गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई करते हुए बहुत महत्वपूर्ण बात कही है। जस्टिस गीता गोपी की अदालत ने स्पष्ट किया कि एक पिता भले ही अपने किसी पुराने लोन का भुगतान कर रहा हो या उसकी कोई भी किस्त कट रही हो, वह इन वजहों से अपने बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अदालत ने कहा कि बच्चों के लिए खाना, कपड़े, रहने की जगह, इलाज और पढ़ाई जैसे बुनियादी खर्चे सबसे पहले आते हैं और पिता इनसे अपना मुंह नहीं मोड़ सकता।
यह मामला तब शुरू हुआ जब तीन जुड़वा बच्चों की मां ने उनके खर्च के लिए पैसे बढ़ाने की मांग करते हुए याचिका दायर की। उस समय बच्चों की उम्र करीब 9 साल थी। 3 जुलाई 2024 को कोर्ट ने आदेश दिया था कि बच्चों का खर्च बढ़ाया जाए क्योंकि महंगाई और जरूरतें बढ़ गई हैं।
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पिता जो जिला उपभोक्ता फोरम में 'वॉटर बेयरर' यानी पानी पिलाने वाले के तौर पर काम करते हैं और करीब 14,800 रुपये महीना कमाते हैं, इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए। पिता के वकील का कहना था कि बच्चों की मां ने अपनी वित्तीय स्थिति का खुलासा नहीं किया है, इसलिए यह आदेश रद्द होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद मामले को वापस गुजरात हाई कोर्ट भेज दिया और कहा कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी कमाई और खर्चों का पूरा हिसाब कोर्ट को दें।
पिता के दावों का पूरा सच
अदालत में पेश किए गए कागजों से दोनों की आर्थिक स्थिति साफ हुई। मां ने बताया कि वह बालवाटिका में शिक्षिका हैं और उनका वेतन 88,368 रुपये है। उन्होंने बताया कि तीनों बच्चों के रहने का खर्च 4,500 रुपये और स्कूल की फीस 9,000 रुपये है। इस तरह सिर्फ इन दो चीजों पर ही हर महीने 13,500 रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा मेडिकल के 1,500 रुपये और बच्चों की ट्यूशन फीस करीब 20,000 रुपये है हालांकि एक बच्चा ट्यूशन नहीं पढ़ता। मां ने यह भी बताया कि वह 12,779 रुपये की ईएमआई और अन्य लोन भी चुका रही हैं। वह दोबारा शादी किए बिना अकेले ही बच्चों को पाल रही हैं। दूसरी तरफ पिता ने बताया कि उनके महीने के खर्च 10,000 रुपये हैं और उन पर एक व्यक्ति का 3,500 रुपये का खर्च भी है। उनकी मां को 8,000 रुपये पेंशन मिलती है। पिता ने दूसरी शादी कर ली है और वह अपनी दूसरी पत्नी के लिए लिए गए कर्ज की किस्तें भी भर रहे हैं।
कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने सारी बातों को सुनने के बाद कहा कि भले ही मां अच्छा कमा रही है और बच्चों का मुख्य सहारा वही है लेकिन पिता अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने पिता की आय को छह हिस्सों में बांटने का पैमाना तय किया जिसमें पिता खुद उसकी दूसरी पत्नी उनका एक बेटा और पहली शादी से हुए तीन जुड़वा बच्चे शामिल हैं।
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पिता की मां को इस गिनती में नहीं रखा गया क्योंकि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं। कोर्ट ने 16 जुलाई 2019 की सरकारी अधिसूचना के आधार पर पिता की आय 14,600 रुपये मानते हुए आदेश दिया कि वह अपने तीनों बच्चों को हर महीने 1,000-1,000 रुपये यानी की पूरे 3,000 रुपये पालन-पोषण के तौर पर जरूर दे। अदालत ने साफ कर दिया कि पिता की दूसरी शादी या उसका कोई भी लोन बच्चों के हक के आड़े नहीं आ सकता।