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'हिंदू नहीं रहा तो दुनिया नहीं रहेगी', मणिपुर में ऐसा क्यों बोले मोहन भागवत?

संघ प्रमुख मोहन भागवत मणिपुर के तीन दिवसीय दौरे पर हैं। अपनी यात्रा के दूसरे दिन मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुओं के बिना दुनिया का अस्तित्व नहीं रहेगा। उन्होंने संदर्भ के तौर पर यूनान, मिस्र और रोम साम्राज्य का जिक्र किया।

RSS Chief Mohan Bhagwat.

संघ प्रमुुख मोहन भागवत। (Photo Credit: ANI)

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मणिपुर में बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के बिना दुनिया का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे दुनिया के कई देश खत्म हो गए। मगर भारत इससे अछूता रहा। भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि भारत ने यूनान, मिस्र और रोम जैसे साम्राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। भारत का हिंदू समाज अमर है। संघ प्रमुख मोहन भागवत मणिपुर की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। अपनी यात्रा के दूसरे दिन उन्होंने यह बयान दिया। 

 

मोहन भागवत ने कहा, 'परिस्थिति का विचार तो सबको करना पड़ता है। परिस्थिति आती और जाती है। दुनिया में सब देशों पर तरह-तरह की परिस्थिति आई। कई देश उसमें समाप्त हो गए। यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। भारत एक अमर समाज और सभ्यता का नाम। बाकी सब आए, चमके और चले गए। इन सबके उदय और अस्त को हमने देखा है। हम अभी भी हैं और रहेंगे, क्योंकि अपने समाज का मौलिक नेटवर्क हमने बनाया। उसके चलते हिंदू समाज रहेगा। हिंदू नहीं रहेगा तो दुनिया नहीं रहेगी।'

 

 

 

 

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'सियासी मजबूरी में अलग-अलग बयान देते हैं नेता'

संघ प्रमुख ने कहा कि सियासी मजबूरियों की वजह से नेता अलग-अलग बयान देते हैं। मगर मूलभूत समझ यह है कि पूरा भारत हमारा है। उन्होंने कहा कि भारतवर्ष आज से नहीं है। हमेशा से भारतवर्ष रहा है। महाभारत, रामायण और कालिदास के काव्य में भारतवर्ष का वर्णन है। मणिपुर से अफगानिस्तान तक  के प्रदेशों, राजा और उनके संबंध, प्रजा और तीर्थस्थानों का उल्लेख है।

 

 

 

 

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संघ प्रमुख ने आगे कहा कि लोगों का आना जाना चल रहा। राज्य बदल गए। कभी अनेक राजा था। कभी एक चक्रवर्ती साम्राट था। कभी हम स्वतंत्र थे, कभी हम परतंत्र थे। मगर भारत हमेशा एक राष्ट्र रहा है।यह सबकी मान्यता है। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद दुनिया का पॉलिटिकल सेटअप बदल गया। उसमें राजनीतिक स्वार्थ के कारण लोग उलटी भाषा बोलने लगे। नहीं तो हमारे सभी नेताओं की मूल समझ थी कि पूरा भारत अपना और एक है।  


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