logo

मूड

ट्रेंडिंग:

लड़के ही दूल्हा, लड़के ही दुलहन, किन्नौर का रौलाने उत्सव इतना खास क्यों है?

हिमाचल प्रदेश को अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। हिमाचल के किन्नौर में देव संस्कृति से जुड़ा ही एक खास उत्सव रौलाने मनाया जाता है, जिसमें दुल्हा भी लड़का होता है और दुल्हन भी।

 rroulane festival himachal pradesh

रौलाने उत्सव, Photo Credit: kanwar_photos

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement
Group2

हिमाचल प्रदेश अपनी अनोखी परंपराओं के लिए पूरे देश में मशहूर है। हिमाचल के किन्नौर जिले के कल्पा गांव में पिछले 5,000 सालों से हर साल रौलाने फेस्टिवल मनाया जात है। हर साल होली के बाद मार्च महीने में इस उत्सव को मनाया जाता है। इस उत्सव को एक दूल्हन और दूल्हा मनाते हैं और पूरा गांव उनके साथ उत्सव मनाता है लेकिन खास बात यह है कि इसमें दूल्हा भी लड़का ही बनता है और दूल्हन भी लड़का ही बनता है। सोशल मीडिया पर हर साल इस उत्सव की तस्वीरें और वीडियो वायरल होती हैं। इस उत्सव में दूल्हा-दुल्हन की ड्रेस भी काफी आकर्षक होती है। 

 

 राउलाने फेस्टिवल विशेष रूप से खेती, प्रकृति और मिट्टी से जुड़े सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है। यह त्योहार किसानों के जीवन, फसल और धरती माता को धन्यवाद देने का प्रतीक माना जाता है। इस उत्सव के रीति-रिवाज, खेलकूद और सामूहिक आयोजन इसे एक उत्सव के साथ-साथ सामाजिक एकता का भी प्रतिक बनाते हैं। 

 

यह भी पढ़ें: सूर्य की उर्जा और मंगल का साहस, जानें आपकी राशि का हाल

इतिहास

यह उत्सव सर्दियों में मनाया जाता है और हर साल इसकी तारीख चंद्रमा पर निर्भर करती है। आमतौर पर यह होली के अगले दिन मनाया जाता है। यह त्योहार हर साल सतलुज और स्पीति नदियों के संगम के किनारे बसे कल्पा गांव में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन परियां अपने महलों से निकलकर गांवों में आती हैं। ये परियां लोगों को आशीर्वाद देती हैं और गांवों की रक्षा करती हैं। इन्हीं परियों के स्वागत के लिए सदियों से यह उत्सव मनाया जाता है। जानकारों का मानना है कि इस परंपरा की शुरुआत की जानकारी नहीं है लेकिन माना जाता है कि 5 हजार साल पुरानी परंपरा है। 

किन्नौर की खास परंपरा

यह उत्सव किन्नौर जिले में मनाया जाता है। इनका प्रमुख आयोजन नागिन नारायण मंदिर में होता है। इस मंदिर को यहां आस्थाओं और देव-परंपराओं का केंद्र माना जाता है। मंदिर में आसपास के क्षेत्र में गांवों के लोग इकट्ठा होते हैं और पारंपरिक धुनों के बीच सजधज कर निकलते हैं। इसमें स्थानीय लोगों के साथ टूरिस्ट भी हिस्सा लेते हैं। 

 

यह भी पढ़ें: प्याज-लहसुन पर PIL लेकर पहुंचा वकील, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार; याचिका खारिज

पुरुष ही बनते हैं दुल्हा-दुल्हन

यह उत्सव बीते कुछ सालों से लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसके आकर्षण का मुख्य केंद्र दुल्हा और दुल्हन होते हैं और उनकी ड्रेस लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। खास बात यह है कि इसमें दुल्हा भी लड़का ही बनता है और दुल्हन भी लड़का ही बनता है। दूल्हे को रौला कहा जाता है और दुल्हन को रौलाणे कहा जाता है। दूल्हा और दुल्हन दोनों ही सिर से पैर तक किन्नौर के पारंपरिक आभूषणों, झूमर, रंग-बिरंगी झालरों और चांदी-सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। सिर से पैर तक दोनों लदे होते हैं। उनकी पहचान छिपाने के लिए उनके चेहरे को मोटे ऊनी कपड़ों से बने मुखौटों से पूरी तरह ढका जाता है। 

 

दोनों को इस तरह से तैयार किया जाता है कि कोई भी उन्हें पहचान नहीं पाता है। लोकगीतों की धुनों पर गांववाले नाचते-गाते हैं और दूल्हा-दुल्हन के रूप में आए पुरुष पूरे दिन रस्में निभाते हैं। कई जगह पर लोग भेड़-बकरियों की खाल पहनकर आते हैं और परंपरागत जीवनशैली का प्रतीक माने जाते हैं। लोग संगीत और लोककथाओं में खो जाते हैं। इस दौरान स्थानीय लोग जमकर नाचते हैं। 


और पढ़ें