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रिचार्ज से रिकॉल तक, सियासत के बिना कैसे जनहित के मुद्दे उठा रहे राघव चड्ढा?

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा सियासत से अलग संसद में जनहित के मुद्दों को खूब उठा रहे हैं। राइट टू रिकॉल से 28 दिन के रिचार्ज के नाम पर मची लूट का जिक्र उन्होंने संसद में कई बार किया।

Raghav Chadha

गिग वर्कस के साथ राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा। ( Photo Credit: X/@raghav_chadha)

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पंजाब से आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का पिछले कुछ समय से अंदाज बदला बदला दिख रहा है। वह सियासत से इतर जनहित के मुद्दों को खूब उठा रहे हैं। कुछ समय पहले गीग वर्कस की सामाजिक सुरक्षा और 10 मिनट में डिलीवरी के खिलाफ आवाज उठाई। हालांकि बाद में सरकार ने 10 मिनट डिलीवरी वाले विज्ञापन पर रोक लगा दी।

 

हाल ही में राघव चड्ढा ने रिचार्ज के नाम पर टेलीकॉम कंपनियों की लूट को संसद में उठाया है। उन्होंने सैनिटरी पैड को अखबार में लपेटकर देने और शराब व सिगरेट को खुलेआम बेचने पर भी आपत्ति जताई। आइये जानते हैं कि राघव चड्ढा कैसे सियासत के इतर जनता से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं।

 

इनकमिंग कॉल: 11 मार्च 2023 को राघव चड्ढा ने रिचार्ज के नाम पर मची लूट का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि प्रीपेड रिचार्ज के खत्म होने पर आउटगोइंग कॉल बंद करना समझ में आता है। मगर इनकमिंग कॉल को बंद करना सरासर मनमानी है। एक रिचार्ज के कारण इनकमिंग कॉल नहीं बंद की जानी चाहिए। उन्होंने सरकार से मांग की इनकमिंग कॉल की सुविधा होनी चाहिए। रिचार्ज खत्म होने के बाद कोई संपर्क नहीं कर सकता है। ओटीपी जैसे अहम मैसेज भी नहीं आ पाते हैं। आपातकाल में इंसान बेसहारा हो जाता है। 

राघव चड्ढा की मांग

  • आखिरी रिचार्ज के बाद एक साल तक इनकमिंग कॉल्स और मैसेज बंद न हो।
  • आखिरी रिचार्ज के बाद कम से कम तीन साल तक मोबाइल नबंर एक्टिव रहे।
  • टेलीकॉम ऑपरेटर्स को सत्ता 'ओनली इनकमिंग' प्लान लाना चाहिए।

 

28 दिन का रिचार्ज: इनकॉमिंग कॉल के अलावा राघव चड्ढा ने 28 दिन के रिचार्ज का भी मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि 28 दिन का रिचार्ज स्कैम है। साल में 12 महीने होते हैं। मगर लोगों को 13 महीने का रिचार्ज करवाना पड़ता है।रिचार्ज की वैधता को कलेंडर महीने से तय किया जाना चाहिए। 

 

सैनिटरी पैड का मुद्दा: संसद में राघव चड्ढा ने कहा कि पीरियड्स नैचुरल हैं। स्टिग्मा नहीं है।अगर कोई लड़की स्कूल इसलिए मिस करती है, क्योंकि सैनिटरी पैड नहीं हैं, पानी नहीं है और प्राइवेसी नहीं है, तो यह उसकी पर्सनल प्रॉब्लम नहीं है। यह हमारा कलेक्टिव फेलियर है।

 

आगे कहा कि हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां शराब और सिगरेट खुलेआम बिकती हैं, लेकिन सैनिटरी पैड अब भी अखबार में लिपटे होते हैं। कहीं न कहीं, समाज ने एक बायोलॉजिकल फैक्ट को सोशल टैबू में बदल दिया है। उन्होंने कहा कि यह हेल्थ, एजुकेशन और इक्वालिटी का मामला है। सबसे बढ़कर यह डिग्निटी का मामला है। यह मुद्दा देश की 35 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है। 

