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अमेरिका से डर गया है फ्रांस! Windos के बजाय Linux अपनाकर क्या मिलेगा?

अब फ्रांस ने एलान किया है कि उसके दफ्तरों के कंप्यूटरों में Windos के बजाय Linux ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। आइए इसकी वजह समझते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI

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अमेरिका की दादागिरी से कई देश परेशान हैं। अब कई देश ऐसे भी हैं जो किसी भी मामले में अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं। ऐसा ही कुछ अब फ्रांस भी कर रहा है। फ्रांस ने अब अमेरिकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के Windos ऑपरेटिंग सिस्टम की जगह पर ओपन सोर्स वाले Linux का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। इससे पहले फ्रांस ने Zoom और माइक्रोसॉफ्ट टीम्स का इस्तेमाल भी बंद करने का एलान किया था।

 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस चाहता है कि उसके यहां इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटरों में Windos ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल न किया जाए। भले ही Linux हर जगह उपलब्ध नहीं है लेकिन जहां उपलब्ध वहां तो इसी को अपनाए जाने की तैयारी है। आगे चलकर अमेरिकी क्लाउड प्रोवाइडर्स और अन्य सेवाओं से भी दूरी बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

क्या है मकसद?

फ्रांस के एक मंत्री डेविड एमिएल ने कहा है कि उनकी कोशिश अपनी डिजिटिल डेस्टिनी का कंट्रोल वापस लेने और अमेरिकी टेक कंपनियों पर निर्भरता कम करने की है। उनका यह भी कहना है कि फ्रेंच सरकार यह स्वीकार नहीं कर सकती कि अपने देश के डेटा और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर उसका ही नियंत्रण नहीं है। हालांकि, एक और रोचक बात यह है कि फ्रांस की सरकार ने अभी यह नहीं बताया है कि यह काम कब तक और कैसे किया जाएगा। हालांकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से यह कहा जा रहा है कि पहले तो फ्रांस सरकार के कंप्यूटरों से Windos को हटाया जाएगा। 

 

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दरअसल, Windows एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसका कंट्रोल इसकी पैरेंट कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के पास है और माइक्रोसॉफ्ट अमेरिकी कंपनी है। यानी इसका डेटा यह कंपनी ऐक्सेस कर सकती है। वहीं, Linux एक ओपन सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसका कोई मालिक नहीं है और इसे अलग-अलग देश के हिसाब से अलग-अलग डेवलप भी किया जा सकता है। डेटा की सुरक्षा और संवेदनशील चीजों को देश की सीमा तक ही रखने के लिए फ्रांस और यूरोप के देश ऐसे कदम उठा रहे हैं।

 

इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि अमेरिका और यूरोप का टकराव पुराना है और इस स्थिति में कोई भी देश नहीं चाहता कि एक कंप्यूटर का इस्तेमाल करने भर से उसका संवेदनशील डेटा दूसरे देश के हाथ लग जाए। यही वजह है कि सबसे पहले फ्रांस के सरकारी दफ्तरों के कंप्यूटरों से यह ऑपरेटिंग सिस्टम हटाया जा रहा है।  

क्या है मामला?

 

दरअसल, बीते कुछ साल में ऐसे आरोप लगे हैं कि एक देश अपने टेक उत्पादों के जरिए दूसरे देशों की जासूसी का काम कर रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका और चीन के खिलाफ रहने वाले देश इन देशों के प्रोडक्ट से किनारा कर रहे हैं। इसी तरह भारत ने कई चीनी मोबाइल ऐप्स को बैन भी किया है। फ्रांस समेत यूरोप के तमाम देशों में भी इसी तरह के प्रयास हो रहे हैं। लोग चाहते हैं कि दूसरे देशों और खासकर अमेरिकी और चीनी उत्पादों पर निर्भरता कम की जाए। इसकी वजह यह है कि समय के साथ जानकारी बढ़ रही है तो यूरोप के तमाम नेता और नीति निर्माता दूसरे देशों के टेक उत्पादों के खतरों के प्रति जागरूक हो रहे हैं।

 

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इसी जाल जनवरी के महीने में यूरोप की संसद ने यूरोपियन कमीशन को निर्देश दिए थे कि वह ऐसे क्षेत्रों का पता लगाए जहां विदेशी उत्पादों पर निर्भरता कम की जा सके। फरवरी महीने में यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉ डर लेयन ने कहा था, 'मैं एकदम साफ कह देना चाहती हूं कि हमारी डिजिटल संप्रभुता, हमारी डिजिटल संप्रभुता है। हमारे यहां अभिव्यक्ति की आजादी की परंपरा पुरानी रही है और यहां तक की ज्ञान की शुरुआत ही हमारे यहां हुई थी।'

 

हाल ही में यह भी देखा गया है कि ईरान के मामले पर डोनाल्ड ट्रंप को यूरोपीय देशों का साथ नहीं मिला तो वह भड़के हुए हैं। उन्होंने कई तरह के टैरिफ की धमकी भी दी है। पिछले साल अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने पांच यूरोपी नागरिकों पर आरोप लगाए थे कि वे टेक कंपनियों पर दबाव बना रहे हैं और अमेरिकी नजरिए का दमन करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका ने इन लोगों का वीजा ही बैन कर दिया था। 


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