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सुभाष चंद्र बोस: जिनके 'पराक्रम' पर इतना गर्व है, उनकी चिट्ठियों में क्या था?

23 जनवरी 1897। यह वह तारीख है, जब सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ था। भारत सरकार इस तारीख को पराक्रम दिवस के तौर पर मनाती है। इस फ्राइडे रिलीज में पढ़िए उनकी चिट्ठियां, वह किसे क्या लिखते थे।

Subhas Chandra Bose

सुभाष चंद्र बोस। Photo Credit: Khabargaon

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भारत की आजादी, लंबे संघर्षों का नतीजा है। भारत जब अपना गणतंत्र दिवस मनाता है, उससे ठीक 3 दिन पहले, पराक्रम दिवस भी देशभर के अलग-अलग हिस्सों में मनाया जाता है। पराक्रम दिवस, सुभाष चंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। नेताजी, देश के ऐसे अमर क्रांतिकारी थे, जिन्होंने संघर्ष में तो हिस्सा लिया लेकिन आजादी की सुबह नहीं देख पाए। 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई एक विमान दुर्घटना में उन्होंने अंतिम सांस लीं। उनकी मृत्यु रहस्यमयी रही।

सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी की अहिंसा से अलग, सशस्त्र संघर्ष में भरोसा करते थे। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक थे। जब वह कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब उन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग की। साल 1939 में उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की सहायता से आजाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन किया और आजाद हिंद सरकार स्थापित की। आजाद हिंद सरकार एक अस्थाई सरकार थी। इस सरकार को जापान, जर्मनी और इटली जैसे कई देशों का समर्थन प्राप्त था। यह सेना, भारतीय राष्ट्रीय सेना, आजाद हिंद फौज के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, जिससे भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा मिली।

सुभाष चंद्र बोस का नारा था, 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' जिस जय हिंद नारे को हम गौरव मानते हैं, उसे चेम्पारकरमन पिल्लई ने साल 1907 के आसपास रचा था लेकिन नेता जी आजाद हिंद फौज ने इसे अपना स्लोगन बनाया और यह नारा लोकप्रिय हो गया। आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजी शासन की जड़ें हिला दीं और नेता जी ब्रिटिश सरकार के सबसे बड़े अपराधी घोषित हुए। वैश्विक समर्थन हासिल करने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने हिटलर, मुसोलिनी जैसे तानाशाहों से भी मुलाकात की, जिसकी नरम दल के कांग्रेसी नेताओं ने आलोचना की। 

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सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ चिट्ठियां, जो आज देश के लिए किसी धरोहर से कम नहीं है- 

महात्मा गांधी को नेता जी ने क्या लिखा था?

'आपके नाम और प्रतिष्ठा का वे लोग उपयोग कर रहे हैं जो हमसे बदला लेना चाहते हैं। आप जानते हैं कि मैं आपका अंधा अनुकरण नहीं करता।  आपने लिखा है कि भगवान मुझे पथ दिखाए। महात्मा जी, मैं इन दिनों हर वक्त भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि मुझे वही रास्ता दिखाए जो मेरे देश और स्वाधीनता के लिए सर्वोत्तम हो। मेरा भरोसा है कि वह राष्ट्र जिंदा रहता है, जिसके नागरिक जरूरत पड़ने पर अपने देश के लिए मरने के लिए तैयार रहते हैं।'

'उच्च पदों पर बैठे कांग्रेसियों वे उनके समर्थकों में पहले की अपेक्षा आज हिंसा की भावना बहुत कम हो चुकी है। इस विषय में भी मैं अपने विचार पहले ही व्यक्त कर चुका हूं। अत: तर्क-वितर्क की आवश्यकता नहीं है। यह संभव है कि कांग्रेस विरोधियों में आज हिंसा की भावना हो, उसी के परिणामस्वरूप दंगे भड़क रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस सरकार जबर्दस्ती दबा रही है- वह एक अलग मुद्दा है। इससे हमं यह विचार नहीं बनाना चाहिए कि कांग्रेस में तथा उसके समर्थकों में हिंसा की भावना बढ़ रही है। क्‍या यह उचित है कि हम स्वतंत्रता संग्राम को तब तक स्थगित रखें-जब तक कि अन्य पार्टियां, जिनका कि हमसे कोई संबंध नहीं है अहिंसक विचारधारा वाली नहीं हो जातीं।'

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सोर्स: नेताजी सुभाष के विशेष पत्र, शंकर सुल्तानपुरी, नवयुग प्रकाशन


मां को मांसाहार पर उन्होंने क्या लिखा था?

