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अखिलेश और ओवैसी के साथ आने की चर्चा, 5 प्वाइंट में समझिए गठबंधन की मुश्किलें

उत्तर प्रदेश में करीब 12 महीने बाद विधानसभा चुनाव संभावित हैं लेकिन राजनीतिक दल अभी से अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। इस बीच अखिलेश यादव और ओवैसी के हाथ मिलाने की अटकलें लगाई जा रही हैं।

Akhilesh yadav and Asaduddin Owaisi

अखिलेश यादव और असदुद्दीन ओवैसी, Photo Credit: SORA

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीते कुछ समय से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी चर्चा में हैं। उनकी पार्टी ने बिहार में विपक्षी गठबंधन को झटका दिया और उसके बाद अब महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव में भी विपक्ष को नुकसान पहुंचाया है। अब ओवैसी उत्तर प्रदेश में भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। ऐसे में विपक्षी समाजवादी पार्टी सतर्क हो गई है। समाजवादी पार्टी के कुछ नेता तो ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन करने का समर्थन कर रहे हैं। अब यूपी की राजनीति में यही चर्चा है कि क्या समाजवादी पार्टी और AIMIM एक साथ आने वाले हैं। 

 

अखिलेश यादव ने मंगलवार को लखनऊ में अपने लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। इस बैठक में पंचायत चुनाव को लेकर चर्चा होनी थी लेकिन अचानक से एक सांसद ने ओवैसी के बढ़ते प्रभाव का जिक्र कर दिया। इसके साथ ही चंद्रशेखर रावण का भी जिक्र मीटिंग में हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ सांसद ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन करने के पक्ष में हैं।

 

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क्यों शुरू हुई अटकलें?

अखिलेश यादव और सांसदों की मीटिंग खत्म होने के बाद समाजवादी पार्टी के सांसद राम शंकर राजभार से ओवैसी की पार्टी के साथ गंठबंधन को लेकर सवाल किया गया। उन्होंने कहा, 'PDA की मजबूती के लिए किसी का भी स्वागत।'

 

 

उनके इस बयान के बाद AIMIM उत्तर प्रदेश यूनिट के AIMIM उत्तर प्रदेश यूनिट का भी बयान सामने आया। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने उनकी पार्टी को कई बार बेइज्जत किया है और भारतीय जनता पार्टी की बी टीम होने का टैग लगाने की कोशिश की है। उन्होंने साफ किया कि अगर समाजवादी पार्टी गठबंधन चाहती है तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुद उन्हें सामने से ऑफर दें। इसके बाद वह समाजवादी पार्टी के साथ जाने के लिए तैयार हैं। 

गठबंधन क्यों संभव?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी 12 महीने का समय है और अभी से राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है। बिहार में ओवैसी की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन चाहती थी लेकिन तेजस्वी यादव गठबंधन के लिए तैयार नहीं हुए। नतीजा यह रहा है ओवैसी की पार्टी ने तो अपना पुराना प्रदर्शन बरकरार रखा लेकिन तेजस्वी और कांग्रेस लगभग साफ हो गए हैं। महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव में अखिलेश यादव की पार्टी जिन सीटों पर जीत दर्ज करती थी या अच्छा प्रदर्शन करती थी उन सभी सीटों पर ओवैसी की पार्टी ने उन्हें नुकसान पहुंचाया है। 

 

समाजवादी पार्टी के कुछ सीनियर नेता और सांसदों का कहना है कि अल्पसंख्यकों के वोट एकजुट रखने हैं तो समाजवादी पार्टी और AIMIM के बीच गठबंधन होना चाहिए। मुस्लिम वोटरों में ओवैसी की अच्छी पकड़ है और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम करीब 20 प्रतिशत तक हैं। अगर मुस्लिम वोटों में बंटवारा होता है तो अखिलेश यादव का उत्तर प्रदेश की सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना, सपना ही रह सकता है। 

 

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अखिलेश को गठबंधन से क्यों परहेज?

  • उत्तर प्रदेश की राजनीति के शिखर पर मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी है। बीजेपी और यूपी के सीएम योगी कई बार खुले मंचों से 80 बनाम 20 की बात कर चुके हैं। 20 प्रतिशत मुस्लिम और 80 प्रतिशत हिंदू और अन्य। अगर अखिलेश ओवैसी के साथ हाथ मिलाने की कोशिश करेंगे तो बीजेपी 80 बनाम 20 की राजनीति को धार देगी और इससे अखिलेश यादव को खतरा हो सकता है।
  • गठबंधन ना करने का एक बड़ा कारण यह भी है कि उत्तर प्रदेश में ओवैसी का स्ट्राइक रेट बढ़िया नहीं रहा है। 2022 में करीब 100 सीटों पर लड़कर भी ओवैसी को मात्र 22 लाख वोट ही मिले थे और 99 सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत ही जब्त हो गई थी।
  • बिहार में ओवैसी ने 2020 के विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन यूपी में ओवैसी 2022 और 2017 दोनों चुनावों में बुरी तरह असफल रहे हैं। तमाम कोशिशों को बावजूद ओवैसी 0.5 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाए थे।
  • गठबंधन ना करने का एक बड़ा कारण कांग्रेस पार्टी भी है। अगर अखिलेश यादव AIMIM से गठबंधन करते हैं तो कांग्रेस 2022 की तरह अकेले मैदान में कूद सकती है। महाराष्ट्र में राज ठाकरे के कारण कांग्रेस ने उद्धव ठाकरे की पार्टी से गठबंधन तोड़ लिया था और अगर यूपी में अखिलेश ओवैसी के साथ जाते हैं तो कांग्रेस असहज होगी।
  • अगर अखिलेश यादव कांग्रेस को राजी कर AIMIM को इंडिया गठबंधन में शामिल कर भी लेते हैं तो ओवैसी की पार्टी के साथ सीट बंटवारे में पेंच फंस सकता है। ओवैसी की पार्टी उन्हीं सीटों को मांग सकती है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में है और यह सीटें अखिलेश यादव की पार्टी पहले ही आसानी से जीतती आई है। इसके साथ ही अखिलेश यादव यूपी में ओवैसी को जगह देने के मूड में नहीं है क्योंकि अखिलेश का वोटबैंक ओवैसी की पार्टी की तरफ शिफ्ट हो सकता है जो भविष्य में उन्हें परेशान कर सकता है। 

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