14 अप्रैल के दिन भारत में त्योहारों की एक लहर गूंज रही है। जहां एक तरफ पंजाब और हरियाणा में बैसाखी त्योहार मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में सतुआ त्योहार मनाया जा रहा है। सतुआ त्योहार को मेष संक्रांति भी कहा जाता है क्योंकि ज्योतिष के अनुसार इस दिन सूर्य ग्रह मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। यह त्योहार ठंड के मौसम के खत्म होने और गर्मी के शुरू होने का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन कई लोग चने से बने भोजन खाते हैं, साथ ही कई लोग सत्तू का दान देते हैं। हिंदू पंचांग के मुताबिक सतुआ पर्व के बाद ही मांगलिक कार्य जैसे शादी करना शुभ माना जाता है।
सतुआ को कई जगह सतुआन भी कहा जाता है। इस दिन कई लोग सत्तू से बने पकवान बनाते हैं, जैसे चने की भरवां पूरियां और आम का गुरमा खाते हैं। अब सवाल उठता है कि सतुआ त्योहार की खास परंपरा क्या है, साथ ही यह भी कि इसे सतुआ और मेष संक्रांति क्यों कहा जाता है?
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सतुआ और मेष संक्रांति क्यों कहा जाता है?
इस पर्व को सतुआ इसलिए कहा जाता है क्योंकि सतुआ त्योहार के बाद मौसम में खास परिवर्तन आता है यानी यह ठंड के खत्म होने और गर्मी के शुरू होने का प्रतीक है। बिहार के लोग गर्मी के मौसम में सत्तू खाना पसंद करते हैं क्योंकि यह पेट को ठंडक देता है। इसी वजह से गर्मी की शुरुआत में मतलब सतुआ पर्व के दिन, सत्तू खाने की परंपरा है और इसी कारण इसका नाम सतुआ पड़ा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सतुआ पर्व के दिन सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है, जिससे सभी राशियों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसी वजह से इस पर्व को मेष संक्रांति कहा जाता है।
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सतुआ पर्व की परंपरा क्या है?
इस दिन बिहार, झारखंड और पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के लोग सुबह स्नान करते हैं। इसके बाद मंदिर या घर के पूजा स्थान पर जाकर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। कई लोग इस दिन गरीबों को सत्तू, चावल, गुड़, कपड़े और कुछ रुपये दान देते हैं।