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GDP की जगह NDP लाने की है तैयारी, क्या बदल जाएगा?

भारत इस बात पर विचार कर रहा है कि जीडीपी की जगह पर एनडीपी को अर्थव्यवस्था का मापदंड बनाया जाएगा। इस लेख में इसी पर विचार किया जाएगा कि आखिर इससे क्या फर्क पड़ेगा?

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प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated

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भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। हर साल GDP ग्रोथ के आंकड़े सुर्खियां बनते हैं। कभी 7%, कभी 7.5% तो कभी 8% के आसपास। लेकिन इसी बीच एक गंभीर बहस चुपचाप आकार ले रही है कि क्या GDP अब भारत की अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर दिखा पा रहा है? और अगर नहीं, तो क्या NDP (Net Domestic Product) यानी कि शुद्ध घरेलू उत्पाद को नीति-निर्माण के केंद्र में लाने का समय आ गया है? खबरगांव इस लेख में इन्हीं बातों पर चर्चा करेगा।

 

यह बहस सिर्फ तकनीकी नहीं है। यह इस सवाल से जुड़ी है कि भारत किस तरह का विकास चाहता है- तेज़, दिखावटी या टिकाऊ और वास्तविक। GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद बताता है कि देश में एक साल में कुल कितना उत्पादन हुआ। इसमें फैक्ट्रियां, सड़कें, मशीनें, सेवाएं सब शामिल होते हैं। हालांकि, GDP एक अहम चीज़ को नज़रअंदाज़ करता है, और वह है विकास की प्रक्रिया या उसके बाद हुए नुकसान यानी कि पूंजी की घिसावट मतलब कि डेप्रिसिएशन। यहीं NDP की भूमिका उभर कर आती है। तो सीधे शब्दों में समझना चाहें तो जीडीपी में से डेप्रिसिएशन को घटाने के बाद जो बचता है उसे ही एनडीपी कहते हैं।

 

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या कि दूसरे शब्दों में कहें तो NDP यह बताता है कि 'जो हमने बनाया, उसमें से जो घिस गया, टूट गया या बेकार हुआ उसे हटाकर असल में हमारे पास कितना बचा?'

डेटा पहले से फिर विवाद क्यों?

यह बात बिल्कुल साफ़ है कि भारत के पास NDP का डेटा पहले से मौजूद है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO/MoSPI) हर साल GDP के साथ-साथ NDP भी जारी करता है। तो फिर सवाल उठता है कि जब डेटा पहले से है, उसे पॉलिसी मेकिंग यानी कि नीति-निर्माण में अभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है, तो इस पूरी कवायद का मतलब क्या है?

 

यहीं असली मुद्दा छिपा है। मुद्दा डेटा का नहीं महत्त्व दिए जाने का है। अगर आज की स्थिति की बात करें तो स्थिति यह है कि NDP अभी तक सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित है उसे आधार बनाकर जनता के सामने चर्चा नहीं होती है। वहीं जडीपी की बात करें तो बजट भाषण GDP से शुरू होता है, आर्थिक सर्वे GDP पर टिका होता है और पॉलिसी को लेकर पूरी चर्चा GDP growth के इर्द-गिर्द ही घूमती है। यानी कि NDP मौजूद तो है, लेकिन निर्णय के लिए मूल आधार के तौर पर पेश नहीं किया जाता है। तो इस बदलाव की बात इसलिए की जा रही है ताकि NDP को रिपोर्टिंग नंबर से निकालकर डिसीजन मेकिंग नंबर बनाना।

दुनिया नहीं तो भारत क्यों?

अब अगर दुनिया के अन्य देशों से तुलना करें तो हम पाते हैं कि पूरी दुनिया में जीडीपी को ही आधार बनाकर अर्थव्यवस्था को मापा जाता है। अब इसमें दो बातें निकलकर सामने आती हैं। पहली तो यह है कि ऐसा नहीं है कि अगर दुनिया के कोई भी देश किसी व्यवस्था को नहीं अपना रहे हैं तो भारत को भी नहीं अपनाना चाहिए। जैसे कि भारत ने पहले भी जीएसटी, यूपीआई और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर इत्यादि जैसी व्यवस्थाओं को अपने देश में काफी बड़े स्तर पर लागू किया है जबकि दुनिया में इसका चलन बहुत ज्यादा नहीं था। एक तरह से भारत ने ही इसकी शुरुआत की।

 

