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राफेल के सोर्स कोड क्यों छिपा रहा फ्रांस, भारत को नुकसान क्या है?

फ्रांस, भारत को राफेल तो दे रहा है लेकिन सोर्स कोड नहीं। फ्रांस सरकार की मंशा भी नहीं है। भारत के लिए यह झटका क्यों है, खतरे क्या हैं, आइए समझते हैं।

Rafale PTI

राफेल विमान। Photo Credit: PTI

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फ्रांस, रक्षा क्षेत्र में भारत का मजबूत भागीदार बनता जा रहा है। रूस के बाद, फ्रांस ही ऐसा देश है, जिसे भारत ने अपना सबसे बड़ा रणनीतिक भागीदार बनाया है। फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन भारत को विमान तो दे रही है लेकिन तकनीक नहीं। अब वहां के सरकार ने भी यह साफ इशारा किया है सर्वर कोड नहीं सौंपा जाएगा। अगर सोर्स कोड नहीं मिलेगा तो भारत, मनचाहे तरीके से इन विमानों को न तो अपग्रेड कर पाएगा, न ही विमानों में अपने तरीके से हथियारों को इंस्टाल कर सकेगा।

सोर्स कोड न होने की वजह से भारत की निर्भरता फ्रांस पर बनी रहेगी। जब राफेल की कवायद शुरू हुई थी, तब से ही इस बात पर जोर दिया जा रहा था कि फ्रांस, भारत को सिर्फ लड़ाकू विमान नहीं देगा बल्कि सोर्स कोड भी देगा। फरवरी 2022 में 35 राफेल विमान आए थे। महीनों तक, सब शांत रहा, अब एक बार फिर कवायद शुरू हुई है कि 114 राफेल विमान, भारत को सौंपे जाएंगे।

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फ्रांस की बिजनेस मैगजीन L’Essentiel de l’Éco में फ्रांस सरकार ने आधिकारिक तौर पर कह दिया है कि विमान तो सौंपे जाएंगे लेकिन उनका डेटा शेयर नहीं किया जाएगा। भारत के लिए यह झटके की तरह है। अगर ऐसा हुआ तो भारत एक ऐसा खरीदार बना रहेगा, जिसे अपने ही विमान को अपग्रेड कराने के लिए उनकी रहम पर निर्भर रहना पड़ेगा, फ्रांस तय करेगा कि तकनीक का ट्रांसफर हो या नहीं होगा। 

क्या नहीं देगा फ्रांस?

भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल लड़ाकू विमानों का बड़ा सौदा चल रहा है। यह भारत का अब तक का सबसे महंगा हथियार सौदा होने वाला है। फ्रांस के एक बिजनेस अखबार  L’Essentiel de l’Éco की रिपोर्ट बताती है कि राफेल के सबसे जरूरी सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड नहीं दिए जाएंगे। फ्रांस भारत को स्पेक्ट्रा, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के सोर्स कोड, गोपनीय ही रखेगा।

राफेल लड़ाकू विमान। Photo Credit: PTI

 

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क्या होगा इससे?

भारत इन विमानों में अपने खुद के सेंसर, हथियार या सॉफ्टवेयर को बिना फ्रांस की मदद और मंजूरी के पूरी तरह से नहीं जोड़ पाएगा या बदल नहीं पाएगा। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि पहले के 36 राफेल सौदे में भी सोर्स कोड न मिलने से भारत को दिक्कत हुई थी। 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ'ऑपरेशन सिंदूर' में  राफेल के नुकसान की बात सामने आई थी, जिसके बारे में यह कहा गया कि सोर्स कोड होता तो शायद बेहतर तरीके से बिना नुकसान के भी काम बन जाता।

भारत क्या चाहता है?

भारत इस नए सौदे में भारतीय हथियारों को पूरी तरह से जोड़ने की मांग कर रहा है। फ्रांस सोर्स कोड को अपनी बहुत सालों की मेहनत से बनी प्रॉपर्टी मानता है, जिसे किसी देश के साथ शेयर नहीं करना चाहता। पहले 36 राफेल सौदे में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात कही गई थी। फ्रांस इसे खारिज कर रहा है।

भारत, अपने हिसाब से विमानों को अपग्रेड करना चाहता है। बार-बार दबाव बन रहा है लेकिन लोकल कंटेंट और इंजीनियरिंग ट्रांसफर की मांग नहीं पूरी हो पा रही है। जब डील फाइनल हो जाएगी, तब पहला विमान डील साइन होने के 42 महीने बाद मिलेगा।

राफेल लड़ाकू विमान। Photo Credit: PTI

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भारत के पास क्या विकल्प हो सकते हैं?

