झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी के साथ रहने का हक (रेस्टिट्यूशन ऑफ कॉन्जुगल राइट्स) मांगा था। कोर्ट ने कहा कि हिंदू पत्नी को पुराने समय में 'धर्मपत्नी' या 'अर्धांगिनी' माना जाता था।
उससे उम्मीद की जाती थी कि वह हमेशा पति के साथ रहे, पति के शरीर का हिस्सा बनकर उसके साथ चले। लेकिन अब यह पुरानी सोच में बड़ा बदलाव आ चुका है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की बेंच ने यह टिप्पणी की। उन्होंने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया, जिसमें पति की याचिका खारिज की गई थी। कोर्ट ने कहा, 'सच है कि पुराने समय में हिंदू धर्म में पत्नी को धर्मपत्नी, अर्धांगिनी, भार्या या अनुगामिनी माना जाता था। उससे उम्मीद थी कि वह पति की हर इच्छा मान ले।’
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लिंगभेद खत्म हो रहा
हालांकि, एजुकेशन बढ़ने, महिलाओं में ज्यादा पढ़ाई-लिखाई और संविधान में महिलाओं को बराबर अधिकार मिलने से यह सोच पूरी तरह बदल गई है। अब हर जगह लिंग भेद खत्म हो रहा है। 'कोर्ट ने साफ कहा कि शादी में कोई भी साथी दूसरे पर बेहतर या ऊंचाई वाला हक नहीं मांग सकता।
दोनों बराबर हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि साथ रहना सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है। पति और पत्नी दोनों को मिलकर रिश्ते का सही रास्ता ढूंढना चाहिए। शादी का मतलब दोनों का साथ-साथ खुशी से रहना और वैवाहिक जीवन जीना है। लेकिन अगर दोनों नौकरी या प्रोफेशन में लगे हैं, तो उनकी शादी का तरीका उनकी नौकरी के अनुसार होना चाहिए।
क्या है मामला?
पति ने फैमिली कोर्ट में कहा कि शादी के कुछ दिनों बाद ही पत्नी अलग रहने लगी। पत्नी टीचर है, इसलिए वह अपनी बड़ी बहन और परिवार के साथ रहने लगी। पति का आरोप था कि पत्नी बिना बताए घर छोड़कर चली गई, सारे गहने और सामान ले गई। उसने पति पर दबाव डाला कि वह 'घर जमाई' बनकर आए, लेकिन पति ने मना कर दिया। बाद में पत्नी ने तलाक मांगा, तो पति ने साथ रहने की याचिका दाखिल की। पत्नी ने इन आरोपों का विरोध किया। उसने कहा कि पति और उसके परिवार ने उसे परेशान किया और दहेज की मांग की। फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने पूछा - क्या पति को पूरा हक है कि वह पत्नी से कहे कि नौकरी छोड़ दो और सिर्फ मेरे साथ रहो, घर और बच्चों की देखभाल करो? इसी तरह, क्या पत्नी पति से कह सकती है कि मेरी नौकरी के अनुसार ही वैवाहिक जीवन जियो? आजकल ऐसे मामले बढ़ रहे हैं क्योंकि बहुत से पति-पत्नी पढ़े-लिखे हैं और अपनी-अपनी नौकरी या करियर को आगे बढ़ाना चाहते हैं। पत्नी का अपनी नौकरी जारी रखना और साथ ही शादीशुदा जीवन को एडजस्ट करना बिल्कुल गलत नहीं है।
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कोर्ट ने कहा कि इस मामले में फैमिली कोर्ट का फैसला सबूतों पर आधारित है और सही है। पुरानी सोच अब लागू नहीं होती। अब समय बदल गया है, महिलाओं को भी बराबरी का हक है। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और आधुनिक वैवाहिक जीवन को मजबूत करने वाला है।