दिल्ली में ग्राउंड वॉटर में यूरेनियम की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 के अनुसार, दिल्ली देश में यूरेनियम से दूषित सैंपल्स के मामले में पंजाब और हरियाणा के बाद तीसरे स्थान पर है। दिल्ली के 13-15% टेस्टेड सैंपल्स में यूरेनियम की मात्रा सुरक्षित सीमा 30 ppb (पार्ट्स पर बिलियन) से ज्यादा पाई गई है। इससे पीने के पानी की सुरक्षा और लोगों के स्वास्थ्य को बड़ा खतरा हो गया है।
रिपोर्ट बताती है कि दूषित पानी की समस्या लगातार बढ़ रही है। 2020 में 11.7% सैंपल्स में यूरेनियम सीमा से ऊपर था। उत्तरी-पश्चिम जिले के एक ट्यूबवेल से 89.4 ppb का रिकॉर्ड स्तर मिला था। 2024 तक नॉर्थ, नॉर्थ वेस्ट, साउथ, साउथ ईस्ट, साउथ वेस्ट और वेस्ट- कुल 6 जिलों में भूजल खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। पूरे शहर में 10.7% सैंपल्स दूषित हैं। नरेला का औचंदी (42 ppb) और कांझावाला का निजामपुर (46.5 ppb) मुख्य हॉटस्पॉट हैं।
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पर्यावरण को लेकर चिंता
पर्यावरण ग्रुप्स ने इस बात को लेकर चिंता जतायी है। उन्होंने लेफ्टिनेंट गवर्नर और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर विस्तृत वॉटर क्वॉलिट डेटा और इसके ट्रीटमेंट की योजना को स्पष्ट करने के लिए कहा है। अर्थ वॉरियर संगठन ने कहा, 'यूरेनियम के साथ नाइट्रेट, फ्लोराइड और खारेपन का मिश्रण स्वास्थ्य के लिए घातक है।'
दिल्ली जल बोर्ड 5,500 ट्यूबवेलों से रोज 450 मिलियन लीटर (MLD) आधा-या बिना शुद्ध किया पानी सप्लाई करता है। सीजीडब्ल्यूबी ने 2024 में मानसून से पहले और बाद में 3,754 सैंपल्स टेस्ट किए। मानसून से पहले 6.71% और बाद में 7.91% सैंपल्स में यूरेनियम ज्यादा था। पंजाब सबसे ऊपर, फिर हरियाणा और दिल्ली।
स्वास्थ्य पर खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक, यूरेनियम, आर्सेनिक और लेड का लंबे समय तक सेवन किडनी खराब होने, दिमागी नुकसान, हड्डियों के विकृति और कैंसर का कारण बनता है। लोहा और मैंगनीज बच्चों के लिए खतरनाक हैं। इससे पानी पीने लायक नहीं रहता और खेती बर्बाद होती है- मिट्टी और फसलों में जहर जम जाता है।
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दिल्ली में खारेपन की समस्या भी गंभीर है। सोडियम एब्ज़ॉर्पशन रेशियो 179.8 है, जो देश में सबसे ज्यादा में से एक है। इसकी वजह से दिल्ली देश के उन 1.11% इलाकों में शामिल हो गया है जो कि सिंचाई के लिए अयोग्य और 7.23% में से उस एरिया में शामिल हो गया जो खारे पानी से जूझ रहा है।
सीजीडब्ल्यूबी हर 15 दिन में राज्यों को अलर्ट भेजता है। इससे जागरूकता बढ़ेगी और कदम उठाए जा सकेंगे।