केरल में जाति प्रथा बहुत व्यापक रही है। इसी के चलते इस राज्य को कई आंदोलन देखने पड़े। इन आंदोलनों के नतीजे अच्छे साबित हुए और यह राज्य कई कुरीतियों को छोड़कर आगे बढ़ने में कामयाब हुआ। ऐसा ही एक चर्चित आंदोलन था- वायकॉम सत्याग्रह। एक ऐसा आंदोलन जिसके चलते केरल के मंदिरों में निचली जातियों के प्रवेश को अनुमति मिली और अछूत व्यवस्था के खिलाफ जोरदार आंदोलन हुआ। एक ऐसा आंदोलन जिसके चलते पेरियार जेल गए और महात्मा गांधी के विचारों से उनका टकराव हुआ। यह वही आंदोलन था जिसमें तमाम विरोधों के बावजूद श्री नारायण गुरु और महात्मा गांधी साथ आए।

 

त्रावणकोर के क्षेत्र में एक जगह थी वायकॉम। जैसा कि हमने आमुखम केरलम की एक किस्त में त्रावणकोर का इतिहास पढ़ा कि कैसे वहां के राजाओं ने पूरे क्षेत्र को एकजुट किया और एक सशक्त साम्राज्य बनाया। धर्म को बेहद कट्टरता से मानने वाला त्रावणकोर धर्म से जुड़े नियमों को इतनी सख्ती से लागू करता था कि रूढ़िवाद और धर्म के बीच की लाइन मिट सी जाती थी। इस बारे में एंथ्रोपोलॉजिस्ट ए अय्यपन अपनी किताब 'सोशल रिवॉल्यूशन इन अ केरल विलेज: अ स्टडी इन कल्चर (1965)' में लिखते हैं कि उस वक्त केरल के दलितों के मंदिर में घुसने की मनाही थी। इतना ही नहीं, मंदिरों की आसपास की सड़कों पर उनका चलना भी वर्जित था।

 

अंग्रेजों के आने के बाद कई बार ऐसी रूढ़ियों का विरोध हुआ और कई सामाजिक आंदोलन हुए। ईसाई मिशनरियों ने इसका फायदा उठाया और निचली जातियों के बहुत लोगों को ईसाई बनाने में कामयाबी भी पाई। इसके अलावा तिरुनाल राम वर्मा के राज में यानी 1860 से 1880 के बीच में शिक्षा का विस्तार हुआ जिसके चलते लोगों में वह चेतना पैदा हुई कि वे रूढ़ियों की चुनौती देने लगे थे। 20वीं सदी आते-आते ऐसे विचारों को बल मिलने लगा। 1860 से 1940 के बीच त्रावणकोर में कई मंदिर प्रवेश आंदोलन भी हुए यानी माहौल तैयार होने लगा था।

 

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समय के साथ केरल के एझावा जाति के लोग पढ़े-लिखे निकलने लगे। मौजूदा वक्त में पिछड़े वर्ग में आने वाले एझावा भले ही काफी पढ़े-लिखे निकल रहे थे लेकिन सवर्ण हिंदूओं के लिए ही सरकारी नौकरियां आरक्षित थीं। 1918 की बात है कि संख्या के हिसाब से सवर्ण हिंदू बेहद कम थे लेकिन राज्य के राजस्व विभाग की 4000 में से 3800 नौकरियां उनके ही पास थीं। इसका मतलब था कि शिक्षा के बावजूद सामाजिक स्तर पर सुधार नहीं हो रहा था और पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ने का मौका नहीं  मिल रहा था।

भेदभाव करते थे सवर्ण हिंदू

 

इसके बावजूद कुछ एझावा आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे लेकिन सवर्ण हिंदूओं की ओर से उन्हें अपमानित होना पड़ता था। ऐसा ही एक उदाहरण है अलूमतिल चन्नार (जाति से एझावा) और कुछ लोगों ने एक कार खरीदी। इसके बावजूद ऐसा था कि जिन रास्तों से किसी एझावा को जाने की अनुमति नहीं थी वहां से चन्नार को अपनी कार से उतरकर पैदल जाना पड़ता था।

 

ऐसी ही तमाम घटनाएं हर दिन अपमान का कारण बनती थीं। ऐसे अपमान से आहत एझावा नेता टी के माधवन ने सबसे पहले मंदिर प्रवेश का मुद्दा 1917 में उठाया। उन्होंने 'देशाभिमानी' नाम के अपने अखबार में इस पर संपादकीय लिखे। वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित थे और समय के साथ वह प्रत्यक्ष विरोध में भरोसा रखने लगे। साल 1920 में टी के माधवन ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरे केरल को आंदोलित कर दिया। वायकॉम मंदिर के पास से गुजरने वाली जिस सड़क पर एझावा लोगों का जाना मना था और एक बोर्ड पर यही संदेश लिखा था, टी के माधवन ने उस बोर्ड को पार कर दिया।