जाहिर है कि भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए अपने हिसाब से सिस्टम बनाना चाहिए। फिर एक बात यह भी है कि दुनिया के अमेरिका, रूस, चीन और अन्य तमाम विकसित यूरोपियन देश पोस्ट-इन्फ्रास्ट्रक्चर फेज़ में हैं जबकि भारत अभी एसेट-बिल्डिंग फेज़ में है। यही सबसे बड़ा डिफरेंशिएटर है जो कि भारत को इन देशों की तुलना में अलग करता है।

Asset-building और post-infrastructure फेज़

इस पूरी बहस को समझने के लिए दो बातें समझनी ज़रूरी हैं।


1. Asset-building phase

यह वह दौर होता है जब देश बड़े पैमाने पर नई सड़कें, रेलवे, पोर्ट, एयरपोर्ट बनाता है, बिजली, डिजिटल नेटवर्क, शहरी ढांचा खड़ा करता है और सरकारी capex तेज़ी से बढ़ता है। विकास के लिए यहा काफी ज़रूरी चरण है, लेकिन इसमें एक खतरा है कि अगर गुणवत्ता और रखरखाव पर ध्यान न दिया जाए, तो संपत्ति जल्दी ही डेप्रिशिएट होने लगती है।


2. Post-infrastructure phase

यह वह स्थिति है जब बुनियादी ढांचा मोटे तौर पर तैयार हो चुका होता है और देश का फोकस नई चीज़ें बनाने से ज़्यादा उसके मेंटेनेंस, अपग्रेडेशन और उसकी कार्य क्षमता को बढ़ाने पर होता है।

GDP भ्रामक क्यों हो सकता है?

मान लीजिए कि सरकार ने भारी कर्ज़ लेकर सड़कें और पुल बनाए तो GDP बढ़ जाएगा, लेकिन लेकिन 10–12 साल में वही सड़कें टूटने लगीं क्योंकि उसके मेंटेनेंस पर पर्याप्त खर्च नहीं हुआ या फिर घटिया तरीके से बनवाया गया। अब जब इसे जीडीपी के हिसाब से अनुमान लगाएंगे तो लगेगा कि विकास काफी तेज हो रहा है।


हालांकि, जब NDP के हिसाब से इसका आकलन किया जाएगा तो वास्तव में पता लगेगा कि 'क्या असल में देश की शुद्ध संपत्ति बढ़ी?' इसी सवाल के मद्देनजर एनडीपी पर विचार किया जा रहा है।

तो क्या होगा असली बदलाव?

अगर यह बदलाव गंभीरता से किया गया, तो पॉलिसी-मेकिंग में सवाल बदलेंगे। फिर सवाल यह नहीं होगा कि सिर्फ 'GDP growth कितनी है? बल्कि यह पूछा जाएगा कि 'NDP growth क्यों धीमी है? इसी तरह से इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में लाइफ साइकिल कास्टिंग, मेंटेनेंस प्लानिंग, एसेट क्वालिटी इत्यादि पर ज्यादा जोर होगा। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि 'उद्घाटन-केंद्रित' विकास की राजनीति मुश्किल होगी।

फिर GDP का क्या?

अगर एनडीपी को लागू भी किया जाता है तो जीडीपी तब भी रहेगा जैसे की एनडीपी अभी भी है। क्योंकि भारत GDP को हटाना नहीं चाहता बल्कि दुनिया से कटना नहीं चाहता है। इसलिए संभावित मॉडल यह है-


GDP - बाहरी दुनिया के लिए (IMF, निवेशक, तुलना)

NDP - अंदरूनी पॉलिसी-मेकिंग के लिए (नीति, बजट, sustainability)


तो यह रिप्लेसमेंट नहीं होगा बल्कि नए तरीके से पॉलिसी-मेकिंग की एक व्यवस्था होगी। क्योंकि भारत अब उस मोड़ पर है जहां सवाल यह नहीं है कि 'हम कितना तेज़ बढ़ रहे हैं?' बल्कि सवाल यह है कि 'हम जो बना रहे हैं, वह टिकेगा भी या नहीं?' यानी कि GDP हमें गति दिखाता है जबकि NDP हमें दिशा दिखाता है।

 

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अगर भारत इस बदलाव को सही ढंग से करता है, तो यह न तो वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ जाने जैसा होगा और न ही सिर्फ आंकड़ों की बाज़ीगरी होगी, बल्कि यह संकेत होगा कि भारत अब तेज़ विकास से आगे बढ़कर विकास के सही आंकड़ों के हिसाब से बढ़ रहा है।


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