डूरंड लाइन: दो हिस्सों में बंटे पश्तून, पाकिस्तान के लिए नासूर कैसे बने?
12 नवंबर 1893। पश्तूनों के साथ कुछ ऐसा हुआ था, जिसकी वजह से वे बिखर गए। उनका बिखराव, अब पाकिस्तान के लिए किसी नासूर से कम नहीं है।

डूरंड लाइन। Photo Credit: Social Media
पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सेनाएं, एक-दूसरे के क्षेत्रों में जमकर बमबारी कर रही हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान के खिलाफ जंग का एलान कर दिया है। पाकिस्तान लगातार कई महीनों से अफगानिस्तान पर आरोप लगा रहा है कि तालिबान ने पाकिस्तान के दुश्मनों को पनाह दी है। अफगानिस्तानी जमीन में पाकिस्तान को तबाह करने की साजिशें रची जा रहीं है। ख्वाजा आसिफ ने जंग का एलान करते हुए कहा है कि अब सब्र खत्म हो रही है, खुला जंग होगा। तालिबान ने पाकिस्तान के जवाब में कहा है कि अगर हमला हुआ तो करारा जवाब दिया जाएगा।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तनाव की जड़ें, दशकों पुरानी हैं। जब 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान, भारत से अलग होकर एक अलग देश बना, तभी यह तय हो गया था कि दोनों इस्लामिक देश, एक-दूसरे से कई मुद्दों पर उलझने वाले हैं। सिर्फ बलूच नहीं, पश्तूनों की कौम भी है, जिसके हित, पाकिस्तान के हितों से टकराएंगे। नए टकराव के मूल में 'डूरंड लाइन' भी है, जो पश्तूनों को दो हिस्सों में बांटती है। एक हिस्सा, अफगानिस्तान में चला गया, एक हिस्सा पाकिस्तान में। यह सामाजिक बिखराव, पाकिस्तान के लिए चुनौतीपूर्ण रहा।
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नई झड़प का इतिहास पुराना है
डूरंड रेखा, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हालिया झड़प की सबसे बड़ी वजह है। यह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा है। यह सीमा करीब 2,640 किलोमीटर लंबी है। लाइन के एक तरफ पश्तून हैं, दूसरी तरफ भी पश्तून हैं। इस लकीर ने दो देशों को बांट तो दिया लेकिन एक ऐसा घाव दिया, जिससे पाकिस्तान आज तक जूझ रहा है।
क्यों अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच खिंची डूरंड रेखा?
डूरंड रेखा, साल 1893 में अस्तित्व में आई थी। तब पाकिस्तान, अविभाजित भारत का हिस्सा था। साल 1893 में भारत के तत्कालनी विदेश सचिव मोर्टिमर डूरंड और अफगानिस्तान के 'अमीर' अब्दुर रहमान खान के बीच एक सीमा समझौता हुआ। भारत, तब ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था और अफगानिस्तान को अंग्रेज, आजाद मुल्क मान रहे थे। वहां के विदेश और कूटनीतिक मामलों पर ब्रिटेन का नियंत्रण बना रहा।
अंग्रेजों को डर था कि रूस, अफगानिस्तान के रास्ते, भारत तक बढ़कर न आ जाए, इसलिए अफगानिस्तान को दो बड़ी ताकतों के बीच एक बफर जोन बनाने का फैसला कर लिया गया। मोर्टिमर डूरंड, तब प्रभावी थे, अंग्रेजों का राज था, इसलिए रेखा भी उन्हीं के नाम पर पड़ी।
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रेखा खींचने की कवायद क्यों शुरू हुई थी?
साल 1894 में ब्रिटिश और अफगान प्रतिनिधियों के बीच एक सर्वे हुआ। 800 मील तक की जमीन के सर्वे की शुरुआत हुई। ब्रिटेन और रूस के बीच रिश्ते थोड़े सामान्य हो रहे थे। ब्रिटिश यह भांप गए थे कि अगर समझौता नहीं हुआ तो रूस, अपना साम्राज्य बढ़ाएगा, जिसकी जद में ब्रिटिश भारत की सीमाएं आएंगे।
अफगानिस्तान को क्या अखरता है?
इस सीमा को लेकर विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह पश्तून समुदाय के बीच से होकर गुजरती है। अफगानिस्तान की कोई भी सरकार इसे आधिकारिक सीमा नहीं मानती। जब हामिद करजई राष्ट्रपति थे, तब भी यह विवाद था, तालिबानी सत्ता में आए तो भी तनाव खत्म नहीं हुआ। अफगानिस्तान का तर्क है कि यह समझौता अंग्रेजों ने दबाव में कराया गया था और इसकी समय सीमा अब खत्म हो चुकी है। पाकिस्तान इसे अपनी स्थायी और अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है। पाकिस्तान का कहना है कि आजादी के बाद उसे यह सीमा विरासत में मिली है।
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मौजूदा तनाव क्यों है?
पाकिस्तान ने डूरंड लाइन पर तारबंदी शुरू की है। तालिबान को एतराज है। तालिबान का मामला है कि पश्तून लोग एक ही परिवार का हिस्सा हैं। उन्हें पाकिस्तान बांट रहा है। दोनों मुल्कों के बीच रिश्तेदारी भी है। पाकिस्तान का कहना है कि डूरंड लाइन के पास इलाकों में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाकों को अफगानिस्तान छिपा रहा है और पाकिस्तान पर हमले करा रहा है। तालिबान और स्थानीय पश्तून दोनों तरफ से इस तारबंदी का विरोध किया जा रहा है।
यह इलाका, तस्करी का भी बफर जोन है। यहां से आतंकियों को रोकना मुश्किल है। भौगोलिक चुनौतियां और मुश्किलें बढ़ाती हैं। तारबंदी की वजह से कई परिवार आपस में बंट गए हैं। आलम यह है कि उनके घर एक तरफ हैं और खेत या रिश्तेदार दूसरी तरफ। इसे लेकर सबसे ज्यादा झड़पें, स्थानीय सेना को झेलनी पड़ती हैं। दोनों तरफ सेना है तो टकराव भी आए दिन होता है। नए झड़प के वजह भी ही दशकों पुरानी समस्या है।
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