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जब सृष्टि की रक्षा के लिए श्री हरि ने लिया था मोहिनी रूप

मोहिनी एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। आइए जानते हैं, किस दिन रखा जाएगा यह एकादशी व्रत।

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एकादशी पर की जाती है भगवान विष्णु की पूजा।(Photo Credit: Creative Image)

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हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। हर महीने दो एकादशियां आती हैं एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से पापों से मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति और जीवन में सुख-शांति पाने के लिए रखा जाता है।

मोहिनी एकादशी 2025 तिथि

वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी प्रारंभ: 07 मई 2025, सुबह 10 बजकर 19 मिनट से
वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी समाप्त: 08 मई 2025, दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक
मोहिनी एकादशी तिथि: 08 मई 2025, गुरुवार

 

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मोहिनी एकादशी पौराणिक कथा

प्राचीन काल में भद्रावती नामक नगर में धनपाल नामक एक धर्मात्मा वैश्य रहता था। उसके पांच पुत्र थे। उसका सबसे छोटा पुत्र धृष्टबुद्धि नामक था जो शराब पीने वाला, जुआ खेलने वाला और गलत संगत में रहने वाला व्यक्ति था। उसने अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी।

 

धृष्टबुद्धि के कर्मों से दुखी होकर उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया। अब वह चोरी और पाप कर्म करने लगा। एक दिन वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर जंगल में भटक रहा था, तब वह महर्षि कौंडिन्य के आश्रम पहुंचा। वहां उसके अंदर कुछ अच्छा बनने की भावना जागृत हुई।

 

महर्षि ने उस पर दया दिखाते हुए उसे मोहिनी एकादशी व्रत रखने की सलाह दी और इसके पुण्य फल के बारे में बताया। धृष्टबुद्धि ने विधिपूर्वक इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए। अंततः उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।

मोहिनी एकादशी का पौराणिक महत्व

मोहिनी एकादशी का संबंध स्वयं भगवान विष्णु की मोहिनी रूप से भी है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और दैत्यों के बीच अमृत को लेकर संघर्ष हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत देवताओं को पिला दिया। इस दिन को भगवान विष्णु की इसी लीला की स्मृति में भी मनाया जाता है। इस व्रत से चित्त की शुद्धि होती है और भटकती आत्मा को सही मार्ग मिलता है।

 

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पूजा विधि और नियम

व्रती को एक दिन पहले यानी दशमी की रात सात्विक भोजन करना चाहिए और अगले दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

 

इस दिन कुछ लोग निर्जल व्रत करते हैं, तो कुछ फलाहार लेते हैं। भगवान विष्णु की पूजा पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य से की जाती है।

 

व्रती को श्री विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या विष्णु पुराण का पाठ करना चाहिए। रात्रि जागरण कर भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करना भी पुण्यदायक माना जाता है।

 

Disclaimer- यहां दी गई सभी जानकारी सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं।

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