'मां, मुझे आपसे कुछ कहना है। आपको शायद पता होगा कि मैं निरामिषभोजी होना चाहता हूं। इस डर से मैं अभी तक ऐसा नहीं कर सका हूं कि लोग मेरे इस कदम का विरोध करेंगे या इसका कुछ और अर्थ निकालेंगे। एक महीना पहले से मैंने मछली के सिवा बाकी सब मांसाहारी भोजन त्याग दिया है। लेकिन आज नादादा ने मुझे जबरदस्ती कुछ मांस खिला दिया। मैं क्या कर सकता था? मुझे वह खाना पड़ा लेकिन बहुत ही अनमनेपन से। मैं इसलिए शाकाहारी होना चाहता हूं कि हमारे ऋषियों ने कहा है कि अहिंसा एक महान गुण है। केवल ऋषियों ने ही नहीं, बल्कि, स्वयं भगवान ने ऐसा कहा है। इसलिए भगवान की सृष्टि को नष्ट करने का हमें क्या अधिकार है? क्या ऐसा करना महान पाप नहीं है? जो लोग कहते हैं कि अगर मछली न खाई जाए तो नेत्र ज्योति मंद पड़ जाती है, वे गलती पर हैं। हमारे ऋषि इतने अज्ञानी नहीं थे कि अगर मछली न खाने से लोग अंधे हो जाते तो वे मछली खाने का निषेध करते। इस बारे में आपकी क्या राय है? मै आपकी सहमति के बिना कुछ नहीं करना चाहता हूं।'

पत्नी एमिली शेंक्ल को क्या लिखते थे सुभाष चंद्र बोस?

'भारत सरकार से अधिकारिक तौर पर, विएना के काउंसिल के जरिए मुझे सूचना मिली है कि जब मैं भारत में पहुंचूंगा तो वे मुझे आजाद नहीं रहने देंगे। मैं जैसे ही भारत पहुंचूंगा मुझे सीधे जेल जाना होगा। अब मैं सोच रहा हूं कि मेरे इस सरकारी स्वागत के बावजूद मुझे भारत जाना चाहिए या नहीं। संभवतः मैं जाऊंगा। फिर भी दो तीन दिन में मैं निर्णय ले लूंगा। अगर मैं पानी के जहाज से गया तो मैं इटली की बंदरगाह के लिए 25 की सुबह बैगस्टीन से रवाना हो जाऊंगा और अगर वायुयान से गया तो 31 मार्च को बैगस्टीन से जाऊंगा। विएना में मैंने किसी को भारतीय सरकार की धमकी के विषय में नहीं बताया है। इसलिए जब तक मैं अन्य मित्रों को सूचित नहीं करता तब तक इस बात को गुप्त रखना है। यदि मैं अभी घर नहीं जाता तो तुम्हें भी फिलहाल यहां आने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैं इस समय केवल इसलिए लिख रहा हूं ताकि मेरे बुलाने पर तुम तत्काल आने को तैयार रहो ।
(बैगस्टीन, आस्ट्रिया, 16.3.1936)
 

'मुझे नहीं मालूम कि भविष्य में क्या होगा। हो सकता है पूरा जीवन जेल में बिताना पड़े, मुझे गोली मार दी जाए या मुझे फांसी पर लटका दिया जाए। हो सकता है मैं तुम्हें कभी देख नहीं पाऊं, हो सकता है कि कभी पत्र नहीं लिख पाऊं लेकिन भरोसा करो, तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगी, मेरी सोच और मेरे सपनों में रहोगी। अगर हम इस जीवन में नहीं मिले तो अगले जीवन में मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।'

सोर्स: 5 मार्च, 1936, नेशनल आर्काइव

मुसोलिनी का जिक्र सुभाष चंद्र बोस ने कैसे किया था?

प्रिय शेंक्ल, 'मुझे खेद है कि मैं नेपल्स से शीघ्र ही विएना नही पहुंच पाया। यहां पर मुझे बहुत-सा कार्य करना है और उस कार्य की उपेक्षा करना
मेरे लिए उचित नहीं होगा। आज शाम मुझे महामहिम मुसोलिनी से मुलाकात करनी है, जिन्हें मैं अपनी पुस्तक की प्रति उपहार में दूंगा। कृपया इस बात को बिल्कुल गुप्त रखें। '
तारीख: 26.1.1935

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जवाहर लाल नेहरू को सुभाष चंद्र बोस ने क्या लिखा था?

