उत्तराधिकारी तय नहीं, परेशान पार्टी, JDU के लिए क्या सोच रहे हैं नीतीश कुमार?
नीतीश कुमार, राज्यसभा का रुख कर रहे हैं। निशांत कुमार को अभी बागडोर तक नहीं मिली है। जेडीयू नेता उत्तराधिकारी को लेकर असमंजस में हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। Photo Credit: PTI
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं। 10 दिन बीत गए हैं, अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि अब जनता दल यूनाइटेड की कमान किसे मिलन जा रही है। JDU में ललन सिंह, संजय झा, विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव जैसे दिग्गज नेता हैं लेकिन नीतीश कुमार की जगह कौन लेगा, इस पर हर कोई चुप है।
जेडीयू में नेतृत्व बदलने को लेकर अब हड़बड़ी मची है। पार्टी के नेता दबी जुबान से जिक्र कर रहे हैं कि यह स्थिति कुछ हद तक नीतीश कुमार की वजह से बनी है। पिछले एक साल से ज्यादा समय से जेडीयू के नेता नीतीश कुमार से लगातार कह रहे थे कि निशांत कुमार को पार्टी में मौका दिया जाए।
निशांत कुमार, नीतीश कुमार के बेटे हैं। सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मंच के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने सबसे पहले मांग की थी कि उन्हें नीतीश कुमार अपना उत्तराधिकारी घोषित करे। नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर एक अरसे से सवाल उठता रहा है। अब समय से उत्तराधिकारी तय न हो पाने की वजह से पार्टी के भविष्य की चिंता बढ़ गई है।
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क्यों नीतीश कुमार ने निशांत कुमार को आगे नहीं किया?
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार हमेशा लो प्रोफाइल रहते हैं। 8 मार्च को उन्होंने जेडीयू की सदस्यता ली,अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि उन्हें पार्टी क्या भूमिका देने वाली है। पार्टी में फैसला, सिर्फ संजय झा नहीं करेंगे। नीतीश कुमार की मुहर के बिना यह फैसला नहीं हो पाएगा। नीतीश कुमार अभी मुखर होकर इस विषय पर कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
क्या निशांत को आगे बढ़ाएंगे?
नीतीश कुमार के रुख से ऐसा नहीं लग रहा है। नीतीश कुमार ने परिवारवाद या वंशवाद के खिलाफ अपनी राजनीति इच्छा हमेशा जाहिर की है। अतीत की वजह से अब खुद वह कतरा रहे हैं। नीतीश कुमार ने पार्टी में शामिल होने की हामी भी तब भरी जब वह राज्य की सक्रिय राजनीति से अलग होने का संकेत दिया है। निशांत कुमार राजनीति में नौसिखियां हैं, ऐसे में अभी उन्हीं बड़ी भूमिका मिलेगी, यह भी संदिग्ध है।
नीतीश कुमार नहीं तो कौन संभालेगा JDU?
बिहार के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर नीतीश कुमार पार्टी में सक्रिय भूमिका से हटे तो पार्टी बिखर सकती है। पार्टी, सिर्फ उनके नाम पर ही एक हो सकती है। निशांत कुमार भले ही पार्टी से बाहर रहे हों लेकिन लोग नीतीश कुमार की छवि उनमें देख सकते हैं। परिवारवाद, राजनीति की सच्चाई है।
विश्लेषकों का तर्क है कि जैसे समाजवादी पार्टी की बागडोर, अखिलेश यादव को मिली, राष्ट्रीय जनता पार्टी की बागडोर तेजस्वी को मिली, ठीक वैसे ही जेडीयू की बागडोर निशांत कुमार को मिलने वाली है। कई नेताओं ने मुखर होकर कहा है कि निशांत ही एकमात्र ऐसे शख्स हैं कि जिनके इर्द-गिर्द पार्टी एकजुट हो सकती है।
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नीतीश कुमार, निशांत पर चुपके से दांव चल गए?