 

पंचायतों को ताकत देने की बात: राघव चड्ढा ने हाल ही में पंचायतों को अधिक शक्ति देने की वकालत भी की। उनका तर्क है कि गांव में क्या जरूरत है, यह गांव के लोग तय करें। न कि हजारों किलोमीटर बैठा कोई बाबू। राघव चड्ढा का ने संसद में कहा कि 73वें और 74वें कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट का मकसद 'पावर को डीसेंट्रलाइज' करना था, ताकि गांव के बारे में फैसले गांव ही ले, दिल्ली या किसी राज्य की राजधानी में न हो। उनका कहना है कि आज डीसेंट्रलाइज़ेशन रुका हुआ है। उन्होंने पूछा कि क्या पंचायतें सच में सेल्फ गवर्निंग इंस्टीट्यूशन हैं, या वे सिर्फ कहीं और बनाई गई स्कीमों को लागू करने वाली एजेंसी बनकर रह गई हैं?

 

एयरपोर्ट पर महंगा खाना और लेट फ्लाइट का मुद्दा: कुछ समय पहले राघव चड्ढा ने एयरपोर्ट पर मिलने वाले महंगे खाने-पीने के सामान का मुद्दा उठाया था। हालांकि सरकार अब उड़ान यात्री कैफे के तहत सस्ती दर में खाने पीने का सामान उपलब्ध करा रही है। राघव चड्ढा ने यह भी कहा कि अधिक सामान ले जाने पर एयरलाइंस हजारों रुपये की वसूली करती हैं। मगर फ्लाइट घंटों लेट होने पर यात्रियों को कोई मुआवजा नहीं मिलता है। राघव चड्ढा ने सरकार से फ्लाइट लेट होने पर यात्रियों को मुआवजे देने की मांग उठाई।  

 

एआई का मुफ्त सब्सक्रिप्शन

25 मार्च 2025 को राघव चड्ढा ने सांसद में एआई के क्षेत्र में भारत के पिछड़ने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने देश के हर नागरिक के लिए एडवांस जेनरेटिव एआई का मुफ्त सब्सक्रिप्शन देने की मांग उठाई थी। राघव चड्ढा का तर्क था कि एआई आज सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि आगे बढ़ने, सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अवसर है। उन्होंने बताया कि चीन, सिंगापुर और यूएई जैसे देश अपने हर नागरिक को एडवांस एआई की सेवा मुफ्त में दे रहे हैं। मगर भारत में लोग इन टूल्स से वचिंत हैं, क्योंकि यह टूल्स महंगे हैं।

 

राघव चड्ढा ने सवाल किया कि अमेरिका के पास जेमिनी, चैटजीपीटी, ग्रोक और एंथ्रोपिक जैसे स्वदेशी एआई मॉडल्स हैं। चीन ने सबसे कम लागत और सबसे अधिक क्षमता वाला एआई मॉडल तैयार कर लिया है। उन्होंने पूछा कि इस एआई के युग में भारत कहां? क्या भारत इस रेस में पिछड़ता जा रहा है और भारत क्या अपना जेनरेटिव एआई मॉडल नहीं बना पाएगा। 

 

 

प्राइवेट सेक्टर में वेतन वृद्धि का मुद्दा

9 फरवरी 2026 को राघव चड्ढा ने देश में 'इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिविजन एक्ट' की मांग उठाई। उन्होंने यह भी बताया कि इसकी जरूरत क्यों हैं। उन्होंने लोगों की सैलरी को महंगाई से इंडेक्स करने की बात कही और बताया कि वित्तीय वर्ष 2018 से 2026 तक सैलरी पाने वाले भारतीयों की असली सैलरी में 16 फीसद की कमी आई है। इसका मतलब यह है कि महंगाई की तुलना में वेतन में इजाफा नहीं हुआ। उनका कहना है कि आज वेज इंडेक्सेशन फॉर्मूला आज की जरूरत है।