वह चिट्ठी, जिससे जाहिर हुईं जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की असहमतियां 

'मेरे प्रिय जवाहर! मुझे लग है कि कुछ समय से आप मुझ से खासे नाराज से हैं। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि आपने मेरे विरूद्ध सभी मुद्दों को बहुत उत्साहपूर्वक उठाया है। जो बातें मेरे पक्ष में हो सकती थीं, उनकी आपने उपेक्षा की है। मेरे राजनीतिक विरोधी मेरे विरूद्ध जो कुछ कहते हैं, आप मान लेते हैं जबकि उनके विरूद्ध जो कहा जा सकता है, उससे आंखें मूंद लेते हैं।' 

'आप मुझे अचानक नापंसद क्‍यों करने लगे, मेरे लिए यह एक रहस्य बना हुआ है। जबसे मैं 1937 में नजरबंदी से बाहर हुआ हूं, तभी से आपको व्यक्तिगत जीवन व राजनीतिक जीवन में अत्यधिक सम्मान व इज्जत की दृष्टि से देखता रहा हूं। राजनीति के क्षेत्र में मैंने आपको सदा बड़ा भाई और नेता माना है। समय-समय पर आपसे सलाह भी लेता रहा हूं। पिछले वर्ष जब आप यूरोप से वापस आए तो मैं इलाहाबाद आकर आपसे मिला और आपसे पूछा था कि आप हमारा नेतृत्व किस प्रकार करेंगे? जब भी इस दृष्टि से मैंने आपसे बात की तो आपके उत्तर अस्पष्ट और गैर-जिम्मेदाराना थे। उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष जब आप यूरोप से लौटे, आपने मुझे यह कहकर चुप करा दिया कि मुझे गांधीजी से परामर्श करना चाहिए फिर मैं आपसे बात करूं। गांधीजी से आपकी मुलाकात के बाद जब हम वर्धा में मिले, तो भी आपने निश्चित तौर पर मुझे कुछ नहीं बताया। बाद में कार्यकारिणी के सम्मुख कुछ प्रस्ताव रखे, जो न तो नए थे और न ही देश को कोई दिशा देने वाले थे।
सोर्स: 28 मार्च 1939, नेशनल आर्काइव

'मैंने आपसे पहले ही पूछा था कि क्या सरदार पटेल का यह कहना ठीक है कि मेरा फिर से चुना जाना, देश के हित के लिए हानिकारक होगा। आपने उन्हें यह बयान वापस लेने के लिए एक शब्द भी नहीं कहा। आपने अप्रत्यक्ष रूप से उनके आरोप का समर्थन किया। अब मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं कि महात्माजी की इस टिप्पणी के बारे में आपका क्या विचार है कि मैं अंततः देश का शत्रु नहीं हूँ। क्या आपको लगता है कि ऐसी टिप्पणी उचित थी? यदि हां, तो क्या आपने महात्माजी से मेरी ओर से कुछ कहा?

जवाब में नेहरू ने क्या कहा था?

 

3 अप्रैल, 1939, जवाहर लाल नेहरू का जवाब

तुम्हारा पत्र विशेष रूप से मेरे आचरण पर अभियोग-पत्र है तथा मेरी विफलताओं का पर्यवेक्षण है। तुम स्वयं इस बात से सहमत होगे कि अभियोगी का उत्तर देना कितना कठिन कार्य है। किंतु जहां तक विफलताओं या कमियों का संबंध है, मैं कुछ कहना चाहूंगा। मुझे खेद है कि मुझमें वे सारी कमियां हैं। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि मैं तुम्हारे इस सत्य की प्रशंसा करता हूं कि 1937 में जब से तुम गिरफ्तारी से बाहर आए हो, तुमने तब से मेरी बहुत इज्जत की है-व्यक्तिगत रूप से भी और जनता में भी। इसके लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं। व्यक्तिगत रूप से मुझे तुमसे हमेशा स्नेह रहा है तथा अब भी है और मैं तुम्हारी इज्जत भी करता हूं, हालांकि मैं तुम्हारे कार्यों से कभी-कभी सहमत नहीं होता हूं। किसी हद तक मेरे विचार से हमारा आचरण भिन्‍न है। साथ ही, जीवन और उसकी समस्याओं के प्रति हमारी सोच भी एक नहीं है। अब मैं तुम्हारे पत्र का उत्तर दूंगा और पैराग्राफ का जवाब एक-एक करके दूंगा।

वंदे मातरम पर जवाहर लाल नेहरू के साथ क्या बात हुई?

