MP में दर्जनों अफसरों ने जमीन खरीदी, वहीं से निकला बाइपास, क्यों उठे सवाल?
मध्य प्रदेश में एक बाइपास पास होने से ठीक पहले अधिकारियों का जमीन खरीदना अब चर्चा का विषय बन गया है। जमीन खरीदने के बाद लैंड यूज में भी बदलाव हुआ है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT
मध्य प्रदेश के अधिकारियों का एक कारनामा चर्चा में आ गया है। अचानक कुछ गांवों की जमीन को लगभग 50 अधिकारियों ने खरीदा और कुछ ही दिन बाद वहां से 3200 करोड़ रुपये की लागत का एक बाइपास मंजूर हो गया। बाइपास पास होने के चलते इन जमीनों की कीमत लगभग 11 गुना बढ़ गई। अब एक रिपोर्ट के चलते यह मामला चर्चा में आ गया है और अधिकारियों पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि इन अधिकारियों को पहले से ही जानकारी थी कि बाइपास यहीं से जाने वाला है इसलिए इन लोगों ने जमीन खरीदी और मुनाफा कमाया।
10 अप्रैल 2026 को दैनिक भास्कर में हेमेन्दर शर्मा की एक रिपोर्ट पब्लिश हुई। इस रिपोर्ट में एक ऐसा किस्सा बताया गया जिसने कई सवाल खड़े किए। साल 2022 की अप्रैल की 4 तारीख से एक किस्सा शुरू होता है। इसी दिन भोपाल के कोलार क्षेत्र का गुराड़ी घाट गांव अचानक से एकदम से चर्चा में आया। कारण था रजिस्ट्री ऑफिस में एक ही डॉक्यूमेंट पर 50 लोगों का नाम दर्ज होना। ये कोई साधारण लोग नहीं थे। इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, हरियाणा काडर से लेकर दिल्ली में बैठे रसूखदार नौकरशाह। जिसमें कई सीनियर आईएएस और आईपीएस अफसर्स थे।
कौड़ी के भाव खरीदी जमीन
यह बेहद दुर्लभ मौका था जब देश भर के अलग-अलग काडर के अफसर एक साथ एक ही सोच के साथ मिलते हैं और 2.023 हेक्टेयर (करीब 5 एकड़) कृषि भूमि खरीदते हैं। रजिस्ट्री में इसकी कीमत 5.5 करोड़ रुपये दिखाई गई जबकि उस समय इसका बाजार मूल्य लगभग 7.78 करोड़ रुपये था। हिसाब लगाया जाए तो उस वक्त इन अफसरों को यह जमीन मात्र ₹81.75 प्रति वर्ग फुट के आसपास पड़ी थी। उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि खेती की इस जमीन में ऐसा क्या है कि देश भर के नौकरशाह यहां एक साथ टूट पड़े है। लेकिन इस राज से पर्दा हटा इस खरीदारी के करीब 16 महीनों बाद।
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31 अगस्त 2023 को मध्य प्रदेश कैबिनेट ने एक बड़ा फैसला लिया। भोपाल के लिए 3200 करोड़ रुपये के वेस्टर्न बाइपास को मंजूरी दी गई। हैरानी की बात यह है कि इस बाइपास का जो अलाइनमेंट (नक्शा) तय हुआ, वह ठीक उसी जमीन से महज 500 मीटर की दूरी से गुजर रहा था। जैसे ही बाइपास की खबर पक्की हुई, गुराड़ी घाट की उस जमीन की कीमतें आसमान छूने लगीं। जो इलाका कल तक पिछड़ा माना जाता था, वह अब राजधानी के सबसे हॉट रियल एस्टेट डेस्टिनेशन में बदल चुका था लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बाइपास की मंजूरी के ठीक 10 महीने बाद, यानी जून 2024 में एक और चमत्कार हुआ। प्रशासन ने इस जमीन का लैंड यूज (भू-उपयोग) बदल दिया। जो जमीन कल तक कागजों पर 'कृषि भूमि' थी, वह अब आवासीय (रेजिडेंशियल) घोषित कर दी गई।
लैंड यूज से हुआ बड़ा खेल?
