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चश्मदीद ने सुनाई कहानी, कैसे ‘कलमा’ की जानकारी ने बचा ली जान

पहलगाम में हुए आतंकी हमले में एक चश्मदीद ने बताया कि कैसे उसके सामने ही आतंकी लोगों को गोली मार रहे थे, लेकिन उसकी जान बच गई।

 । Photo Credit: PTI

पहलगाम हमले का विरोध करते लोग । Photo Credit: PTI

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पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। 26 लोगों की जान जा चुकी है और कई लोग अस्पताल में भर्ती हैं जिनका इलाज चल रहा है। बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घायलों से मुलाकात की और जिन लोगों की इस घटना में मौत हुई है उनके परिवारवालों को 10 लाख रुपये देने की बात कही है।

 

इस घटना में 26 लोगों की जान गई जिनमें से 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक था, लेकिन इसमें एक शख्स ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी सूझबझ से अपनी जान बचा ली। असम के प्रोफेसर पहलगाम में हुए हमले में बाल-बाल बच गए थे। 'कलमा' (इस्लामिक आस्था की घोषणा) जानने के कारण ही आतंकी हमले के दौरान वह बच गए।

 

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सामने ही मारी गोली

एनडीटीवी के मुताबिक सिलचर में असम विश्वविद्यालय में बंगाली पढ़ाने वाले प्रोफेसर देबाशीष भट्टाचार्य ने बताया कि उनके सामने एक व्यक्ति को गोली मारी जा रही थी और कैसे 'कलमा' पढ़ने की वजह से उनकी जान बच गई।

 

भट्टाचार्य ने कहा कि वे और उनका परिवार छुट्टी मनाने जम्मू-कश्मीर गए थे और मंगलवार को सैकड़ों अन्य पर्यटकों के साथ बैसरन की सुंदर पहाड़ी पर स्थित घास के मैदानों का आनंद ले रहे थे, तभी उन्होंने गोली की आवाज सुनी। हालांकि, उन्होंने यह सोचकर चिंता नहीं की कि वन विभाग के किसी व्यक्ति ने वन्यजीवों को डराने के लिए गोली चलाई है।

 

कलमा की लगा रखी थी रट

उन्होंने कहा, 'मेरे आस-पास हर कोई (कलमा) की रट लगाए हुए था, मैं भी रट रहा था। उस आदमी ने मेरे सिर पर बंदूक तान दी, मेरी बातें सुनीं और फिर चला गया... मैं बस 'ला इलाही' की रट लगाए हुए था... जो हर कोई कर रहा था। मुझे नहीं पता था कि इससे मेरी जान बचेगी या नहीं। उसने यह सुना और चला गया,' उन्होंने आगे कहा कि उसने चार आतंकवादियों को देखा, जो सभी अलग-अलग दिशाओं में गोलीबारी कर रहे थे।

 

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भट्टाचार्य ने कहा कि आतंकवादी दूसरे लोगों के पास गया और उनसे हिंदी में सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि वह और उनका परिवार घास के मैदान के पीछे की ओर थे, जबकि अन्य आतंकवादी सामने के गेट के पास थे।




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