प्रिय जवाहर, वंदे मातरम् के संदर्भ में हम कलकत्ता में बात करेंगे और यदि आप इस विषय को कार्यकारिणी की समिति में भी इसे उठाएं। मैंने डॉ. खेर को भी लिखा है कि जब आप शांति निकेतन आएं तो वे आपसे इस विषय में चर्चा करें। मैं आप से इस विषय में सदा सहमत रहा हूं कि हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रश्न पर आर्थिक प्रश्न अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सांप्रदायिक मुसलमानों को बार-बार यह कहने की आदत है कि कभी मुसलमानों को नौकरियों में कम जगह मिलती है और अब वंदे मातरम् को लेकर। अचानक ही वंदे मातरम् का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है, शायद इसलिए कि लोकसभा में इसे गाया गया और यह कांग्रेस की विजय का प्रतीक बना। राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा उठाई गई कठिनाइयों व मुश्किलों पर हम सहर्ष विचार करने को तैयार हैं, किंतु सांप्रदायिक मुसलमानों की उठाई किसी बात को अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। यदि आज उनकी 'वंदे मातरम्' की बात पर उनकी तुष्टि करने का प्रयत्न किया गया तो कल वे कोई और नई बात उठा देंगे, केवल सांप्रदायिक भावनाओं को उभारने के लिए और कांग्रेस को दुविधा में डालने के लिए। टिप्पराह के विषय में आपने जो लिखा है उसे पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। आपको शायद याद होगा कि कुछ समय पूर्व मैंने टिप्पराह जिले में खराब के विषय में लिखा था और संकेत भी किया था कि केवल वैधानिक दृष्टि से इस समस्या का हल खोजना अत्यधिक कठिन कार्य है। बंगाल के तीन जिले टिप्पराह, सिलहट और फरिदपुर में इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं।

अमियनाथ बोस को क्या लिखा था?

मेरे प्रिय अमि, पिछले दो माह से मैं बिस्तर पर हूं यह सबसे लंबी व बुरी बीमारी है। मुझे ब्रोंको-न्यूमोनिया कुछ और बीमारियों के साथ हो गया है। इस बिमारी के साथ-साथ राजनीतिक संकट के कारण मानसिक उद्देग भी है। मुझे किसी भी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक आराम नहीं मिल पाया। तेज बुखार होने के बावजूद बिस्तर में कार्य करना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मैं कभी स्वस्थ नहीं हो पाऊंगा। संकट की घड़ी बीत गई है। मैं स्वस्थ होने को हूं। 24 तारीख को मैं कलकत्ता जाऊंगा। वहां बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की वार्षिक बैठक और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक भी है। तापमान सामान्य है, कमजोरी लंबे समय तक चलेगी। यदि जा सका तो गर्मियों में परिवर्तन के लिए जाऊंगा। देखते हैं, क्या होता है। आपके कागजात मिल गए हैं। आपने बयान और उसके उत्तर में जारी बयान साथ ही कांग्रेस का लेखा-जोखा भी देखा होगा। पुराने नेताओं का मानना है कि मुझे चुनाव में 25 या 30 प्रतिशत मत मिलेगे। नतीजे से उन्हें धक्का लगा हैं। उन लोगों में बेचैनी का आलम है। उन्हें लगा कि न केवल सात प्रांतीय सरकारें उनके हाथों से फिसली जा रही है, बल्कि गांधीवादियों को लगा कि उनका 20 वर्ष का कार्य एक दिन में धुल गया। उनका सारा नजला मुझ पर गिरा। देशबंधु के बाद से किसी ने भी उन्हें इतनी बुरी तरह नहीं हराया था। तब गांधीजी ने बयान जारी किया। उन्होंने पुराने नेताओं को बचाते हुए कहा कि उनकी हार मेरी हार है। केंद्रवादियों की राय बदलने लगी। वे हमें समर्थन देने का बाध्य थे किंतु जैसा कि उन्होंने बताया, वे गांधीजी को निकाल बाहर करने को तैयार नहीं थे।'

(तारीख: 7.4.1939, सोर्स: सुभाष चन्द्र बोस के दस्तावेज)

लोहिया को क्या लिखा था?

