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बद्रीनाथ के रास्ते का रहस्य, पांडवों ने पाया मोक्ष, जानिए पांडुकेश्वर की कहानी

बद्रीनाथ धाम के पास पांडुकेश्वर नाम का एक रहस्यमयी स्थान है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक पांडवों को यहीं स्वर्ग मिला था। इससे जुड़ी कुछ रहस्यमयी कहानियां जानिए।

Yogdhyan Badri Temple

योगध्यान बद्री मंदिर, Photo Credit- Social Media

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उत्तराखंड में चारधाम यात्रा शुरू हो चुकी है, जहां हजारों की तादाद में श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम जा रहे हैं। बद्रीनाथ धाम के रास्ते में पांडुकेश्वर गांव है, जिसका जुड़ाव पांडवों से है। इस समय कई श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम के दर्शन के साथ-साथ पांडुकेश्वर गांव की यात्रा भी कर रहे हैं। इस गांव में योगध्यान बद्री मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि राजा पांडु ने इस मंदिर की स्थापना की थी। उन्हीं के कारण इस गांव का नाम पांडुकेश्वर पड़ा। योगध्यान बद्री मंदिर में भगवान विष्णु की योग मुद्रा में प्रतिमा है। इसके अलावा इस गांव में वासुदेव मंदिर भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि पांचों पांडवों ने मिलकर इसकी स्थापना की थी। इन दोनों मंदिरों से जुड़ी कुछ खास कहानियां हैं, जिन्हें जानकर आपको समझ आ जाएगा कि राजा पांडु और उनके पुत्रों ने यहां मंदिर का निर्माण क्यों कराया था।

 

 

पांडुकेश्वर गांव उत्तराखंड के चमोली जिले में है। पौराणिक कहानियों के मुताबिक राजा पांडु के पांचों बेटे युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव का जन्म यहीं हुआ था। इसके साथ ही एक रोचक बात यह है कि पांडवों ने अपने जीवन का अंतिम समय यहीं बिताया था और मोक्ष की प्राप्ति की थी। अब सवाल उठता है कि इस स्थान पर राजा पांडु ने मंदिर क्यों बनवाया था, और यह भी कि पांडव इस गांव में क्यों रहने आए थे।

 

 

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राजा पांडु ने क्यों बनवाया योगध्यान बद्री मंदिर ?

 

पौराणिक कथाओं के मुताबिक एक जंगल में एक ऋषि हिरण का रूप धारण कर बैठे थे, जिन्हें राजा पांडु ने हिरण समझकर अपने तीर से मार दिया। इसके बाद ऋषि ने पांडु को श्राप दिया कि वे किसी महिला से प्रेम नहीं कर सकते, और जैसे ही उनके मन में किसी स्त्री के लिए प्रेम का भाव उत्पन्न होगा, उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी।

 

इस श्राप से बचने के लिए राजा पांडु उत्तराखंड के एक गांव में जाकर रहने लगे। इसी जगह उन्होंने योगध्यान बद्री मंदिर में भगवान विष्णु की उपासना की। यहीं उनके पांचों पुत्रों का जन्म हुआ। पांडुकेश्वर गांव के पास माद्री अलकनंदा नदी में स्नान कर रही थीं। तभी उन्होंने पांडु को देखा और दोनों एक-दूसरे को देखकर मोहित हो गए। श्राप के कारण उसी समय राजा पांडु की मृत्यु हो गई।

 

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 पांडवों का पांडुकेश्वर जुड़ाव

 

धार्मिक कथाओं के मुताबिक जब पांडव 12 साल का वनवास काट रहे थे, उसी दौरान वे अपने पिता के निधन के बाद अंतिम संस्कार करने यहां आए थे। पौराणिक कथा के अनुसार इसी गांव में अर्जुन ध्यान में लीन हुए थे, जिसे देखकर भगवान इंद्र प्रसन्न हुए और उन्होंने अर्जुन को आशीर्वाद दिया। इसके बाद पांडवों ने वासुदेव मंदिर की स्थापना करवाई, जहां भगवान विष्णु, माद्री और देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है।

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद, जब पांचों भाइयों ने अपने भाई कर्ण का वध किया, तो इस पाप से मुक्ति पाने के लिए वे पांडुकेश्वर गांव में रहने लगे। वे रोज वासुदेव मंदिर और योगध्यान बद्री मंदिर के दर्शन करते थे। यहीं पांचों पांडवों का निधन हुआ और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई।

 

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कैसे पहुंचे पांडुकेश्वर

 

पांडुकेश्वर गांव पहुंचने के लिए आपको सबसे पहले अपने राज्य के नजदीकी रेलवे स्टेशन पर जाना होगा। वहां से ट्रेन द्वारा देहरादून पहुंचें। देहरादून से आपको ज्योतिर्मठ जाना होगा, जो लगभग 290 किलोमीटर दूर है। ज्योतिर्मठ से पांडुकेश्वर लगभग 18 किलोमीटर दूर है, जहां आप बस, टैक्सी या जीप के जरिए आसानी से पहुंच सकते हैं।


डिस्क्लेमर- यह खबर मान्यताओं पर आधारित है, हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

 

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