 

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भले ही एझावा लोगों ने इस आंदोलन को और हवा दी लेकिन सवर्ण हिंदुओं ने पूरे त्रावणकोर में इस आंदोलन का विरोध किया और आंदोलन नहीं फैल पाया। उस समय के महाराजा भी सवर्णों से डरे हुए थे तो कोई भी शख्स पिछड़ी जातियों की मदद नहीं कर पाया। नतीजतन टी के माधवन महात्मा गांधी से मिलने गए और उनसे अपने इस 'मंदिर प्रवेश आंदोलन' के लिए समर्थन मांगा। साल 1923 में कांग्रेस के अधिवेशन में केरल कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया कि वह अछूत प्रथा के विरोध में आवाज उठाएगी। इसके बाद जनता में भी हिम्मत आई और अब आवाज बुलंद होने लगी। मांग उठी कि सभी हिंदू मंदिरों को सभी के लिए खोला जाए और सड़कों पर सभी जातियों के लोगों को चलने दिया जाए।

 

अब बारी थी इस आवाज को जमीन पर उतारने की। जगह चुनी कई वायकॉम मंदिर। वह मंदिर जिसमें भगवान शिव विराजमान थे। टी के माधवन और अन्य नेताओं ने फैसला लिया कि सबसे पहले मंदिर की बजाय उसके आसपास की चार सड़कों को सभी जातियों के लिए खोला जाए। 

लगभग दो साल चला आंदोलन

 

30 मार्च 1924 की सुबह तीन लोग खादी वस्त्र पहनकर तैयार हुए। तीनों में एक शख्स नायर, एक एझावा और एक पुलायु जाति से था। फूल-माला से लदे इन तीनों लोगों के पीछे हजारों लोगों की भीड़ खड़ी थी और सामने थी वह सड़क जिस पर जाने के लिए उनके पांव तरस चुके थे। 

 

हालांकि, उस वक्त की सरकार इसके खिलाफ थी। सड़क पर चलने भर की कोशिश कर रहे लोगों को रोका गया और गिरफ्तार कर लिया गया। अगले दिन फिर तीन लोगों ने ऐसी ही कोशिश की। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। 10 अप्रैल तक हर दिन ऐसे ही तीन-तीन लोग गिरफ्तार होते रहे और आखिर में पुलिस भी तंग आ गई। पुलिस ने लोगों को गिरफ्तार करना बंद करके पूरी इलाके में बैरिकेडिंग कर दी।

 

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अप्रैल की तपती गर्मी में ही ये लोग बैरिकेडिंग के सामने बैठ गए। अप्रैल से सितंबर का महीना आ गया और बैरिकेडिंग के सामने इन लोगों का धरना चलता रहा। लोग भूख हड़ताल करते रहे और देशभक्ति गीत जाते रहे। आंदोलन की शुरुआत में ही 4 अप्रैल 1924 को के एन नंबूदरीबपाद ने ई वी रामास्वामी पेरियार को एक तार भेजा और उनसे अनुरोध किया कि वह तुरंत इस आंदोलन में आएं। दो दिन बाद ऐसा ही एक अनुरोध जॉर्ज जोसेफ ने भी पेरियार से किया। हालांकि, जॉर्ज खुद गिरफ्तार हो गए। इस स्थिति में पेरियर 13 अप्रैल को वहां पहुंचे।

 

इसी आंदोलन को लेकर पेरियार 74 दिन तक जेल में रहे और आंदोलन को उन्होंने अपने कुल 141 दिन दिए। वहां पहुंचने के बाद इस आंदोलन की कमान पेरियार ने अपने ही हाथ में ले ली थी। पेरियार को बुलाने की वजह यह थी कि वह तमिलनाडु में अछूत प्रथा के खिलाफ ऐसे आंदोलन पहले भी कर चुके थे। पेरियार आए तो उनका स्वागत त्रावणकोर के राजपरिवार ने किया क्योंकि वह पेरियार को पहले से जानते थे। हालांकि, जब पेरियार आंदोलनकारियों के बीच पहुंच गए और हर दिन भाषण देने लगे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वह जेल गए तो उनकी पत्नी नागम्माल और उनकी बहन एस आर कन्नमाल सक्रिय हो गईं।

