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IBC में सुधार क्या वास्तव में फायदेमंद है या कि और समस्याएं लाएगा?

कर्ज न चुका पाने वाली कंपनियों के मामले को सुलझाने और बिजनेस सिस्टम में अनुशासन लाने के लिए सरकार ने कुछ सुधार किया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated

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भारत की अर्थव्यवस्था में कर्ज, बैंकिंग और कॉर्पोरेट विफलताओं का रिश्ता हमेशा जटिल रहा है। एक समय था जब डूबती कंपनियों के मामले सालों तक अदालतों में फंसे रहते थे, बैंकों का पैसा अटका रहता था और आर्थिक गतिविधियों पर इसका सीधा असर पड़ता था। इसी चुनौती से निपटने के लिए 2016 में Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) लागू किया गया, जिसे भारत के सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में गिना गया। इसका उद्देश्य साफ था कर्ज न चुकाने वाली कंपनियों के मामलों को समयबद्ध तरीके से सुलझाना, बैंकों के फंसे हुए पैसे (NPAs) की वसूली करना और बिजनेस सिस्टम में अनुशासन लाना।

 

हालांकि, लगभग एक दशक बाद, वही IBC अब अपनी सबसे बड़ी कमजोरी देरी (delay) से जूझ रहा है। ऐसे में सरकार द्वारा प्रस्तावित नए संशोधन एक बार फिर इस कानून को केंद्र में ले आए हैं, जहां यह सवाल उठ रहा है कि क्या ये बदलाव वास्तव में समाधान हैं या एक नए संकट की शुरुआत।

 

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मामले के निपटारे में काफी देरी

IBC का मूल ढांचा समयबद्ध समाधान पर आधारित था, जिसमें 180 से 330 दिनों के भीतर किसी भी इन्सॉल्वेंसी मामले को निपटाना अनिवार्य माना गया था लेकिन व्यवहार में यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं, जिससे न केवल बैंकों की वसूली प्रभावित होती है बल्कि कंपनियों की संपत्तियों की कीमत भी गिरती जाती है। इस देरी की सबसे बड़ी वजह है मामलों का अत्यधिक बोझ और मामलों को निपटाने की सीमित क्षमता, खासकर नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), जो इन मामलों का निपटारा करता है। नतीजतन, IBC का जो मॉडल तेज और प्रभावी समाधान का था, वह धीरे-धीरे एक धीमी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया में बदलता दिख रहा है।

सुधार के लिए दिया प्रस्ताव

इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने IBC में व्यापक सुधारों का प्रस्ताव रखा है, जिनका मकसद इस देरी को कम करना और प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाना है। प्रस्तावित बदलावों में फाइनेंशियल क्रेडिटर्स (Financial Creditors) को अधिक अधिकार देना शामिल है, ताकि वे कुछ मामलों में सीधे insolvency प्रक्रिया शुरू कर सकें और हर बार NCLT की लंबी प्रक्रिया पर निर्भर न रहें। 

 

इसके साथ ही, कोर्ट के बाहर समझौते को बढ़ावा देने की बात की जा रही है, जिससे कंपनियों का समाधान अदालत के बाहर ही संभव हो सके। सरकार सख्त टाइमलान को फिर से लागू करने पर भी जोर दे रही है, ताकि मामले के निपटारे की प्रक्रिया तय समय के भीतर पूरी हो सके। इसके अलावा कई ऐसे भी प्रावधान जोड़े गए हैं जिससे इस कानून को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जा सके।

क्या हैं सवाल?

हालांकि, इन सुधारों के साथ कई महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल है क्या तेज़ी के नाम पर न्याय और पारदर्शिता से समझौता होगा? यदि क्रेडिटर्स को अधिक शक्ति दी जाती है और न्यायिक निगरानी कम होती है, तो यह जोखिम पैदा हो सकता है कि बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान अपने हितों को प्राथमिकता दें और छोटे उधारकर्ताओं के साथ असंतुलन बढ़ जाए। इसी तरह, अदालत के बाहर समझौते में पारदर्शिता की कमी से अंदरूनी समझौतों और संभावित दुरुपयोग का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि IBC रिफॉर्म और सही कार्रवाई के बीच संतुलन बना पाएंगे या नहीं।

 

IBC का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य हमेशा से कंपनियों को बचाना, यानी उनका रिवाइवल रहा है लेकिन देरी के कारण कई ऐसी कंपनियां भी लिक्विडेशन की ओर चली जाती हैं, जिन्हें समय पर सही निर्णय लेकर बचाया जा सकता था। संपत्तियों की गिरती कीमत, रोजगार का नुकसान और निवेशकों का घटता विश्वास इस समस्या को और गंभीर बना देता है। यदि नए सुधार समयबद्ध और पारदर्शी समाधान सुनिश्चित कर पाते हैं, तो रिवाइवल की संभावना निश्चित रूप से बढ़ेगी लेकिन अगर प्रक्रिया जल्दबाजी में और असंतुलित तरीके से लागू होती है, तो यह जोखिम भी है कि अच्छी कंपनियां भी गलत फैसलों की वजह से बंद हो जाएं।

बैंकिंग क्षेत्र पर भी असर

इन सुधारों का सीधा असर बैंकिंग क्षेत्र पर भी पड़ेगा। बेहतर और तेज रिकवरी से बैंकों के NPAs कम हो सकते हैं और उनकी उधार देने की क्षमता बढ़ सकती है, जिससे अर्थव्यवस्था में क्रेडिट फ्लो सुधरेगा लेकिन दूसरी ओर, यदि क्रेडिटर्स को अत्यधिक शक्ति मिलती है, तो यह भविष्य में जोखिम लेने की प्रवृत्ति को भी बढ़ा सकता है, जिससे नए NPAs पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए यह जरूरी है कि सुधार केवल रिकवरी बढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि एक संतुलित और जिम्मेदार क्रेडिट कल्चर को भी बढ़ावा दें।

 

वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत का इन्सॉलवेंसी फ्रेमवर्क अभी भी विकसित हो रहा है। कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में इन्सॉलवेंसी प्रक्रिया अधिक लचीली और तेज है, जहां कंपनियों को पुनर्गठन के बेहतर अवसर मिलते हैं। भारत द्वारा क्रॉस बॉर्डर और ग्रुप इन्सॉल्वेंसी जैसे प्रावधानों को अपनाने की दिशा में उठाया गया कदम इस ओर संकेत करता है कि देश खुद को एक रिस्ट्रक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालांकि, इसके लिए केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन और मजबूत संस्थागत ढांचे की भी उतनी ही आवश्यकता होगी।

 

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लागू करना चुनौती

अंततः, IBC सुधारों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे जमीन पर कैसे लागू होते हैं। कानून में बदलाव करना अपेक्षाकृत आसान है लेकिन उसे प्रभावी और संतुलित तरीके से लागू करना ही असली चुनौती है। यदि सरकार सही संतुलन बना पाती है, तो IBC एक बार फिर भारत की आर्थिक सुधार यात्रा की सफलता की कहानी बन सकता है। लेकिन यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो यह कानून बैंकों के लिए शक्तिशाली और उधारकर्ताओं के लिए असंतुलित व्यवस्था में बदल सकता है।

 

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