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छत्तीसगढ़ या ओडिशा, 'महानदी' के पानी पर किसका हक ज्यादा? तय नहीं कर पा रही सरकार

महानदी, ओडिशा के लिए जीवन रेखा की तरह है। करीब 47 फीसदी हिस्सा, ओडिशा से होकर बता है। छत्तीसगढ़, इसके पानी का नियंत्रण करता है, जिसे लेकर ओडिशा को आपत्ति है।

Hirakud Dam

हीराकुंड बांध। Photo Credit: Social Media

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नदियां, जोड़ने के लिए मशहूर रही हैं। राज्यों को, संस्कृतियों को और देशों को। नदियां, बेरोक-टोक बहती हैं, लेकिन उनके पानी के लिए राज्य उलझते हैं, देश उलझते हैं। जो राज्य पहले पड़ता है, पानी पर अपना बुनियादी हक समझता है। जब भी कोई कवायद नदी पर डैम बनाने की होती है या नदियों के पानी को रोकने के लिए होती है, हंगामा मच जाता है। कावेरी, कृष्णा, रावी, ब्यास और महादयी नदियों का जल विवाद अक्सर सुर्खियों में रहता है। उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम, हर जगह, एक जैसी ही वजहें होती हैं, जिन्हें लेकर राज्यों में अनबन होती है। अब  देश के दो राज्य नदियों को लेकर उलझ रहे हैं। दिलचस्प यह है कि दोनों राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार है। ये राज्य ओडिशा और छत्तीसगढ़ हैं। दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी, सत्तारूढ़ है। हंगामा महानदी को लेकर मची है। 

महानदी, दोनों राज्यों के बीच जीवनरेखा की तरह देखी जाती है। यह नदी करीब 851 किलोमीटर लंबी है। छत्तीसगढ़ के सिहावा से निकलने वाली नदी, ओडिशा होते हुए बंगाल की खाई में मिलती है। सिहावा, धमतरी जिले का पहाड़ी हिस्सा है। यहीं इस नदी का उद्गम स्थल भी है। महानदी, छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों राज्यों में बहती है। इसका मैदानी इलाका करीब 141,600 वर्ग किलोमीटर तक फैला है।  नदी का करीब 53 फीसदी हिस्सा छत्तीसगढ़ में पड़ता है, 45 फीसदी हिस्सा ओडिशा में। यह नदी, दोनों राज्यो के लिए बेहद अहम है। 

यह भी पढ़ें: भारत में नदी जल विवाद  क्यों होते हैं और क्या कहता है कानून?

ओडिशा महानदी के लिए बेचैन क्यों है?

ओडिशा इस नदी पर अपना हक मानता है, क्योंकि यहां यह नदी 500 किलोमीटर तक बहती है। ओडिशा में इस नदी से करीब 1.62 करोड़ लोग सीधे प्रभावित होते हैं। खेती किसान, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिए यह नदी, अहम कड़ी है। महानदी के मैदानी हिस्से में कई प्रोजेक्ट हैं, स्टील प्लांट हैं, थर्मल पावर प्लांट हैं। यह वहां की औद्योगिक जीवन रेखा भी है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच इसे लेकर विवाद दशकों पुराना है।


ओडिशा या छत्तीसगढ़, किसकी है महानदी?

महानदी की शुरुआत छत्तीसगढ़ से होती है, ओडिशा में इसका विस्तार होता है। छत्तीसगढ़ में यह नदी, ऊंचाई पर है, ओडिशा में ढलान की तरफ बढ़ती है। महानदी के पानी नियंत्रित करने की स्थिति में है। ओडिशा का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने बिना ओडिशा सरकार को सूचना दिए नदियों पर बांध बना लिया, बैराज बना लिए। अब ओडिशा का कहना है कि जब मॉनसून खत्म होता है, राज्य में पानी की किल्लत शुरू होती है, तब ओडिशा को पानी ही नहीं दिया जाता। ओडिशा के कई जिलो में सूखा और पानी की कमी हो जाती है। 

 
कितना पुराना विवाद है?