उस समय बाकी धर्मों से जुड़े संगठन भी इस आंदोलन के समर्थन में आ गए थे। तब अकाली दल के नेताओं ने वहां लंगर लगाए। पेरियार ने खुद लिखा था कि पंजाब के स्वामी श्रद्धानंद ने 30 स्वंयसेवक और पैसे भेजे ताकि सत्याग्रहियों के लिए भोजन की कमी न हो।

 

कहा जाता है कि जब यह बात महात्मा गांधी तक पहुंचे तो उन्होंने इसे हिंदूओं की समस्या बताया और अपील की कि बाकी धर्मों के लोग इस आंदोलन से दूर हो जाएंगे। उन्होंने पेरियार को बुलाने वाले जोसेफ जॉर्ज तक से यह कह दिया कि वह हिंदुओं को अपना काम करने दें। महात्मा गांधी ने कहा कि ईसाई, मुस्लिम और  सिख इस आंदोलन से अलग हो जाएं।

 

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दूसरी तरफ, इस आंदोलन के खिलाफ भी आंदोलन शुरू हो गया और कई बार हिंसा की कोशिश भी की। एम पद्मनाभ पिल्लई की अगुवाई में नवंबर 1924 में सवर्ण हिंदुओं ने एक आंदोलन किया। इसे 'सवर्ण जत्था' कहा गया। ये लोग वायकॉम से त्रिवेंद्रम तक 200 किलोमीटर पैदल चलकर रानी से मिलने गए और अपील की कि मंदिर के आसपास के रास्तों को सभी के लिए खोलो जाए। एक और जत्था एम एंपरुमल नायडू की अगुवाई में दक्षिण त्रावणकोर से त्रिवेंद्रम तक पहुंचा। दोनों जत्थों ने रानी के सामने अपनी मांग रखी। रानी ने कहा कि त्रावणकोर की विधानसभा की अगली मीटिंग पर इस पर बात की जाएगी।

 

जब विधानसभा में एन कुमारन ने यह प्रस्ताव रखा तो यह प्रस्ताव 21 के मुकाबले 22 वोट से हार गया। यानी प्रस्ताव के समर्थन में 21 ही वोट थे लेकिन विरोध में 22 वोट पड़ गए। रोचक है कि डॉ. पल्पू के भाई पी परमेश्वरन जो खुद एझावा थे उन्होंने ही प्रस्ताव का विरोध कर दिया।

महात्मा गांधी की एंट्री और पेरियार से टकराव

 

इसके बाद महात्मा गांधी वायकॉम आए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों, रानी और श्री नारायण गुरु से मुलाकात की। महात्मा गांधी ने भी रानी से बात की लेकिन बात नहीं बनी। आखिर में महात्मा गांधी ने त्रावणकोर पुलिस के कमिश्नर W H पिट से बात की और एक समझौता कर लिया। यह समझौता यह था कि अगर प्रदर्शनकारी अपनी ही जगह पर रहें तो वह बैरिकेडिंग हटा ली। धीरे-धीरे चार में से तीन सड़कों पर से प्रतिबंध भी हटा लिया। हालांकि, इसमें एक बारीक शर्त थी कि रास्ते को दो हिस्से कर दिए गए और मंदिर की ओर वाले हिस्से पर अब भी निचली जातियों के लोगों के जाने की अनुमति नहीं थी।

 

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इन समझौतों से बहुत लोग सहमत नहीं थे। हालांकि, सरकारी आदेश को समझने में लोगों से गलती हुई और उन्हें लगा कि सारी सड़कों को सबके लिए खोल दिया गया। 23 नवंबर 1925 को आखिरी सत्याग्रही को भी धरना स्थल से वापस बुला लिया गया यानी 20 मार्च 1924 से शुरू हुआ आंदोलन नवंबर 1925 में खत्म हो गया। मांगें पूरी नहीं होते देख लोगों में नाराजगी फैल गई। इतना ही नहीं, पेरियार तक इस मामले पर महात्मा गांधी पर भड़क गए थे। महात्मा गांधी इसे 'हिंदू समस्या' मानते थे लेकिन पेरियार इसे 'इंसानी समस्या' मानते थे।

 

आखिरकार नवंबर 1936 में त्रावणकोर के महाराजा ने सभी जातियों के लोगों को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दे दी। भले ही वायकॉम सत्याग्रह शुरू में असफल लगा था लेकिन आखिर में इसी के चलते अछूत व्यवस्था खत्म हुई और कथित रूप से निचली मानी जाने वाली जातियों के लोगों को बराबरी का हक मिल सका। इसी के बाद कई अन्य जगहों पर इस तरह के आंदोलन हुए और वायकॉम सत्याग्रह अछूत व्यवस्था के विरोध की नींव साबित हुआ।