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कुलदीप सेंगर को SC से नहीं मिली राहत अब जेल में कटेगा वक्त, हाई कोर्ट भेजा केस

कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली और उसे जेल में ही रहना होगा; कोर्ट ने हाई कोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने का आदेश दिया है।

कुलदीप सिंह सेंगर, Photo Credit: PTI

कुलदीप सिंह सेंगर, Photo Credit: PTI

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जेल में बंद बीजेपी के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। उन्होंने उन्नाव रेप पीड़िता के पिता के कस्टोडियन डेथ मामले में सजा में रियायत दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई थी। कुलदीप सेंगर ने यह उम्मीद लगाई थी कि सु्प्रीम कोर्ट उन्हें जमानत दे देगा। यह पूरा विवाद पीड़िता के पिता की पुलिस कस्टडी में हुई मौत से जुड़ा है, जिसमें सेंगर को 10 साल की सजा मिली हुई है। सेंगर के वकीलों ने कोर्ट में दलील पेश करते हुए कहा कि उन्हें जेल में काफी समय हो गया है, इसलिए उन्हें अब बाहर आने का मौका मिलना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस दलील को नहीं माना।

 

सोमवार को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि सेंगर को तुरंत कोई राहत नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने उनकी 10 साल की सजा पर रोक लगाने से मना कर दिया, जिसका सीधा मतलब है कि उन्हें फिलहाल जेल के अंदर ही रहना होगा। हालांकि, अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट को इस मामले में एक जरूरी निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट इस मामले की सुनवाई तेजी से करे और अगले तीन महीने के भीतर इस पर अपना फैसला सुनाए। यानी अब सेंगर की किस्मत का फैसला अगले 90 दिनों में हाई कोर्ट के हाथ में होगा।

 

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सजा के सालों पर हुई बहस 

सेंगर के वकीलों ने दलील दी कि अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा यानी साढ़े नौ साल वह जेल में काट चुके है। चीफ जस्टिस ने साफ किया कि रिकॉर्ड के हिसाब से सेंगर ने अभी सिर्फ सात साल से कुछ ज्यादा का समय ही जेल में बिताया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला समाज और नैतिकता के नजरिए से बहुत गंभीर है, इसलिए इस तरह के अपराधी को सजा में राहत देने पर बहुत सोच-विचार करने की जरूरत है।

 

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वकीलों को पड़ी फटकार 

सुनवाई के दौरान एक और बड़ी बात सामने आई जब कोर्ट ने सेंगर के वकीलों को जमकर फटकार लगाई। जज इस बात से नाराज दिखे कि मामले को लेकर बाहर मीडिया में बयानबाजी की जा रही है। कोर्ट ने वकील को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कोर्ट के बाहर इस तरह का 'मीडिया ट्रायल' जारी रहा, तो वकालत का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैसला केवल मेरिट और सबूतों के आधार पर होगा, न कि बाहर बनाए जा रहे माहौल के आधार पर।


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