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घर में नहीं था कोई बेटा, पिता की लाश को कंधा देकर बहनों ने समाज को दिया संदेश

अक्सर यह देखा जाता है कि अंतिम संस्कार से जुड़े कामों में महिलाओं को पीछे कर दिया जाता है। बिहार के वैशाली में पांच बहनों ने अपने पिता को कंधा देकर अपनी जिम्मेदारी निभाई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT

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बिहार के वैशाली जिले के नया टोला गांव में एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने वर्षों पुरानी सामाजिक मान्यताओं को झकझोर दिया। यहां पांच बेटियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर यह साबित कर दिया कि जिम्मेदारियों का कोई लिंग नहीं होता। जिस समाज में आज भी अंतिम संस्कार जैसे संस्कारों को केवल बेटों का अधिकार माना जाता है, वहां इन बेटियों ने साहस, संवेदना और संस्कार की ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी चर्चा पूरे इलाके में हो रही है।

 

वैशाली थाना क्षेत्र के नया टोला निवासी तारिणी प्रसाद सिंह का निधन हो गया। परिवार में पत्नी ललिता देवी और पांच बेटियां क्रमशः पूनम, नीलम, माधुरी, माला और चांदनी हैं। परिवार में कोई पुत्र नहीं था। पिता के निधन के बाद घर में दुख का माहौल था, वहीं दूसरी ओर अंतिम संस्कार को लेकर लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं भी शुरू हो गईं। गांव के कुछ लोग परंपरा का हवाला दे रहे थे, लेकिन बेटियों ने तय कर लिया कि वे अपने पिता को अंतिम विदाई खुद देंगी।

 

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पांचों बहनों ने पिता की अर्थी को अपने कंधों पर उठाया। गांव की गलियों से जब बेटियां पिता की अर्थी लेकर निकलीं तो हर आंख नम हो गई। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि समाज की उस सोच के खिलाफ एक शांत लेकिन मजबूत संदेश था, जिसमें बेटियों को अक्सर कमजोर या सीमित जिम्मेदारियों तक बांधकर देखा जाता है।

पिता ने बेटे और बेटियों में कभी फर्क नहीं किया

 

बेटियों ने कहा कि उनके पिता ने कभी बेटे और बेटी में फर्क नहीं किया। उन्होंने उन्हें पढ़ाया-लिखाया, आत्मनिर्भर बनने की सीख दी और हमेशा यह विश्वास दिलाया कि वे किसी से कम नहीं हैं। यही कारण है कि पिता के अंतिम समय में उन्होंने अपना फर्ज निभाने से पीछे हटना उचित नहीं समझा। माधुरी सिंह ने भावुक होकर कहा कि समाज में आज भी लड़का और लड़की के बीच भेदभाव किया जाता है। कई जगहों पर बेटियों को परिवार की जिम्मेदारियों के योग्य नहीं माना जाता लेकिन आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि वे यह संदेश देना चाहती हैं कि बेटियां सिर्फ घर संभालने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर बेटे की हर जिम्मेदारी भी निभा सकती हैं।

 

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इस घटना के बाद गांव में चर्चा का माहौल है। लोग बेटियों के साहस और संस्कार की खुलकर सराहना कर रहे हैं। कई बुजुर्गों ने माना कि समय बदल रहा है और समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। गांव की महिलाओं ने भी इसे प्रेरणादायक कदम बताया और कहा कि बेटियां परिवार का सम्मान और सहारा दोनों होती हैं। यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते समाज की तस्वीर है। आज बेटियां शिक्षा, रोजगार, सेना, राजनीति और विज्ञान हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। ऐसे में यह सोच कि केवल बेटा ही परिवार की परंपराओं और जिम्मेदारियों को निभा सकता है, अब धीरे-धीरे टूट रही है।

 

नया टोला की इन पांच बेटियों ने यह साबित कर दिया कि रिश्तों की मजबूती लिंग से नहीं, संस्कार और जिम्मेदारी से तय होती है। पिता की अर्थी को कंधा देकर उन्होंने न सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं।

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