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ट्रंप ने डॉलर को खतरे में डाला? क्यों घट रहा इन्वेस्टर्स का भरोसा

2 अप्रैल को डोनाल्ड ट्रंप ने भारत, चीन, पाकिस्तान, जापान, इंडोनेशिया, ब्राजील, ताइवान आदि पर टैरिफ लगाने की घोषणा की। इसकी वजह से इन देशों का अमेरिका की अर्थव्यवस्था में विश्वास कम हुआ है।

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डोनाल्ड ट्रंप। Photo Credit- PTI

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर के देशों पर महंगा रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने के चक्कर में खुद अमेरिका शिकार हो गया है। टैरिफ वॉर का सबसे पहला शिकार अमेरिकी बाजार हुआ फिर इसके बाद दूसरा शिकार अमेरिकी डॉलर हुआ है। दरअसल, 2 अप्रैल को ट्रंप ने टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जिसके बाद अमेरिका के शेयर बाजार में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली थी। अमेरिकी बाजार अभी संभल ही नहीं पाया है कि अमेरिकी डॉलर का भी मूल्य गिर गया है।

 

आर्थिक एक्सपर्ट मान रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीतियों का खामियाजा अमेरिका को इस साल के अंत तक भुगतना पड़ सकता है। कहा जा रहा है कि साल के अंत में अमेरिका में आर्थिक मंदी आ सकती है, जिसकी वजह से डॉलर के मूल्य और मांग में कमी आई है। ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ ने निवेशकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वो देश में अपना पैसा इनवेस्ट करें या नहीं। क्योंकि टैरिफ की वजह से दुनिया में डॉलर का प्रभुत्व कम हो सकता है। अगर स्थितियां ट्रंप के अनुसार नहीं हुईं को डॉलर का प्रभुत्व खत्म भी हो सकता है।

 

गिर सकता है डॉलर का मूल्य?

 

जर्मनी के ड्यूश बैंक (Deutsche Bank) के विश्लेषकों ने हाल ही में अपने ग्राहकों को लिखे एक नोट में कहा, 'दुनिया डॉलर को लेकर इस संकट से गुजर रही है कि आने वाले समय में कहीं डॉलर का मूल्य और अधिक ना गिर जाए क्योंकि ट्रंप के टैरिफ के नतीजे लगातार सामने आ रहे हैं।'

 

यह भी पढ़ें: अमेरिकी टैरिफ का मुकाबला करने के लिए पड़ोसी देशों को साधने में लगा चीन

 

लगभग 50-60 सालों से अमेरिका दुनिया के लिए एक सुरक्षित निवेश करने वाला देश बना हुआ है। कई दर्जन देश अमेरिकी डॉलर से जुड़े हुए हैं और डॉलर में ही व्यापर करते हैं। टैरिफ लगाने और उससे शेयर बाजार में गिरावट का सीधा संबंध डॉलर से है। लेकिन अब निवेशक डॉलर की मजबूती को लेकर चिंता में हैं कि आने वाले समय में यह और अधिक गिर सकता है।

 

डॉलर का क्या होगा?

 

2 अप्रैल को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत, चीन, पाकिस्तान, जापान, इंडोनेशिया, ब्राजील, सिंगापुर, ताइवान, इजरायल आदि पर टैरिफ लगाने की घोषणा की। इसकी वजह से इन देशों का अमेरिका की अर्थव्यवस्था में विश्वास कम हुआ है, जिसकी वजह से बाजार में शेयरों की तेजी से बिक्री हुई है। 2 अप्रैल को अमेरिका के शेयर मार्केट में गिरावट आने से निवेशकों को पांच ट्रिलियन से ज्यादा की गिरावट आई थी।

 

यू.एस. ट्रेजरी में इन्वेस्टमेंट को काफी लंबे समय काफी सुरक्षित माना जाता रहा है, लेकिन इसमें भी बिकवाली देखी गई, जिससे उनकी कीमत कम हो गई और अमेरिकी सरकार के लिए सस्ता लोन देना मुश्किल हो गया।

 

डॉलर में खरीदने से बच रहे निवेशक

 

ट्रंप के टैरिफ लगाने के बाद से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने अमेरिकी को सीधी चुनौती दी है। इसी का नतीजा है कि ट्रंप प्रशासन ने 9 अप्रैल को चीन से निर्यात को छोड़कर टैरिफ पर 90 दिनों की रोक की घोषणा की। इस कदम के बावजदू भी निवेशक डॉलर और उससे जुड़े एसेट्स को खरीदने से बच रहे हैं।

 

2 अप्रैल के बाद से डॉलर 3 फीसदी गिरकर तीन सालों में अपने सबसे निचले स्तर पर आ पहुंचा है, जबकि 2025 में डॉलर में 10 फीसदी की गिरावट आई है। जे सफ्रा सरसिन बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कार्स्टन जुनियस के मुताबिक,  निवेशक अमेरिकी संपत्ति बेच रहे हैं और इससे डॉलर का मूल्य गिर रहा है।

 

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अमेरिकी डॉलर महत्वपूर्ण क्यों है?

 

पिछले 80 सालों से दुनिया में अमेरिकी डॉलर को अग्रणी मुद्रा का दर्जा प्राप्त है। दुनिया के ज्यादातर देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर में बिजनेस करते हैं। इन 80 सालों में भले ही दुनिया में कितने ही उतार-चढ़ाव आए हों लेकिन डॉलर के बल पर अमेरिका ने हमेशा ही पैसा कमाया।  

 

अटलांटिक काउंसिल के मुताबिक, 2023 में दुनिया के 54 फीसदी निर्यात डॉलर में हुए थे। इससे समझा जा सकता है कि अमेरिकी डॉलर दुनिया में कितना महत्वपूर्ण है।

 

डॉलर की जगह कोई लेगा?
 
कमजोर हो रहे डॉलर को लेकर एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या भविष्य में कोई करेंसी डॉलर की जगह ले सकती है? एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही डॉलर में अभी कितनी भी गिरावट आ जाए लेकिन डॉलर फिलहाल वैश्विक मुद्रा बना रहेगा। टैरिफ वॉर के इस दौर में एक्सपर्ट्स यह भी कह रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की आर्थिक नींव कमजोर कर रहे हैं। इससे ट्रंप वैश्विक डॉलर के प्रभुत्व को कमजोर कर रहे हैं।

 

हालांकि, अगर भविष्य में डॉलर कमजोर होता है और यह वैश्विक करेंसी से बाहर होता है तो उसकी जगह यूरो ले सकता है क्योंकि यूरो वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय विदेशी मुद्रा भंडार का 20 फीसदी है।


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