logo

ट्रेंडिंग:

छोटे देशों को अपनी कॉलोनी बना लेंगे बड़े देश, ऐसे कयास की वजह क्या है?

बड़े और शक्तिशाली देश छोटे देशों को अचानक नहीं बल्कि पूरी योजना और रणनीति के साथ अपने अधीन करते थे। आज भी तरीका लगभग वही है, बस समय और परिस्थितियों के अनुसार इसमें कई बदलाव आ चुके हैं। आइए इसे समझते हैं—

Representative Image

प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

शेयर करें

संबंधित खबरें

Reporter

इतिहास में बड़े और शक्तिशाली देशों का छोटे देशों को अपना उपनिवेश (कॉलोनी) बनाने की प्रक्रिया अचानक नहीं होती थी। यह काम चरणबद्ध तरीके से पूरी योजना और रणनीति के तहत किया जाता था। यूरोप की ताकतवर शक्तियां, जैसे ब्रिटेन, फ्रांस और पुर्तगाल अक्सर व्यापार के बहाने किसी देश में प्रवेश करती थीं। शुरुआत में वे सिर्फ व्यापार की अनुमति मांगते थे लेकिन धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाकर शासन पर कब्जा जमा लेते थे। इसके अलावा भी कई ऐसे तरीके अपनाए जाते थे जिनके जरिए ये देश दूसरे देशों पर नियंत्रण करते थे।

 

आज भी इसी तरह के तरीके बदले हुए रूप में देखने को मिलते हैं। वर्तमान समय में बड़े देशों का छोटे देशों को अपनी आर्थिक कॉलोनी बनाने की आशंकाएं तेजी से बढ़ी हैं। आधुनिक दौर में यह प्रक्रिया पुराने समय की तरह सेना भेजकर कब्जा करने की नहीं होती बल्कि इसे ‘नव-उपनिवेशवाद’ कहा जाता है, जहां आर्थिक और राजनीतिक दबाव के जरिए प्रभाव बनाया जाता है।

 

यह भी पढ़ें- घर से सड़क तक उबाल, कल की रात पूरे ईरान में क्या-क्या हुआ?

 

उपनिवेशवाद के तरीके

ज्यादातर उपनिवेशों की शुरुआत सीधे लड़ाई से नहीं हुई बल्कि व्यापार के बहाने हुई। शुरुआत में बड़े देश मसाले, रेशम और सोने जैसे सामानों के व्यापार की अनुमति मांगते थे। ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी और डच कंपनियों ने व्यापार पर कब्जा जमाया और अपने माल की सुरक्षा के लिए छोटी सेनाएं रख लीं। धीरे-धीरे उनका दखल बढ़ता गया। इन देशों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई। वे स्थानीय राजाओं और कबीलों के आपसी झगड़ों का फायदा उठाते थे। एक राजा को दूसरे के खिलाफ मदद देकर बदले में जमीन या टैक्स वसूलने का अधिकार ले लेते थे। इससे असली सत्ता उनके हाथ में चली जाती थी।

 

इन देशों के पास बेहतर जहाज, बंदूकें और तोपें थीं जबकि स्थानीय लोगों के पास पुराने हथियार थे। जरूरत पड़ने पर वे ताकत के बल पर इलाकों पर कब्जा कर लेते थे। आर्थिक रूप से भी उन्होंने जाल बिछाया। वे महंगा सामान बेचते और सस्ता कच्चा माल खरीदते थे। कर्ज न चुका पाने पर राज्यों पर कब्जा कर लेते थे।

 

इसके अलावा शिक्षा और धर्म के जरिए खुद को सभ्य बताकर लोगों पर प्रभाव जमाया गया, जिसे 'व्हाइट मैन का बोझ' कहा गया। 1914 तक दुनिया के लगभग 84% हिस्से पर किसी न किसी यूरोपीय शक्ति का कब्जा था।

 

अभी के उदाहरण जो उपनिवेशवाद की ओर इशारा करते हैं

1. कर्ज का जाल

 

यह सबसे बड़ी वजह है। चीन जैसे शक्तिशाली देश छोटे और गरीब देशों जैसे श्रीलंका, पाकिस्तान, लाओस को बुनियादी ढांचे के लिए भारी कर्ज देते हैं। जब छोटे देश कर्ज नहीं चुका पाते, तो बड़े देश उनके बंदरगाह, हवाई अड्डे या खनिज संसाधनों पर 99 साल की लीज या सीधा नियंत्रण कर लेते हैं। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह, जिसे कर्ज न चुका पाने के कारण चीन को सौंपना पड़ा।

 

2. प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण

 

भविष्य की तकनीक (EV बैटरी, चिप्स, स्मार्टफोन) के लिए लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मेटल्स की जरूरत है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के छोटे देशों में ये संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। बड़े देश इन देशों की सरकारों के साथ ऐसे समझौते कर रहे हैं जिससे वहां के संसाधनों पर पूरी तरह बड़े देशों की कंपनियों का एकाधिकार हो जाता है। यह एक तरह की "संसाधन गुलामी" है।

 

यह भी पढ़ें- 'मोदी ने ट्रंप को कॉल नहीं किया', अमेरिकी मंत्री ने बता दी नाराजगी की वजह

 

3. सैन्य अड्डों की होड़

 

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देश जैसे मालदीव, सोलोमन आइलैंड्स, जिबूती सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। बड़े देश जैसे अमेरिका, चीन, रूस आदि छोटे देशों को आर्थिक मदद का लालच देकर वहां अपने सैन्य अड्डे बना रहे हैं। इससे उन छोटे देशों की विदेश नीति पूरी तरह बड़े देशों के इशारों पर चलने लगती है।

 

4. तकनीकी और डिजिटल निर्भरता

 

आज के युग में डेटा ही तेल है। बड़े देशों की टेक कंपनियां छोटे देशों के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को कंट्रोल करती हैं। अगर किसी देश का पेमेंट सिस्टम, इंटरनेट और डेटा सर्वर किसी बाहरी देश के पास है, तो वह देश बिना किसी युद्ध के उस छोटे देश की अर्थव्यवस्था और चुनाव को प्रभावित कर सकता है।

 

5. ग्लोबल सप्लाई चेन पर कब्जा

 

महामारी और युद्धों ने सिखाया है कि सप्लाई चेन कितनी महत्वपूर्ण है। बड़े देश छोटे देशों में अपनी फैक्ट्रियां और लॉजिस्टिक्स हब इस तरह स्थापित कर रहे हैं कि वे देश अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह उन पर निर्भर हो जाएं।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 21वीं सदी का उपनिवेशवाद 'सॉफ्ट पावर' के जरिए आता है। छोटे देश अपनी संप्रभुता खोने के कगार पर पहुंच जाते हैं क्योंकि उनके पास आर्थिक विकल्प खत्म हो जाते हैं। प्रशांत महासागर के कई छोटे देश अब जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए आर्थिक मदद मांग रहे हैं और इसी मदद की आड़ में बड़े देश वहां अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं।

Related Topic:#International News

और पढ़ें

design

हमारे बारे में

श्रेणियाँ

Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies

CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | Sitemap