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लोकसभा में हो जाएंगी 850 सीटें, महिलाओं को मिलेगा रिजर्वेशन, कैसे होगा सबकुछ?

संसद में मंगलवार को तीन बिल पेश किए गए। लोकसभा में सीटों की संख्या को बढ़ाकर 545 से 850 कर दिया जाएगा और महिलाओं के एक तिहाई रिजर्वेशन का प्रावधान किया गया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI

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मंगलवार को केंद्र सरकार ने तीन महत्वपूर्ण बिल संसद में पेश किए हैं। इन बिलों से देश में नई जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों का नया बंटवारा ( परिसीमन) होगा। लोकसभा की मौजूदा 545 सीटों को बढ़ाकर 850 तक किया जा सकता है। साथ ही संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण भी लागू हो जाएगा। यह लंबे समय से लंबित सुधार को पूरा करने की दिशा में बड़ा कदम है।


1971 की जनगणना के बाद से लोकसभा की सीटों में बदलाव पर रोक लगी हुई थी। इसका उद्देश्य था कि राज्य जनसंख्या नियंत्रण करें लेकिन अब देश की जनसंख्या बहुत बदल चुकी है। शहर बढ़ गए हैं, लोग एक जगह से दूसरी जगह गए हैं और कुछ राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है। इसलिए सरकार अब नई जनगणना के आंकड़ों पर सीटों का नया बंटवारा करना चाहती है।


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850 हो जाएगी सीटों की संख्या

संविधान के अनुच्छेद 81 में बदलाव करके लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 550 की जगह 850 करने का प्रस्ताव है। इसमें राज्यों के लिए 815 और संघ क्षेत्रों के लिए 35 सीटें होंगी। अनुच्छेद 82 का शीर्षक भी बदलकर ‘निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण’ किया जाएगा। अब हर जनगणना के बाद सीटें अपने आप नहीं बदलेंगी, बल्कि संसद जो तय करे उसी जनगणना के आधार पर बदलाव होगा।

 

2021 की जनगणना अभी पूरी नहीं हुई है, इसलिए 2026 या उसके बाद की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल होगा। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बिल के उद्देश्य में लिखा है कि 1971 की जनगणना वाली रोक अब जरूरी नहीं रही। देश में जनसंख्या में बहुत बदलाव हो चुका है। दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण अच्छा किया लेकिन उत्तर और हिंदी पट्टी के राज्यों में आबादी ज्यादा बढ़ी। नई व्यवस्था से यह असमानता दूर होगी।

परिसीमन आयोग कैसे काम करेगा?

परिसीमन बिल में एक आयोग बनाने का प्रावधान है। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के जज होंगे और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होंगे। आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां मिलेंगी।

आयोग का काम होगा:

  • राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा करना

  • निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करना

  • एससी, एसटी और महिलाओं के लिए आरक्षण तय करना

आयोग को यह ध्यान रखना होगा कि क्षेत्र भौगोलिक रूप से कॉम्पैक्ट हों तथा प्रशासनिक इकाइयों की सीमाएं, संचार सुविधाएं और जनता की सुविधा का भी ध्यान रखा जाए। मसौदा तैयार करके सार्वजनिक आपत्तियां ली जाएंगी और सुनवाई होगी। अंतिम आदेश कानून की तरह लागू होंगे और अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। तीसरा बिल दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे संघ क्षेत्रों के कानूनों में बदलाव करेगा ताकि वहां भी नई सीटें और महिलाओं का आरक्षण लागू हो सके।

हो रहा राजनीतिक विवाद

यह कदम राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील है। 1970 के दशक से दक्षिण के राज्य (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र) ने जनसंख्या नियंत्रण अच्छा किया था, अब चूंकि सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा इसलिए उनकी सीटें कम होने का अंदेशा है लेकिन अब नई जनगणना से हिंदी पट्टी के राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि) को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। इससे दक्षिण के राज्यों का संसद में प्रभाव कम हो सकता है।

 

सरकार ने वादा किया है कि राज्यों का मौजूदा अनुपात नहीं बदलेगा। परिसीमन आयोग को ऐसा फॉर्मूला निकालना होगा जो सभी को संतुलित रखे। विपक्ष ने महिलाओं के आरक्षण का स्वागत किया है लेकिन ओबीसी महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग की है। साथ ही सीट बंटवारे को लेकर चिंता जताई है।

बदलेगी राजनीति

लोकसभा के 850 सदस्य होने से बहुमत का आंकड़ा बढ़ जाएगा। इससे गठबंधन राजनीति प्रभावित होगी। महिलाओं की आरक्षित सीटें हर बार रोटेट होने से पुराने नेताओं के गढ़ प्रभावित होंगे। पार्टियों को नए उम्मीदवार चुनने और ग्रासरूट स्तर पर रणनीति बदलनी पड़ेगी। हालांकि, इसका दूसरा पक्ष भी है कि नेता समय समय पर अपने घर की किसी महिला या अपनी पत्नी को अपनी सीट से चुनाव लड़ा सकते हैं।

महिलाओं को मिलेगा आरक्षण

2023 में संसद ने महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण का कानून पास किया था लेकिन उसे जनगणना और डिलिमिटेशन के बाद लागू करने की शर्त रखी गई थी। अब इन नए बिलों से वह शर्त पूरी हो जाएगी। लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं में कुल सीटों का एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित रहेगा। एससी और एसटी कोटे में भी महिलाओं का आरक्षण शामिल होगा।

 

ये आरक्षित सीटें समय समय पर रोटेट होंगी। आरक्षण शुरू होने के 15 साल बाद संसद इसे बढ़ा भी सकती है। इससे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी। कानून मंत्री ने कहा कि अगली जनगणना और परिसीमन में समय लगेगा, इसलिए महिलाओं को इंतजार न करवाया जाए।

 

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क्या बोले कानून मंत्री?

कानून मंत्री के अनुसार, पुरानी व्यवस्था से जनसंख्या और सीटों में बहुत असमानता हो गई थी। कुछ क्षेत्रों में एक सांसद लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है तो कहीं कम। नई व्यवस्था लोकतंत्र को ज्यादा समावेशी और न्यायपूर्ण बनाएगी। महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से नीतियां भी बेहतर होंगी।

 

विपक्ष का कहना है कि परिसीमन से पहले जातिगत जनगणना या ओबीसी आरक्षण पर भी विचार होना चाहिए लेकिन सरकार इसे महिलाओं के सशक्तीकरण का बड़ा कदम बता रही है। यह बिल पास होने के बाद परिसीमन आयोग गठित होगा। नई जनगणना के आंकड़े आने के बाद काम शुरू होगा। अगले लोकसभा चुनाव में इन बदलावों का असर दिख सकता है।

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