सुप्रीम कोर्ट ने एक 31 साल के युवक को इच्छा मृत्यु का अधिकार दिया है। युवक का नाम हरीश राणा है, करीब 12 से वह कोमा में हैं। साल 2013 में वह एक बिल्डिंग की चौथी मंजिल से गिर गए थे। उन्हें तब से लेकर अब तक लाइफ सपोर्ट पर रखा गया था। हरीश राणा के पिता ने सुप्रीम कोर्ट से इच्छा मृत्यु का अधिकार मांगा था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दे दी है।

इच्छा मृत्यु का अधिकार, आत्महत्या का अधिकार नहीं है। यह आमतौर पर उन मरीजों को दिया जाता है, जिन्हें जीवन निर्वाह के लिए लाइफ सपोर्ट और वेंटिलेटर पर रहना पड़ता है, जिन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया जाता है और जिनके बचने की कोई संभावना नहीं होती। यह पूरी प्रक्रिया मेडिकल सुपरविजन में होती है, सिर्फ लाइफ सपोर्ट हटाया जाता है।

यह देश में इच्छा मृत्यु को मंजूरी मिलने का पहला मामला है। देश में इच्छा मृत्यु पर बहस की शुरुआत पहली बार साल 2011 में हुई थी। अरुणा शानबाग केस ने देशभर में सुर्खियां बिटोरी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने तब इच्छा मृत्यु का अधिकार नहीं दिया था।

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किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया है?

साल 2018 में कमॉन केस जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि सम्मानजनक तरीके से मरने का भी अधिकार, मौलिक अधिकार है। भारत में इच्छा मृत्यु का अधिकार, लंबे समय तक बहस का विषय रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इसकी विधिक मंजूरी दी है। 

क्या है यह मामला?

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाया है। हरीश राणा के पिता ने अदालत में यह याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि उनके बेटे से सभी लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट हटाने की इजाजत दे दी जाए। हरीश राणा पिछले 13 साल से कोमा में हैं। उन्हें कभी होश नहीं आ सकता है। चार मंजिला बिल्डिंग से गिरने के बाद उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हुई थी। अब वह ब्रेन डेड स्थिति में थे।

बीते 13 साल से उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ था। वह सिर्फ क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन (CAN) पर जीवित हैं। उन्हें सर्जरी के जरिए फीड किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि CAN एक मेडिकल ट्रीटमेंट है, जिसे प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड के फैसले के आधार पर ही रोका जा जारी रखा जा सकता है।

बेंच ने कहा कि इलाज जारी रखने से केवल उनकी सांसे चल रहीं हैं, उनकी सेहत में कोई सुधार हीं देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता और दोनों मेडिकल बोर्ड्स की राय है कि CAN जारी रखना मरीज के हित में नहीं है।  कोर्ट ने इच्छा मृत्यु का अधिकार दे दिया है। 

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कॉमन कॉज बनाम भारत संघ का मामला क्या था?

साल 2005 में एक NGO कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्तियों को हमेशा के लिए दर्द से मुक्ति का अधिकार मिलना चाहिए। उन्हें मेडिकल ट्रीटमेंट रोकने और इच्छा मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए। तर्क दिया गया था कि 'गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार' और 'लिविंग विल' को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए।

9 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों के बेंच ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमापूर्ण जीवन' के अधिकार में 'गरिमापूर्ण मृत्यु' का अधिकार भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने 'पैसिव यूथेनेशिया' को वैध माना और व्यक्तियों को यह अधिकार दिया कि वे पहले से ही यह लिखित निर्देश दे सकते हैं कि अगर भविष्य में वे किसी लाइलाज बीमारी से जूझते हैं तो उन्हें लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए। साल 2018 के फैसले में कई आपत्तियां थीं। साल 2019 में 'इंडियन सोसाइटी फॉर क्रिटिकल केयर' ने इसमें सुधार की मांग की।  

साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु से जुड़े 2018 के दिशानिर्देशों में संशोधन किया और प्रक्रिया को ज्यादा सरल बनाया। अगर कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी से ग्रस्त है और रिकवरी की कोई उम्मीद नहीं है, तो सम्मानजनक और गरिमापूर्ण मृत्यु को मौलिक अधिकार मानते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी जा सकती है। 

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कोर्ट ने क्या दिशा-निर्देश दिए हैं?

AIIMS अपने केयर सेंटर में मरीज को भर्ती करे और घर से वहां शिफ्ट करने की सभी सुविधाएं दे। लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया एक तय प्लान के तहत हो, ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे। सभी हाई कोर्ट अपने ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट्स को निर्देश दें कि कॉमन कॉज गाइडलाइंस के अनुसार अस्पतालों से इजाजत लें। जब दोनों बोर्ड सर्वसम्मति से लाइफ सपोर्ट हटाने का फैसला करें, तभी इसकी इजाजत दी जाए।

केंद्र सरकार तय करे कि सभी जिलों के चीफ मेडिकल ऑफिसर, सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड के लिए रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स का पैनल तैयार रखें। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इच्छा मृत्यु पर व्यापक कानून लाने की भी सिफारिश की। यह पहला मामला है, जब कॉमन कॉज के दिशा निर्देशों को लागू किया जा रहा है। 

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अरुणा शानबाग केस क्या था?

अरुणा शानबाग रेप विक्टिम थीं, हमलावर ने उनका गला घोंटने की कोसिश किया था और बुरी तरह पीट दिया था। वह करीब 42 साल तक कोमा में रहीं, डॉक्टरों ने उन्हें पहले ही ब्रेन डेड घोषित कर दिया था। मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल में कई साल भर्ती रहीं। अरुणा शानबाग के साथ जब यह वारदात हुई तो उनकी उम्र 25 साल थी। 27 नवंबर 1973 को वह किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में थीं, जब अचानक एक वार्ड अटेंडेंट सोहनलाल ने उन पर हमला किया। हमलावर ने एक चेन से उनका गला घोंटा और रेप किया। 

उनके सिर में गंभीर चोट आई, ब्रेन डैमेज हो गया। उन्हें लकवा मार दिया और वह कोमा में चली गईं। इसके बाद वह कभी होश में नहीं आईं। उन्हें अस्पताल में नाक के जरिए ट्यूब से खाना दिया जाता था। साल 2011 में पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कोर्ट से बताया गया कि वह ब्रेने डेड हैं, अब उन्हें फीडिंग ट्यूब हटाने की इजाजत दी जाए। कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी थी लेकिन इससे इच्छा मृत्यु पर बहस छिड़ गई। 18 मई 2015 को अरुणा शानबाग की मौत न्यूमोनिया की वजह से हो गई थी। अरुणा शानबाग केस के बाद ही देश में इच्छा मृत्यु के लिए अदालती राह आसान हुई।