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जर्मनी जाने से पहले वहां के भारतीय छात्रों की सच्चाई जान लें, कैसे हो रहा शोषण?

भारत से हजारों छात्र अपनी हायर एजुकेशन और सुनहरे भविष्य के लिए जर्मनी जाते हैे लेकिन वहां जाकर उन्हें सच्चाई पता चलती है। वहां जाकर कई छात्र सिर्फ डिलीवरी बॉय बनकर रह जाते हैं।

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सांकेतिक फोटो, Photo Credit: SORA

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भारत से हर साल लाखों छात्र विदेश में पढ़ाई करने के लिए जाते हैं। जर्मनी भी हजारों छात्रों की पसंद बना हुआ है। जर्मनी के सरकारी कॉलेजों में छात्रों से फीस नहीं ली जाती है। इसके साथ ही यहां रहकर छात्रों को कमाने का मौका भी मिल जाता है। सोशल मीडिया पर लगातार कई एड दिखाई देते हैं, जिनमें जर्मनी में पढ़ने के फायदे बताए जाते हैं। इन्हीं एड को देखकर कई छात्र जर्मनी जाकर अपनी हायर एजुकेशन पूरी करने का प्लान बनाते हैं लेकिन वहां जाकर वह फंस जाते हैं। जर्मनी में कई भारतीय छात्र नरक जैसा जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। 

 

हाल ही में डीडब्ल्यू हिंदी ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में बताया गया है कि जर्मनी में शानदार करियर बनाने आए कई भारतीय छात्र वहां पहुंचने पर मायूस और निराश हो जाते हैं। रिपोर्ट में इस बारे में  बताया गया है कि डिलीवरी बॉय बन कर 12 घंटों की शिफ्ट करते युवा इस जंजाल में आखिर कैसे फंसते हैं। 

 

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डिलीवरी बॉय की मांग बढ़ी

दुनिया के अन्य देशों की तरह जर्मनी में भी फूड डिलीवरी तेजी से बढ़ रही है। फूड डिलीवरी से होने वाली इनकम कई गुना बढ़ गई है। तेजी से बढ़ते इस कारोबार में मैन पावर यानी काम करने वाले लोगों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। जर्मनी में भारत समेत साउथ एशिया के अन्य देशों से आए छात्र आसानी से इस काम के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे छात्र पहले ही कर्ज के कारण परेशान होते हैं। डीडब्ल्यू की रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह यह छात्र लोन लेकर पढ़ाई करने आते हैं लेकिन मिडल मैन के चक्कर में फंस जाते हैं। 

जर्मनी की ओर बढ़ते भारतीय

भारतीय युवा बीते एक दशक में जर्मनी की ओर बहुत ज्यादा आकर्षित हुए हैं। 2020 के बाद भारत से जर्मनी जाने वाले छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। 2024-25 तक जर्मनी में करीब 3 लाख से ज्यादा भारतीय मूल के लोग रह रहे हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में आईटी और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में काम कर रहे प्रोफेशनल्स शामिल हैं। 

 

जर्मनी की यूनिवर्सिटी में भी भारतीय छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रहीहै। 2014-15 तक यह संख्या 11,860 थी लेकिन 2024-25 तक यह बढ़कर 50,000 तक पहुंच गई है। इसके पीछे भारत जर्मनी के बीच हुए समझौते और जर्मनी की आसान इमिग्रेशन नीति है। 

कर्ज में फंसे छात्र

जर्मनी की सरकारी यूनिवर्सिटी में एजुकेशन फ्री है लेकिन एडमिशन बहुत मुश्किल है। सोशल मीडिया पर विज्ञापन देखकर छात्र जर्मनी की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लेते हैं। एक छात्र ने बताया कि सोशल मीडिया पर आपको लगातार इस तरह के एड दिखते हैं। कई बार तो आपको सामने से फोन आता है जो आपको एजुकेशन लोन से लेकर वीजा तक हर एक प्रोसेस बताते हैं। 

 

जर्मनी जाकर छात्रों की सबसे पहली दिक्कत तो यूनिवर्सिटी की फीस होती है। जर्मनी में रहने के लिए किराया बहुत ज्यादा है और अन्य सामान भी बहुत मंहगा है। ऐसे में छात्र फूड डिलीवरी जैसे कामों में फंस जाते हैं। डीडब्ल्यू ने भव्य नाम के एक युवक की कहानी बताई। वह दिल्ली में अच्छी नौकरी कर रहे थे लेकिन सोशल मीडिया पर रील्स देखकर उन्होंने जर्मनी जाने का फैसला किया। हालांकि, बर्लिन आने के  बाद सच्चाई कुछ और निकली। सबसे पहले तो घर लेना जिसका किराया बहुत ज्यादा था। 

 

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फूड डिलीवरी में शोषण

भव्य ने बताया कि उन्हें यहां कोई नौकरी नहीं मिली तो उन्हें किसी दोस्त ने फूड डिलीवरी के बारे में बताया। इस काम में युवाओं का शोषण किया जाता है। भव्य ने बताया कि 12-12 घंटे काम करना पड़ता है और अगर काम ना करो तो वे आपको काम से निकाल देते हैं। इसके साथ ही पैसा भी नियमित रूप से नहीं मिलता और बहुत कम होता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि डिलीवरी वर्कर्स का शोषण इसलिए भी होता है क्योंकि डिलीवरी का काम करने वाले ज्यादातर दूसरे देशों के लोग होते हैं। भारत से छात्रों को लाने से लेकर फूड डिलीवरी के काम तक एक लंबी चेन है, जिसमें भारतीय छात्र फंसते जा रहे हैं। 

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