प्रशासन की ओर से किसी जमीन का लैंड यूज बदलना एक सोची-समझी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया होती है। जब जमीन कृषि (एग्रीकल्चरल) से आवासीय (रेजिडेंशियल) में बदलती है तो इसका सीधा मतलब है कि अब उस जमीन पर फसल उगाने के बजाय घर, कॉलोनी या टाउनशिप बनाई जा सकती है। इससे ना केवल उस जमीन का इस्तेमाल बदलता है बल्कि बढ़ती है उसकी वैल्यू। रेजिडेंशियल लैंड की वैल्यू- एग्रीकल्चरल लैंड से कई गुणा ज्यादा होती है। जैसे इस केस में अप्रैल 2022 में जब जमीन खरीदी गई तब वह एग्रीकल्चरल लैंड थी। उस वक्त इसकी कीमत करीब-करीब ₹81.75/वर्गफीट थी लेकिन डायवर्जन के बाद जून 2024 में उसी जमीन की कीमत ₹557/वर्गफीट हो गई यानी करीब 6.87 गुना हो गई। प्रतिशत में बताएं तो 587.65% की बढ़ोतरी हुई। इस बढ़ोतरी से उस 5 एकड़ की जमीन की कीमत जो तब 5.5 करोड़ दिखाई गई अब हो गई 12 करोड़ 13 लाख रुपये से भी ज्यादा।
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दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में इस इलाके की बाजार दर ₹2500 से ₹3000 प्रति वर्ग फीट के बीच पहुंच गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि जिस 5 एकड़ जमीन को करीब 5.5 करोड़ में खरीदा गया था, उसकी आज की कीमत ₹55 करोड़ से ₹65 करोड़ के बीच पहुंच चुकी है। महज दो साल में करीब 11 गुना मुनाफा। इससे क्या हुआ? हुआ यह कि जिन 50 लाइक-माइंडेड अफसरों ने यहां जमीन खरीदी उन्होंने महज 2 साल में अपने इन्वेस्टमेंट पर 11 गुना का मुनाफा बना लिया।
ये सब पता कैसे चला?
सरकारी अधिकारियों, खासकर आईएएस, आईपीएस, आईआरएस जैसी अखिल भारतीय और केंद्रीय सेवाओं को हर साल अपनी अचल संपत्ति (जमीन, फ्लैट, मकान, प्लॉट आदि) की डीटेल सरकार को देनी होती है। इसी एनुअल डिक्लेरेशन को इम्मूवेबल प्रॉपर्टी रिटर्न - आईपीआर कहते हैं। इसी आईपीआर में एक कॉलम होता है - कैसे हासिल की? जिसमें बताना होता है कि उन्होंने यह संपत्ति कहां से प्राप्त की है। यहां अफसर बताते हैं कि संपत्ति- सेल्फ (स्वयं की) है या जॉइंटली हेल्ड विद अदर्स (दूसरों के साथ संयुक्त) है। यहीं पर वे अक्सर 'लाइक-माइंडेड ऑफिसर्स' या 'ग्रुप ऑफ ऑफिसर्स' जैसे टर्म का भी इस्तेमाल करते हैं। लाइक-माइंडेड ऑफिसर्स प्रॉपर्टी कोई कानूनी या संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और निवेश की दुनिया में इस्तेमाल होने वाला एक डिस्क्रिप्टिव टर्म है।
सरल शब्दों में जब कई अधिकारी (जो एक ही विभाग, एक ही बैच या एक ही रैंक के होते हैं) मिलकर एक समूह बनाते हैं और किसी संपत्ति में निवेश करते हैं तो उसे लाइक-माइंडेड ऑफिसर्स प्रॉपर्टी कहा जाता है। दैनिक भास्कर ने इसी आधार पर अपनी इन्वेस्टिगेशन की और पता किया लाइक-माइंडेड ऑफिसर्स के एक ग्रुप का। जांच में सामने आया कि इन 50 हिस्सों के पीछे असल में 41 बड़े खरीदार हैं। यह अपने आप में एक अनोखा मामला है जहां अलग-अलग राज्यों के कैडर के अफसर, जो शायद ही कभी एक साथ काम करते हों, एक ही गांव के एक ही खसरे पर जमीन खरीदने के लिए एकजुट हो गए। क्या यह सिर्फ एक इन्वेस्टमेंट था या उन्हें पहले से पता था कि भविष्य में यहां विकास की गंगा बहने वाली है? यह सवाल आज भोपाल के गलियारों में गूंज रहा है।
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हालांकि, भले ही जमीन आवासीय हो गई हो लेकिन अभी भी यहां कई कानूनी और तकनीकी पेच बाकी हैं। नियमानुसार, किसी भी आवासीय प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले वहां एक सोसायटी रजिस्टर्ड होनी चाहिए। फिलहाल गुराड़ी घाट की इस जमीन के लिए ऐसी कोई आधिकारिक सोसायटी कागजों पर नहीं दिखती। अगला कदम यह होगा कि इस जमीन को या तो किसी सोसायटी के नाम ट्रांसफर करना होगा या फिर इसे अलग-अलग प्लॉटों में काटकर आवंटित करना होगा। दैनिक भास्कर की इस पड़ताल ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, कानूनन कोई भी सरकारी अधिकारी संपत्ति खरीद सकता है, बशर्ते उसने इसकी जानकारी सरकार को दी हो लेकिन सवाल इनसाइडर ट्रेडिंग जैसी स्थिति का है।
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