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हर-की-पौड़ी में नहीं प्रवेश नहीं कर सकेंगे गैर-हिंदू, जगह-जगह लगे बोर्ड

नगर पालिका के 100 साल से ज्यादा पुराने नियमों का हवाला दिया गया है। ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों के लिए यह नियम लागू नहीं होगा।

 Haridwar

हरिद्वार । Photo Credit: PTI

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हरिद्वार के सबसे प्रसिद्ध घाट हर-की-पौड़ी पर अब नए नोटिस बोर्ड लगाए गए हैं। ये बोर्ड 100 साल से ज्यादा पुराने नगर पालिका के नियम का हवाला देते हुए कहते हैं कि गैर-हिंदू लोग यहां प्रवेश नहीं कर सकते। ये बोर्ड घाट में जाने वाले सभी रास्तों पर लगाए गए हैं। गंगा सभा के सचिव उज्जवल पंडित ने बताया कि यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि आने वाले श्रद्धालु इस धार्मिक जगह के नियमों को अच्छे से जान सकें।

 

यह नियम साल 1916 में बनाए गए थे, जब गंगा सभा की स्थापना हुई थी। नियम के अनुसार, ड्यूटी पर तैनात अधिकारी छोड़कर कोई भी गैर-हिंदू व्यक्ति समा भूमि (एक द्वीप जैसा प्लेटफॉर्म), हर-की-पौड़ी इलाका या कुशावर्त घाट में नहीं जा सकता। समा भूमि में हर-की-पौड़ी के पास के पुल और जंबू घाट शामिल हैं। इसमें मालवीय द्वीप और कुशावर्त घाट भी आते हैं, जो सुभाष घाट के पास है।

 

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कब्जा करने की कोशिश

गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने कहा है कि वे राज्य सरकार और मुख्यमंत्री से गुजारिश कर रहे हैं कि पूरे हरिद्वार के सभी गंगा घाटों और कुंभ मेला क्षेत्र में भी ऐसे ही बोर्ड लगाए जाएं। उनका कहना है कि घाटों पर कब्जा करने की कोशिशें बढ़ रही हैं, इसलिए ऐसे बोर्ड जरूरी हैं। हरिद्वार में गंगा के किनारे कुल 72 घाट हैं।

 

लेकिन जिला प्रशासन ने इस मामले में सावधानी बरती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ये पुराने नगर पालिका के नियम हैं और इन्हें लागू करना नगर निगम व पुलिस की जिम्मेदारी है। प्रशासन की ओर से अभी कोई नया आदेश जारी नहीं हुआ है। कोई भी कार्रवाई कानून के अनुसार ही होगी।

पहले से हैं नियम

हरिद्वार की मेयर किरण जैसल ने कहा कि ये नियम नए नहीं हैं। ये पहले से हैं और गंगा सभा सिर्फ इन्हें बोर्ड लगाकर याद दिला रही है। उन्होंने बताया कि इन नियमों में गैर-हिंदुओं को इस इलाके में संपत्ति खरीदने, घर बनाने या रात गुजारने की भी मनाही है।

 

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वहीं, हरिद्वार के सामाजिक कार्यकर्ता रतन मणि डोभाल ने इन बोर्डों को सांप्रदायिक और भेदभाव वाला बताया है। उन्होंने कहा कि अगर गंगा सभा को ये नियम इतने पवित्र लगते हैं, तो गंगा की ओर मुंह वाले घरों को क्यों नहीं तोड़ा जाता? घाटों पर दुकानें और खाना बनाना क्यों चल रहा है? लंगर क्यों लगते हैं? ये सब चीजें भी पुराने नियमों में साफ मना हैं।

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