नीतीश कुमार की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि जब तक वह खुद मुख्यमंत्री हैं और पार्टी की कमान संभाले हुए हैं, तब तक बेटे को राजनीति में अगर आने देंगे तो वंशवाद पर घिरेंगे। जेडीयू, वंशवाद की आलोचक पार्टी रही है। नीतीश कुमार खुद हमेशा से वंशवाद के खिलाफ रहे हैं और सोचते थे कि अगर बेटा अभी शामिल होता तो उनकी सक्रियता के दौरान यह अच्छा नहीं लगता। अगर निशांत पहले आ जाते तो नीतीश जी का यह अचानक बाहर होना इतना अचानक नहीं लगता।
नीतीश कुमार के जाने से क्या होगा?
नीतीश कुमार की बिहार से विदाई का मतलब है पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो जाना। विश्लेषकों का मानना है कि निशांत को पहले कुछ साल पहले शामिल होना चाहिए था। कोई संगठनात्मक पद या विधान परिषद में उनके पास अनुभव होना चाहिए था। तब पार्टी की विरासत सौंपने में इतनी परेशानी नहीं आती। अब पार्टी को विकल्प ढूंढने में मुश्किलें आएंगी।
JDU के लिए राहत की बात क्या है?
जेडीयू के पास अभी मौका है। बिहार में न विधानसभा, न लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। निशांत कुमार और पार्टी के पास तैयारी का मौका है। वह विनम्र छवि के हैं, लोग पसंद करते हैं, वह इतने अनजान रहे हैं कि लोग उनके बारे में जानना चाहते हैं। पार्टी में अभी उनके स्तर का कोई नेता नहीं है, जिसे ओबीसी वर्ग का व्यापक समर्थन मिले। अब देखने वाली बात यह होगी कि जेडीयू, मौका किसे देती है।
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JDU के शीर्ष नेतृत्व का हकदार कौन है?
जेडीयू में तीन नेता हैं, जिनकी गिनती अभी नीतीश कुमार के बाद होती है। पहले राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह। केंद्र में मंत्री भी हैं। दूसरे नंबर पर पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा हैं और तीसरे नंबर पर विजय कुमार चौधरी हैं। तीनों, अगड़ी जातियों से आते हैं। साल 2011 में हुई जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 60 फीसदी से ज्यादा आबादी ओबीसी वर्ग की है। बिहार की राजनीति, जाति आधारित भी है। ऐसे में जेडीयू, नीतीश कुमार के कद का कोई नेता तलाशेगी, तभी समीकरण सध पाएंगे।
बिहार में क्या समीकरण बन रहे हैं?
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से यह तय है कि बीजेपी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश करेगी। पार्टी ने 2 दशक से नीतीश कुमार का आगे रखा है, अब अपने नेता को आगे बढ़ाना चाहती है। वहां, सीएम पद के कई दावेदार हैं। सूत्रों के मुताबिक जेडीयू निशांत कुमार को आगे बढ़ाने में अभी असमंजस की स्थिति में है। अभी सिर्फ अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि निशांत को डिप्टी CM बनाया जा सकता है।
कुछ सूत्र बताते हैं कि निशांत सरकार में शामिल होने की जगह, बाहर से पार्टी को समझेंगे। बिहार में जमीनी स्तर पर पूरे बिहार का दौरा करेंगे, उसके बाद सरकार में अपनी भूमिका चुन सकते हैं। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है यह है कि निशांत के इर्द-गिर्द उनके हिसाब से काम करने वाला मजबूत नेतृत्व तैयार किया जाए। पुराने नेताओं के सामने वह सहज नहीं होंगे। ज्यादातर, उनके पिता के मित्र हैं, जिनके साथ काम करने में निशांत को परेशानी आ सकती है। वह स्वतंत्र तौर पर फैसले लेने में हिचक सकते हैं।
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