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84 करोड़ का खेल या सिस्टम की चूक? बिहार में PHED टेंडर पर बवाल की पूरी कहानी

बिहार में 84 करोड़ रुपये के एक PHED टेंडर को लेकर राज्य में बवाल शुरू हो गया है और मामला विधान परिषद तक पहुंच गया है। विभाग पर कॉन्ट्रैक्ट की जरूरी शर्तों को नजरअंदाज करने का आरोप है।

samrat choduhary in meeting

मीटिंग में शामिल हुए सम्राट चौधरी, Photo Credit: CMO Bihar

बिहार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की एक महत्वाकांक्षी जलापूर्ति परियोजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। करीब 84 करोड़ रुपये के टेंडर को लेकर उठे आरोपों ने विभागीय कार्यप्रणाली, टेंडर प्रक्रिया और जांच व्यवस्था पर कई बड़े प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।


आरोप है कि विभाग ने कॉन्ट्रैक्ट की जरूरी शर्तों को नजरअंदाज करते हुए ऐसी कंपनी को ठेका दे दिया, जो कथित तौर पर पात्रता के मूल मानकों पर ही खरी नहीं उतरती थी। मामला सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक चर्चा का विषय बन गया है।

क्या है पूरा मामला?

मधेपुरा जिले की जलापूर्ति योजना के लिए साल 2024 में लगभग 84 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया था। कॉन्ट्रैक्ट डॉक्यूमेंट में स्पष्ट रूप से लिखा था कि बोली लगाने वाली एजेंसी के पास संबंधित क्षेत्र में कम से कम 10 साल का अनुभव होना चाहिए।


लेकिन आरोपों के अनुसार जिस कंपनी को यह ठेका मिला, उसका गठन ही वर्ष 2021 में हुआ था। यानी कंपनी की उम्र महज तीन वर्ष के आसपास थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 10 साल के अनुभव की जरूरी शर्त पूरी किए बिना कंपनी को योग्य कैसे माना गया?

कंपनी के अनुभव पर विवाद

टेंडर प्राप्त करने वाली कंपनी हिलटॉप रेफ्रिजरेशन इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड बताई जा रही है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कंपनी ने अपने अनुभव के समर्थन में एक दूसरी संस्था हिलटॉप रेफ्रिजरेशन प्राइवेट लिमिटेड के कार्यों का हवाला दिया।


यहीं से विवाद और गहरा हो गया। आरोप है कि दोनों संस्थाओं के नाम अलग-अलग हैं, इसलिए अनुभव का दावा भी जांच के दायरे में आता है। साथ ही कंपनी के पास जलापूर्ति परियोजनाओं, पाइपलाइन बिछाने, प्लंबिंग तथा सीपीवीसी कार्यों का पर्याप्त अनुभव होने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

विधान परिषद तक पहुंचा मामला

सूत्रों के मुताबिक शिकायत आर्थिक अपराध इकाई और पीएचईडी के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची। मामला बिहार विधान परिषद में भी उठा, जहां विपक्षी सदस्यों ने टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए। सदन में चर्चा के बाद जांच के निर्देश दिए गए और मामले की समीक्षा की जिम्मेदारी विभागीय स्तर पर सौंपी गई।

जांच पर भी उठे सवाल

विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू जांच प्रक्रिया को लेकर सामने आया है। आरोप है कि जिस अधिकारी की भूमिका टेंडर स्वीकृति प्रक्रिया में रही, उसी स्तर के अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी भी दी गई। इस वजह से शिकायतकर्ताओं और विपक्षी दलों ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि जांच स्वतंत्र एजेंसी या बाहरी तकनीकी समिति से कराई जाती, तो उसकी विश्वसनीयता अधिक होती।

22 करोड़ रुपये का भुगतान भी चर्चा में

मामले को लेकर एक और बड़ा दावा यह है कि संबंधित कंपनी को अब तक लगभग 22 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। ऐसे में यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो सरकारी धन के उपयोग और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

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