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साधु बनकर हनुमान को ठगने वाला कालनेमि था कौन?

उत्तराखंड में चल रहे ऑपरेशन कालनेमि नाम रामायण कथा से लिया गया है। आइए जानते हैं इस इस पात्र से जुड़ी पौराणिक कथा।

Image of Hanuman ji Ravan

सांकेतिक चित्र(Photo Credit: AI Image)

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उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में प्रदेश में एक नई मुहीम शुरू की है, जिसके तहत प्रशासन और पुलिस मिलकर ऐसे लोगों की पहचान कर, गिरफ्तार कर रही है जो साधु का वेश लेकर लोगों से या तो पैसे ऐंठते हैं या किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल हैं। इस मुहीम का नाम 'ऑपरेशन कालनेमि' रखा गया है और इसके शुरू होने के कुछ ही समय में 100 से ज्यादा ढोंगी साधुओं को हिरासत में भी लिया गया है। बता दें कि इस ऑपरेशन का नाम पौरणिक कथा रामायण के एक पात्र ‘कालनेमि’ से लिया गया है, जिसने रावण की मदद करने के लिए साधु का वेश धारण कर छल किया था।

 

कालनेमि रावण की सेना का एक शक्तिशाली राक्षस था। उसका काम रावण की सेवा में रहकर उसके आदेशों को पूरा करना था। वह केवल बलवान ही नहीं, बल्कि चालाक और मायावी राक्षस था। वह छल-कपट से अपने कार्य सिद्ध करने में माहिर था। यही कारण है कि जब रावण को हनुमान जी से संकट महसूस हुआ, तो उसने कालनेमि को बुलाया।

 

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कालनेमि कौन था?

पौराणिक कथा के अनुसार, जब लंका युद्ध में मेघनाद ने लक्ष्मण जी को शक्ति बाण से घायल कर दिया था तो वह मूर्छित हो गए थे और उनके प्राण संकट में थे। वैद्य सुशेण ने बताया कि उन्हें बचाने के लिए द्रोण पर्वत से संजीवनी बूटी लानी होगी और वह भी सूर्योदय से पहले। भगवान श्रीराम के आदेश पर हनुमान जी तुरंत आकाश मार्ग से द्रोण पर्वत की ओर निकल पड़े।

यह समाचार जब रावण को मिला, तो उसे चिंता हुई कि अगर संजीवनी आ गई, तो लक्ष्मण बच जाएंगे और श्री राम को हराना असंभव हो जाएगा। इसलिए उसने कालनेमि को बुलाकर हनुमान को रास्ते में रोकने का उपाय सोचने को कहा।

कालनेमि की योजना

कालनेमि ने रावण से वादा किया कि वह हनुमान जी को रोक लेगा। उसने एक साधु (ऋषि) का रूप धारण किया और माया से रास्ते  में एक सुंदर आश्रम का निर्माण क्र लिया। एक शांत सरोवर भी बना दिया और उसमें एक राक्षसी मगरमच्छ भी बैठा दिया।

 

जब हनुमान जी आकाश मार्ग से जा रहे थे, तो उन्होंने वहां एक तपस्वी का सुंदर आश्रम देखा। साधु बने कालनेमि ने उन्हें आदरपूर्वक आमंत्रित किया और कहा – ‘हे वानर! आप थक गए होंगे, थोड़ी देर विश्राम कीजिए, फिर स्नान करिए और फलाहार लीजिए। मैं आपके लिए पूजा करूंगा जिससे आपकी यात्रा सफल हो।’

 

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हनुमान जी पहले तो रुके नहीं, पर जब उन्होंने साधु के वचनों में सरलता देखी, तो उन्होंने थोड़ी देर रुकने का निश्चय किया और स्नान के लिए सरोवर की ओर गए। जैसे ही हनुमान जी सरोवर में उतरे, वहां छिपा मगरमच्छ (राक्षसी रूप में) उन पर झपटा। हनुमान जी ने तुरंत उसे मार गिराया। मरते समय उस राक्षसी ने बताया- ‘हे पवनपुत्र! वह साधु नहीं, रावण का दूत कालनेमि है, जो आपको धोखा देकर समय नष्ट करवाना चाहता है।’ हनुमान जी को सब समझ में आ गया। वह तुरंत लौटे और साधु के वेष में बैठे कालनेमि से बोले – "अब तुम अपने असली रूप में आ जाओ।’

 

कालनेमि ने जब देखा कि उसका भेद खुल चुका है, तो वह असली राक्षस रूप में आ गया और युद्ध करने लगा। परंतु हनुमान जी के सामने वह ज्यादा देर टिक नहीं सका। हनुमान जी ने एक ही प्रहार से उसे मार गिराया और फिर द्रोण पर्वत की ओर बढ़ गए, जहां से वह संजीवनी लेकर आए और लक्ष्मण के प्राण बच सके।

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