हिंदू धर्म में पूर्णिमा का दिन केवल तिथि नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आत्मशुद्धि से जुड़ा विशेष अवसर माना जाता है। हर महीने आने वाली पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी पूरी चमक के साथ दिखाई देता है और मान्यता है कि इसी समय उसकी किरणों का मन और शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। धार्मिक ग्रंथों से लेकर लोक परंपराओं तक, पूर्णिमा को पूजा-पाठ, स्नान-दान और आध्यात्मिक साधना के लिए बेहद शुभ माना गया है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि पूर्णिमा कब होती है, इसका पौराणिक महत्व क्या है, इस दिन क्या करना चाहिए और किन बातों से परहेज जरूरी है। इसी से जुड़ी पूरी जानकारी आज हम आपको विस्तार से बताने जा रहे हैं।
पूर्णिमा हर महीने शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को आती है। यानी अमावस्या के बाद जब चंद्रमा धीरे-धीरे बढ़ते हुए पूरा गोल हो जाता है, उसी दिन पूर्णिमा होती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार साल में 12 पूर्णिमाएं होती हैं और हर पूर्णिमा का अपना अलग नाम और महत्व होता है, जैसे गुरु पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा आदि।
यह भी पढ़ें: उग्रतारा मंदिर: वह स्थान जहां होती है देवी पार्वती के उग्ररूप की पूजा
पूर्णिमा कब है?
साल 2026 की पहली पूर्णिमा 3 जनवरी के दिन मनाई जाएगी। इस तिथि की शुरुआत 2 जनवरी के दिन शाम 6 बजकर 50 मिनट से होगी और इसका समापन 3 जनवरी 2026 के दिन शाम को 3 बजकर 35 मिनट पर होगा। वैदिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा के दिन यानी 3 जनवरी को शाम 5 बजकर 28 मिनट पर चंद्रोदय होगा।
पूर्णिमा से जुड़ी पौराणिक कहानी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है। कहा जाता है कि पूर्णिमा के दिन चंद्रदेव अपनी पूर्ण शक्ति में होते हैं और पृथ्वी पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
शास्त्रों में यह भी कथा मिलती है कि समुद्र मंथन के समय निकले अमृत का प्रभाव पूर्णिमा की चांदनी में ज्यादा सक्रिय हो जाता है। इसी वजह से कई जगहों पर पूर्णिमा की रात को खुले आसमान में रखी खीर या दूध को अमृत समान माना जाता है, विशेषकर शरद पूर्णिमा के दिन।
गुरु पूर्णिमा से जुड़ी कथा में भगवान वेदव्यास का जन्म इसी दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन गुरु और ज्ञान की विशेष पूजा की जाती है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों इसी तिथि को हुए, इसलिए यह दिन बौद्ध धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है।
यह भी पढ़ें: राम मंदिर में 22 जनवरी को हुई थी प्राण प्रतिष्ठा, फिर आज क्यों मना रहे वर्षगांठ?
पूर्णिमा की विशेषता
- पूर्णिमा को मन, शरीर और आत्मा के संतुलन का दिन माना जाता है। इस दिन चंद्रमा की किरणें मन को शांति देने वाली मानी जाती हैं।
- धार्मिक दृष्टि से यह दिन स्नान, दान, पूजा और व्रत के लिए बहुत शुभ होता है।
- आध्यात्मिक रूप से ध्यान, मंत्र जाप और साधना के लिए पूर्णिमा को श्रेष्ठ माना गया है।
- आयुर्वेद और योग में भी पूर्णिमा को मानसिक ऊर्जा और भावनाओं से जोड़कर देखा जाता है।
पूर्णिमा के दिन क्या करें
- पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, अगर संभव हो तो किसी पवित्र नदी या जल में स्नान करना शुभ माना जाता है।
- भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा करें।
- दान-पुण्य करें, विशेष रूप से अन्न, दूध, चावल, सफेद वस्त्र और मिठाई का दान शुभ फल देता है।
- ध्यान, जप और मंत्र साधना करें, इससे मानसिक शांति मिलती है।
- पूर्णिमा की रात चंद्रमा को अर्घ्य देना और चंद्र दर्शन करना लाभकारी माना जाता है।
पूर्णिमा के दिन क्या न करें
- इस दिन झगड़ा, क्रोध और नकारात्मक सोच से बचना चाहिए।
- ज्यादा तला-भुना और भारी भोजन करने से परहेज करें, क्योंकि पूर्णिमा को शरीर ज्यादा संवेदनशील माना जाता है।
- झूठ बोलना, किसी को धोखा देना या अपशब्द कहना अशुभ माना जाता है।
- रात में देर तक जागकर अनावश्यक काम करना और मन को अशांत रखना भी ठीक नहीं माना जाता।