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तेजस्वी यादव की कुर्सी पर खतरा! RJD विधायक फैसल रहमान के कदम से बढ़ी हलचल

बिहार की सियासत में आरजेडी विधायक फैसल रहमान की खूब चर्चा है। उनके कदम ने न केवल महागठबंधन, बल्कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को भी असहज कर दिया है।

Rahul Gandhi and Tejashwi Yadav

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव। (Photo Credit: PTI)

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संजय सिंह, पटना। बिहार की राजनीति में कभी-कभी एक छोटी सी चाल बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर देती है। इस बार यह काम किया है ढाका के विधायक फैसल रहमान ने। राज्यसभा चुनाव में वोटिंग से दूरी बनाकर उन्होंने ऐसा ‘साइलेंट बम’ फोड़ा है, जिसकी गूंज सीधे राजद के शीर्ष नेतृत्व तक सुनाई दे रही है। सबसे ज्यादा दबाव में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव हैं, जिनकी कुर्सी अब गणित और राजनीति के बीच फंस गई है।

 

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 क्या राजद सख्त कदम उठाएगी?

मामला सिर्फ एक वोट का नहीं है, बल्कि पूरे सत्ता संतुलन का है। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने रहने के लिए कम से कम 25 विधायकों का समर्थन जरूरी है। राजद किसी तरह इस जादुई आंकड़े पर टिका हुआ है। ऐसे में अगर फैसल रहमान के खिलाफ कार्रवाई होती है और उन्हें पार्टी से बाहर किया जाता है तो यह संख्या घट सकती है और इसी के साथ तेजस्वी की कुर्सी भी खिसक सकती है।

 

यही वजह है कि राजद इस समय ‘करें तो क्या करें’ की स्थिति में खड़ा है। बाहर से पार्टी एनडीए पर आरोपों की बौछार कर रही है, लेकिन अंदरखाने बेचैनी साफ महसूस की जा सकती है। सवाल यह है कि क्या पार्टी अनुशासन से समझौता कर लेगी या फिर जोखिम उठाकर सख्त कदम उठाएगी।

 फैसल रहमान को लेकर असमंजस में राजद 

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि फैसल रहमान का यह कदम महज संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति भी हो सकता है। इससे राजद की आंतरिक मजबूती पर सवाल उठने लगे हैं। अगर एक विधायक पार्टी लाइन से हट सकता है, तो क्या आगे और भी ऐसे उदाहरण सामने आ सकते हैं। यही डर राजद नेतृत्व को खामोश रहने पर मजबूर कर रहा है। 

 

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तेजस्वी यादव के सामने यह उनके राजनीतिक करियर की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक मानी जा रही है। एक तरफ पार्टी की साख और अनुशासन है तो दूसरी तरफ संवैधानिक पद और राजनीतिक ताकत। दोनों को साथ लेकर चलना आसान नहीं है।

 

सूत्र बताते हैं कि राजद के भीतर इस मुद्दे पर लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। हर पहलू पर विचार किया जा रहा है। लेकिन फिलहाल कोई भी फैसला लेना आग में हाथ डालने जैसा माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी साबित कर दिया है कि राजनीति में कभी-कभी एक चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है। राजद की मौजूदा चुप्पी उसकी सबसे बड़ी मजबूरी बन गई है।

 

अब सबकी नजरें तेजस्वी यादव पर टिकी हैं। क्या वे सख्ती दिखाएंगे या फिर कुर्सी बचाने के लिए रणनीतिक चुप्पी बनाए रखेंगे। जवाब जो भी हो, इतना तय है कि फैसल रहमान का एक कदम बिहार की राजनीति में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।


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