 

राघव चड्ढा का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों को हर साल डियरनेस अलाउंस और कुछ वर्षों में पे कमीशन के माध्यम से यह मिलता है। अमेरिका, जर्मनी और जापान में मंहगाई के हिसाब से सैलरी बढ़ाई जाती है। बेल्जियम में हर तीन महीने में इजाफा होता है। भारत बड़ी अर्थव्यवस्था में इकलौता देश हैं, जहां हमारे 85% फॉर्मल वर्कफोर्स के पास जीरो स्टैच्युटरी इन्फ्लेलेशन प्रोटेक्शन है। उन्होंने अपने वेतन में इजाफा की खातिर नियोक्ता की दया और अपनी मोल-भाव की ताकत पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत में मिनिमम सैलरी बढ़ोतरी का होना जरूरी है।

 

 

 

 

राघव चड्ढा ने बताया-

  • अमेरिका में ऑटोमैटिक रिविजन के साथ COLA सिस्टम लागू।
  • जर्मनी हर 18 से 24 महीने में सैलरी में बढ़ोतरी की जाती है।
  • जापान में सालाना शंटो सिस्टम के माध्यम से इजाफा होता है।
  • बेल्जियम में हर तीन महीने में ऑटोमैटिक इंडेक्सेशन जरूरी है।

 

 

 

वन नेशन, वन मेडिकल


9 फरवरी 2026 को राघव चड्ढा ने वन नेशन, वन मेडिकल ट्रीटमेंट की तरफ बढ़ने की वकालत की। जहां बिना किसी टेंशन के सभी को अच्छी मेडिकल केयर मिल सके। उन्होंने बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को कम धन आवंटन का विरोध जताया। हेल्थ पर काम खर्च का असर है कि अस्पतालों में स्टाफ की कमी है। लंबी लाइन, मशीनों और दवाइयों की कमी के कारण लोगों को प्राइवेट अस्पताल जाना पड़ता है। हेल्थ इमरजेंसी के बाद कर्ज की इमरजेंसी बन जाती है। 

 

 

 

 

खाद्य पदार्थ में मिलावट का मुद्दा

4 फरवरी को राघव चड्ढा ने संसद में खाने में मिलावट का मुद्दा उठाया है। उनका दावा है कि बाजार में शुद्धता का लेबल लगाकर खुलेआम जहर बेचा जा रहा है। दूध, मशाले, खाने वाले तेल और पेय पदार्थ में खतरनाक केमिकल्स की मिलावट हो रही है। आज दूध में यूरिया, सब्जियों में ऑक्सीटोसिन, पनीर में कास्टिक सोडा, मसालों में ईंट का पाउडर, पोल्ट्ररी में 'स्टेरॉयड और आइसक्रीम में डिटर्जेंट मिल रहा है। राघव चड्ढा ने एफएसएसएआई को अधिक मजबूत करने की मांग की। मिलावट खोरों पर जुर्माना बढ़ाने की मांग की। फर्जी विज्ञापनों पर भी रोक लगाने का सुझाव दिया। 

 

 

 

'राइट टू रिकॉल' की मांग

11 फरवरी 2026 को राघव चड्ढा ने ‘राइट टू रिकॉल’ का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि अगर वोटर नेता को हायर कर सकते हैं, तो उन्हें नेता को फायर करने का भी अधिकार होना चाहिए। अगर चुना हुआ विधायक और सांसद सही से काम नहीं करता है तो जनता के पास उसे हटाने का अधिकार होना चाहिए। इसके लिए उसे पांच साल का इंतजार क्यों करना? आप सांसद ने बताया कि दुनियाभर में 24 से अधिक लोकतंत्र में किसी न किसी रूप में राइट टू रिकॉल सिस्टम लागू है। उन्होंने भारत में भी ऐसा ही सिस्टम बनाने की मांग उठाई। गलत इस्तेमाल रोकने की खातिर सुरक्षा उपाय भी बताए। 

 

 

 

 

 

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