'प्रिय, डॉ. लोहिया,  बहुत दिनों से आपको पत्र लिखने की सोच रहा था, विशेष रूप से एक विषय के संबंध में फ्रेंच इंडिया के बंदियों के बारे में,जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश इंडिया में बंदी बनाकर रखा हुआ है। अखबार वाले लिखते हैं कि आपका फ्रेंच-इंडिया तथा फ्रेंचलीग ऑफ ह्युमन राइट्स से पत्राचार चल रहा है। मैं वहां से प्राप्त उत्तर को जानने का उत्सुक हूं। आपकी फाइल लौट पलट कर देखने पर पाया कि एक पत्र में आपने मेरे दर्जन के लभभग चित्र मांगे हैं। मेरे पास अच्छे चित्र नहीं हैं। एक चित्र संभव है किंतु विदेश में प्रकाशित होने लायक नहीं है। बहरहाल, अलग से चित्र भिजवा रहा हूं। अगर आपको लगेगा कि वह चल सकता है तो कृपया मुझे सूचित करें। मैं उसकी प्रतियां बनवाकर भिजवा दूंगा। मेरे विचार से यह आवश्यक है कि पूरे भारत में राजनैतिक बंदियों को रिहाई के लिए जबर्दस्त अभियान छेड़ा जाए। यह सबसे उपयुक्त समय है। आपकी इस विषय में क्या राय है।'
तारीख 27.6.1937।

रवीन्द्रनाथ टैगोर को क्या लिखा था?

माननीय महोदय,मैं आपको एक विशेष प्रयोजन से कष्ट दे रहा हूँ। आशा है असुविधा के लिए क्षमा करेंगे। आजकल मैं लंदन के एक प्रकाशक के आग्रह पर एक पुस्तक लिख रहा हूं। पुस्तक का विषय है द इंडियन स्ट्रगल (1920–34)। प्रकाशक हैं- विसार्ड एंड कंपनी, 9 जॉन स्ट्रीट, एल्डविच, लंदन, डब्ल्यू.सी.-2। अगस्त के अंत तक मैं पुस्तक लिख कर दे दूंगा और अक्टूबर माह में पुस्तक प्रकाशित होने की आशा है। व्हाइट सिलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट लोगों के समक्ष आने के साथ-साथ मेरी पुस्तक भी तैयार हो चुकी होगी। पुस्तक का पहला अध्याय होगा, हिस्टोरिकल बैकग्राउंड। अंत के अध्याय में संभावित घटनाओं का उल्लेख किया जाएगा। प्रकाशक को इंग्लैंड व अमेरिका में पुस्तक के अधिकाधिक बिकने की आशा है। वह इसके जर्मन व फ्रेंच अनुवाद की व्यवस्था भी कर रहा है। मैं अंग्रेजी के प्रतिष्ठित लेखक से इस पुस्तक की भूमिका लिखवाना चाहता हूं। यदि बर्नार्ड शॉ इस पुस्तक के संबंध में कुछ पंक्तियाँ लिख दें तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। आप इस कार्य में सहायक हो सकते हैं। यदि श्री बर्नार्ड शॉ को आप इस संबंध में लिख दें तो मैं आपका आभारी रहूँगा। किंतु यदि ऐसा करने में आपको तनिक भी कठिनाई या हिचक महसूस हो तो मैं नहीं चाहूंगा कि अनुरोध किया जाए। यदि आप उन्हें लिखने का निर्णय करें तो कृपया ऐसे लिखें कि अनुकूल परिणाम प्राप्त हो। केवल मेरी प्रार्थना हेतु लिखने का कोई अर्थ नहीं है। जब मैं यूरोप आ रहा था तो आपने श्री रोमां रोलां के लिए मुझे एक परिचय-पत्र दिया था, किंतु वह पत्र ऐसे लिखा गया था जैसे मात्र मेरा मन रखने के लिए लिखा गया हो। परिणामस्वरूप मैं उसका उपयोग नहीं कर पाया और मैंने स्वयं अपने स्तर पर श्री रोलां से पत्र-व्यवहार प्रारंभ किया। श्री बर्नार्ड शॉ शायद मेरे विषय में कुछ नहीं जानते। इसलिए उन्हें सही रूप में लिखना ही श्रेयस्कर होगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी पुस्तक का खूब स्वागत होगा, क्योंकि प्रकाशक ने मुझसे अग्रिम अनुबंध कर लिया है। रॉयल्टी की राशि मिलने पर ही मैंने लेखन कार्य प्रारंभ किया है।'


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