यह विवाद साल 1937 से ही है। 8 दशक से ज्यादा पुराने इस विवाद के लिए छत्तीसगढ़ को जिम्मेदार बताया जाता है। छत्तीसगढ़ नदी के ऊपरी हिस्से में बांध और बैराज बनाता है, जिसकी वजह से ओडिशा में पानी कि किल्लत हो रही है। हीराकुंड बांध के निर्माण पर तत्कालीन मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के साथ पानी बंटवारे की चर्चा हुई थी। साल 1957 में एक बांध बना। 1983 में मध्य प्रदेश और ओडिशा के बीच एक समझौता हुआ। कुछ साल सामान्य रहा, 2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो विवाद बढ़ता गया। 
 

यह भी पढ़ें: दुनिया के बड़े जल विवाद, घटते पानी ने क्यों देशों के बीच बढ़ाई टेंशन? 

ओडिशा के तर्क क्या हैं?

ओडिशा का कहना है कि छत्तीगढ़ ने महानदी की सहायक नदियों पर 7 बैराज तैयारकर लिया है। जब राज्य में पानी की मांग बढ़ती है तो जल प्रवाह 30 से 70 फीसदी तक कम हो जाता है। ओडिशा में महानदी के पानी को नियंत्रित करने वाला बांध हीराकुंड है। पानी न मिलने की वजह से सिंचाई और पेयजल संबंधी ओडिशा की जरूरतें कम पूरी हो पाती हैं। छत्तीसढ़ सरकार कहती है कि महानदी के पानी को राज्य अपनी जरूरतों के लिए इस्तेमाल कर रहा है, सिंचाई और उद्योगों के लिए पानी का इस्तेमाल हो रहा है, इससे ओडिशा को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा है। 

विवाद सुलझाने के लिए क्या कर रही है सकार?

साल 2016 में यह विवाद तब बढ़ गया, जब ओडिशा सरकार ने ज्यादा पानी की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। साल 2018 में विवाद सुलझाने के लिए महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का गठन हुआ। ट्रिब्यूनल के फैसले क्या रहे, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। साल 2025 में भी दोनों राज्यों ने विवाद सुलझाने की कोशिश की थी लेकिन हल नहीं निकला। साल 2016 में केंद्र सरकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और रमन सिंह के साथ मुद्दे पर चर्चा के लिए अपील की थी लेकिन ओडिशा की तत्कालीन बीजू जनता दल की सरकार ने कहा केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का साथ दे रही है। 

कोर्ट क्यों नहीं सुलझा पा रहा है विवाद? 

साल 2016 में ओडिशा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि विवाद का हल निकाला जाए। ओडिशा सरकार ने विवाद के निपटारे के लिए ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की थी। केंद्र सरकार ने साल 2018 में विवाद सुलझाने के लिए एक 'महानदी वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल' का गठन किया। इस ट्रिब्यूनल का जज, सुप्रीम कोर्ट के एक जज बनाया गया था। विवाद सुलझाने की जगह एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन मिलता रहा। नई समयसीमा अप्रैल 2026 में खत्म हो रही है। जस्टिस बेला त्रिवेदी इसकी अध्यक्षता करते हैं। अंतिम फैसले का इंतजार है। 

यह भी पढ़ें: भारत के 5 बड़े नदी जल विवाद जिनको लेकर सरकारों में होता है टकराव

अब क्यों सुर्खियों में आया है मामला?

ओडिशा में बीजेपी की सरकार है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी हैं। छत्तीसगढ़ के सीएम विष्णु देव साय हैं। दोनों सरकारें बीजेपी की ही हैं। छत्तीसगढ़ ने कहा है कि प्रस्ताव पर अभी विचार चल रहा है। ओडिशा में एक उच्च स्तरीय समिति भी बनी है। इसकी अध्यक्षता डिप्टी सीएम केवी सिंह देव कर रहे हैं। बीजेपी, बीजेडी और कांग्रेस के विधायकों चर्चा जनवरी के अंत में होने वाली है। 

सियासत क्यों हो रही है?

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस तो ओडिशा में बीजेडी मुख्य विपक्षी पार्टी है। नवीन पटनायक की अगुवाई वाली पार्टी ने बताया है कि केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकार ओडिशा के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही है। बीजेडी ने अब राज्यव्यापी प्रदर्शन की धमकी दी है। कांग्रेस का कहना है कि क्या फायदा दोनों राज्यों और केंद्र में एक जैसी सरकार होने का जब करोड़ों लोगों की जीवन रेखा कही जाने वाली नदी का विवाद नहीं सुलझा पा रहा है।  

 


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