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लैब में जांच कराने से पहले जान लें ये बातें, वर्ना हो सकती है धोखाधड़ी

साल 2019 में नेशनल मेडिकल कमिशन ने स्पष्ट किया था कि प्रयोगशाला और रेडियोलॉजी रिपोर्ट को प्रमाणित करने के लिए डॉक्टरों की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है।

NATIONAL MEDICAL COMMISSION

नेशनल मेडिकल कमिशन। Photo Credit- (NMC)

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जब आप रक्त परीक्षण या सोनोग्राफी के लिए जाएं, तो सुनिश्चित करें कि आपकी रिपोर्ट को प्रमाणित करने वाला पैथोलॉजिस्ट या रेडियोलॉजिस्ट मौजूद हो। भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया कि प्रयोगशाला और रेडियोलॉजी रिपोर्ट को प्रमाणित करने के लिए डॉक्टर की शारीरिक उपस्थिति आवश्यक है।
  
आसान भाषा में कहें तो डॉक्टर लैब रिपोर्ट पर डिजिटल साइन या फिर सॉफटवेयर की मदद से साइन नहीं करेगा। रिपोर्ट वह खुद देखेगा वहां मौजूद होकर तब उसमें साइन करेगा। कुछ असामाजिक तत्व पैथोलॉजिस्ट आधारित पैथोलॉजी सॉफ्टवेयर की मदद से तकनीक का दुरुपयोग कर रहे हैं, जो लैब रिपोर्ट को अधिकृत करने के लिए दूर से ही रिपोर्ट बना दे रहे हैं। 

 

RTI से मिली जानकारी

 

दरअसल, डॉ. रोहित जैन ने 8 नवंबर को सूचना के अधिकार (RTI) दायर करके इसको लेकर जानकारी मांगी थी। आरटीआई में पूछा था कि क्या क्लाउड-आधारित टेलीपैथोलॉजी और टेलीरेडियोलॉजी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके लैब रिपोर्ट को दूर से भी प्रमाणित किया जा सकता है।

 

यह भी पढ़ें: DGGI की कार्रवाई से दहला GST गिरोह, 1,196 की धोखाधड़ी का पर्दाफाश

डॉ रोहित जैन ने रिपोर्ट को प्रमाणित करने के लिए एक योग्य पैथोलॉजिस्ट की उपस्थिति के अलावा, उन्होंने डिजिटल हस्ताक्षर की वैधता पर भी सवाल उठाया था। लेकिन राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का जवाब इस बात की पुष्टि करता है कि मौजूदा नियमों के तहत डॉक्टर की प्रत्यक्ष निगरानी के बिना लैब रिपोर्ट का दूरस्थ प्रमाणीकरण करने की अनुमति नहीं है।

 

डिजिटली साइन का इस्तेमाल आम बात

 

इन दिनों तकनीक के माध्यम से लैब रिपोर्ट के लिए डिजिटली स्कैन करना और साइन का इस्तेमाल आम हो गया है। इन अवैध तरीकों ने आयोग की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि इससे डॉक्टरों के साइन का दुरुपयोग किया जा सकता है। 

 

साइन के दुरुपयोग की कई घटनाएं

 

बता दें कि साइन के दुरुपयोग की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। साल 2018 में महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल ने एक ऐसे पैथोलॉजिस्ट का पर्दाफाश किया था, जिसने पूरे महाराष्ट्र में राज्य काउंसिल का फर्जी साइन करके 200 से भी ज्यादा प्रयोगशालाओं को नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर देने से रोक दिया था।

 

साल 2019 में नेशनल मेडिकल कमिशन ने स्पष्ट किया था कि प्रयोगशाला और रेडियोलॉजी रिपोर्ट को प्रमाणित करने के लिए डॉक्टरों की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है।

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