नारायण 'दोलाईना': मैं फलां का घंटा हूं। लोग जब ऐसा कहते थे तो मुझे घंटा फर्क नहीं पड़ता था। जानते हैं क्यों? क्योंकि मैंने ज्ञानरंजन जी की कहानी घंटा पढ़ने के बाद से खुद को किसी शिवाले पर टंगे घंटे से खुद को कम नहीं समझा। मैं खुद ही घूम-घूम कर आस पड़ोस के लोगों को बताने लगा था कि मैं फलां का घंटा हूं।
यह वह दौर था जब सिर्फ मुझ जैसे घंटे ही नहीं, मेरी बहन घंटी का महत्व भी मुझसे कम नहीं होता था। मुझे अच्छे से याद है जब हमारी क्लास टीचर आया मैडम से कहती थीं कि घंटी बजा दो, पूरी कक्षा के बच्चों में खुशी की लहर दौड़ जाती थी। यह बहन घंटी का कमाल था कि सब बच्चे घर जाने की खुशी से झूम उठते थे। हालांकि, तब भी कुछ बच्चे हमारी बहन से चिढ़ते थे। जानते हैं... उन्हें भी हम सब मोटी वाली मैम का घंटा कहते थे।
फिर हम बड़े हुए और साइज में भी और उम्र में भी। तब हितोपदेश की कहानी 'घंटाकर्ण' पढ़ी। हमें उस दिन बहुत गर्व महसूस हुआ जब घंटे का इतना व्यापक असर पता चला। बंदरों के हाथ में घंटा पड़ जाए तो क्या-क्या हो सकता है, यह व्यापक विमर्श सामने आया। इस कहानी से यह भी पता चला कि बंदरों जैसी प्रवृति के लोगों के हाथ से घंटा वापस लेने चालाक लोमड़ी कुटनी की तरह चाल चलनी पड़ती है। पूरी कहानी पढ़ने के बाद मेरा वजन सवा पांच किलो से ज्यादा हो गया। वैसे भी, जब राजा की शक्ति का प्रतीक घंटा माना जाए तो मुझ जैसे घंटे की उम्र बढ़ना तय था।
घंटे की कहानी
हैन्स क्रिश्चियन एंडरसन की कहानी 'द बेल' ने तो मुझ जैसे साधारण पीतल और कभी तांबे जैसी धातु से बने घंटे को यूरोप तक में प्रतिस्थापित कर दिया। भारत के मंदिरों में दैवीय शक्तियों के आह्वान के लिए बजाए जाने वाले घंटे के स्वर ने जब मुझे रहस्यमयी आवाज को यूरोपियन कस्बे के लोगों के काम आते देखा तब मुझे अंतरराष्ट्रीय फलक पर घूमने का गुमान भी खूब हुआ। इसी दौरान एक बार हमारे गांव के पंडित जी ने चौपाल पर सबके सामने बताया कि मुझ जैसे बड़े और फूलकर कुप्पा हो चुके घंटे को बजाता है तो उससे मनुष्य के सौ जन्मों के पापों का नष्ट हो जाता है।
बस उस चौपाल का दिन है और कलयुग के साल 2025 के बीतते दिसंबर की वह मनहूस तारीख। गांव के विद्वान पंडितजी ने तमाम पुराणों और शास्त्रों के हवाले से जब मेरे मन की खुशी को मंदिरों और चर्च की घंटी से ऊपर पहुंचाकर वर्षों से जो सम्मान दिलाया था, उसकी दुर्गति भारत जैसे देश के एक ताकतवर शख्स ने कर दी। नि:संदेह उनके श्रीमुख से जिस भाव से घंटा शब्द का विलक्षण उच्चारण हुआ, वह हर घंटे हर घंटे को खुदकुशी के लिए मजबूर कर रहा है। पीतल का घंटा हो, छोटी बहन तांबे की घंटी हो अथवा फूलों में टंगी प्यारी सी छोटी-छोटी घंटियां हों, जीने का अर्थ खो रही हैं।
मुझ फलां के घंटे की खुदकुशी की बात से आप सकपका गए। ऐसा मत सोचिए। कलयुग में घंटे खुदकुशी नहीं करते और हां, यह भी पूरी हकीकत नहीं है कि मैं सिर्फ फलां का घंटा हूं। नहीं भाई। मैं भी कलयुग के बेशर्म 'बड़ों' की तरह ही जीना सीखता जा रहा हूं। मैं भी जो जैसा उसके लिए वैसा ही घंटा बनूंगा। मंदिर में चढ़ाओगे तो खूब टनटन कर तुम्हारे मंगल की कामना करूंगा। स्कूल में बजाओगे तो बच्चों की मुस्कान से पूरे घर को रोशन करूंगा। लेकिन... भाषा की मर्यादा तोड़ने के इरादे से जुबान पर हमारा नाम लाओगे तो... याद रखना, मेरा नाम घंटा है, खूब बजाऊंगा।
मुझे घंटा होने पर यूं ही गुमान नहीं है। पं. सुमित्रा नंदन पंत जी ने मेरे महत्व को बताने के लिए ही यह कविता लिखी थी...
नभ की है उस नीली चुप्पी पर
घंटा है एक टंगा सुन्दर,
जो घडी घडी मन के भीतर
कुछ कहता रहता बज बज कर।
परियों के बच्चों से प्रियतर,
फैला कोमल ध्वनियों के पर
कानों के भीतर उतर उतर
घोंसला बनाते उसके स्वर।
भरते वे मन में मधुर रोर
"जागो रे जागो, काम चोर!
डूबे प्रकाश में दिशा छोर
अब हुआ भोर, अब हुआ भोर!"
"आई सोने की नई प्रात
कुछ नया काम हो, नई बात,
तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात,
निद्रा छोड़ो, रे गई, रात!
Note: लेखक जाने माने व्यंग्यकार और कवि हैं। उनके व्यंग्य और कविता सोशल मीडिया पर खूब चर्चित हैं।