फ्रांस, भारत को सोर्स कोड न देकर, एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस दे दे, जिससे बिना सोर्स कोड देखे अपने सिस्टम इंस्टालेशन में दिक्कत न हो। फ्रांस, UAE को भी राफेल बेचता है। जो राफेल उन्हें मिला है, उनमें प्लग-एंड-प्ले ऑप्शन है, UAE अपना हथियार जोड़ सकता है। भारत बदलावों की मांग कर रहा है। 

किस तरह के विमान भारत आ रहे हैं?

भारत के पास अभी F3-R रेंज के राफेल हैं। इन्हें भारत के हिसाब से मॉडिफाई किया गया है। नए 114 विमान F4 स्टैंडर्ड के होंगे और आखिरी 24 को F5 स्टैंडर्ड तक दिया जा सकता है। ये विमान, जनरेशन 4.5 के होने के दावे किए जा रहे हैं। सौदे में 18 विमान फ्रांस से तैयार हालत में आएंगे, बाकी 96 भारत में असेंबल होंगे। शुरुआत में स्थानीय हिस्सेदारी 30 फीसदी रहेगी, जिसे 60 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है।

फ्रांस को इससे क्या हासिल होगा? 

एकाधिकार: फाइटर जेट बनाने में फ्रांस की खूबियां, वैश्विक स्तर की हैं। राफेल, चौथी पीढ़ी के विमान में सबसे बेहतर माना जाता है। फ्रांस इसे अपग्रेड करके भारत को 4.5 वर्जन में दे रहा है। फ्रांस, भारत से मुनाफा तो कमाना चाहता है लेकिन तकनीक नहीं देना चाहता। भारत को अगर तकनीक मिलता तो भारत के लिए नई संभावनाएं खुलतीं, ज्यादा बड़े मौके मिलते। 

मुनाफा: रक्षा जरूरतें वक्त के साथ बदलती रहती हैं। अमेरिका 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बना चुका है। चीन के पास भी 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं। भारत, दोनों देशों से दशकों पीछे है। भारत का तेजस प्रोजेक्ट भी अभी पूरी तरह से उस रूप में नहीं मिला है, जिसकी मांग की जा रही है। राफेल की तकनीक मिल नहीं रही है, मिराज और मिग जैसे विमानों के भरोसे, सीमाओं की सुरक्षा बहुत नहीं की जा सकती है। ऐसे में जब-जब अपग्रेडेशन की जरूरत पड़ेगी, भारत को ज्यादा पैसे देने होंगे। 

राफेल लड़ाकू विमान। Photo Credit: PTI

भारत क्या नहीं कर सकेगा?

सोर्स कोड के बिना भारत, सॉफ्टवेयर में अपनी मर्जी से कोई बदलाव नहीं कर पाएगा। अगर भविष्य में इसमें कोई नया स्वदेशी हथियार या कोई नया सेंसर जोड़ना होगा तो फ्रांस की मदद लेनी होगी। फ्रांस की अनुमति पर निर्भर रहना होगा। विमान के इलेक्ट्रॉनिक्स और रडार सिस्टम कैसे काम करते हैं, इसकी पूरी जानकारी फ्रांस के पास ही रहेगी। किसी भी तकनीकी खराबी या सॉफ्टवेयर अपडेट के लिए भारत को हमेशा फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन पर निर्भर रहना पड़ेगा।  

सोर्स कोड न मिलने का मतलब है कि फाइटर जेट, रहस्य की तरह नजर आएगा। भारत यह पूरी तरह नहीं जान पाएगा कि सॉफ्टवेयर के अंदर क्या कोडिंग की गई है। भारत की नीति रक्षा उपकरणों के स्वदेशीकरण की है। अगर भारत को महत्वपूर्ण तकनीक और सोर्स कोड नहीं मिलते, तो भारतीय इंजीनियर इस प्रणाली को समझ नहीं पाएंगे।

भविष्य में खुद के उन्नत लड़ाकू विमान विकसित करने के लिए राफेल जैसे उन्नत विमान की तकनीक से दूर रह जाएंगे। नई लड़ाइयां, अब 'नेटवर्क सेंट्रिक' होती हैं। सॉफ्टवेयर की जरूरत पड़ती है। अगर जंग के दौरान सॉफ्टवेयर में कोई बदलाव या सुधार की जरूरत पड़ेगी तो बिना सोर्स कोड भारत नहीं कर पाएगा। भारत, इन्हीं बदलावों की मांग कर रहा है। 

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