दलों के बीच विजय, तीसरा विकल्प बनकर उभरे हैं, जो न तो रजनीकांत बन पाए थे, न ही कमल हासन। 

 

DMK और AIADMK दोनों के शासन को जनता देख चुकी है। युवाओं के सामने विजय हैं। अपनी फिल्मों से सामाजिक चेतना की बात करते हैं, भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाते रहे हैं। अब एक बड़ी आबादी नए विकल्प की तलाश में है। युवा लिख रहे हैं, टीवी चैनलों पर बोल रहे हैं।  विजय की मजबूती उनकी साफ-सुथरी छवि और उनकी फिल्मों के माध्यम से दिए गए सामाजिक-राजनीतिक संदेश है। 

विजय की ताकत क्या है?

विजय भी द्रविड़ राजनीति पर जोर दे रहे हैं। वह द्रविड़ विचारधारा का नया रूप दिखा रहे हैं। विजय ने अपनी पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) के जरिए भी यह साफ कर दिया है कि वह तमिल गौरव और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को लेकर चलने वाले हैं। उनकी रैलियों में महिलाओं और युवाओं भीड़ नजर आ रही है। जिस 'जेन जी' ने नेपाल जैसे देश में क्रांति कर दी है, उनकी संवेदना विजय के साथ है। ऐसे में एक मजबूती यह भी है। 


विजय मुख्य रूप से तमिल समाज के हाशिए पर खड़े युवाओं, मध्यम वर्ग और दलित और पिछड़ी जातियों के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। तमिलनाडु में करीब 6 फीसदी ईसाई हैं। विजय खुद, ईसाई हैं। उनके पास एक मजबूत वोट बैंक है। अलग बात है कि वह किसी संप्रदाय आधारित राजनीति पर जोर नहीं दे रहे हैं। उनका ध्यान युवा पीढ़ी पर है। वह रैलियों में वंशवादी राजनीति के खिलाफ बयान दे रहे हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। विजय को उम्मीद है कि वह तमिलनाडु और पुडुचेरी, दोनों जगहों पर सत्ता में आने जा रहे हैं। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोटिंग होने वाली है। नतीजे 4 मई को आएंगे। अब देखने वाली बात यह है कि विजय कामयाब होते हैं या नहीं।


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