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जिस राजा ने स्वागत किया उसी से क्यों लड़ गया था वास्कोडिगामा? रोचक है कहानी

वास्कोडिगामा का नाम इतिहास में एक ऐसे शख्स के रूप में रही है जिसने भारत तक पहुंचने के लिए समुद्री रास्ते की खोज की।

vasco da gama vs zamorin

जमोरिन से हुई थी वास्कोडिगामा की लड़ाई, Photo Credit: Sora AI

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आमुखम केरलम की पहली किस्त में हमने जिक्र किया था कि केरल में वास्कोडिगामा के पैर पड़ना भारत की तकदीर बदलने जैसी घटना थी। पुर्तगाली कैप्टन अपने जहाज को लेकर एक अंजाने सफर पर निकला तो शायद उसे भी अंदाजा नहीं था कि पूरे एशिया के साथ-साथ यूरोप के देशों की किस्मत लिखी जाने वाली है। मौजूदा कोझिकोड के कप्पड़ में 20 मई 1498 को वास्कोडिगामा का जहाज किनारे लगा और लंगर डाल दिए गए। जैसे लंगर समुद्र में धंसे, वैसे ही यह नाम इतिहास में दर्ज हो गया। एक ऐसे पुर्तगाली शख्स के रूप में जिसने भारत खोज निकाला। कहा जाता है कि तब पुर्तगाल के राजा डॉम मैनुअल ने वास्कोडिगामा को भेजा था।

 

उस वक्त कालीकट (अब कोझिकोड) के राजा हुआ करते थे जमोरिन। जमोरिन ने वास्कोडिगामा का जोरदार स्वागत तो किया लेकिन इस पुर्तगाली के तोहफे जमोरिन को पसंद नहीं पाए। दूसरे तरफ पहले से केरल में कारोबार कर रहे अरब कारोबारियों ने एक और कारोबारी की एंट्री का विरोध किया। फिर भी जमोरिन ने वास्कोडिगामा को अनुमति दे दी कि वह अब कालीकट में व्यापार कर सकते थे। पुर्तगालियों ने सामान तो ले लिए लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे।

 

मामला बढ़ गया तो कालीकट के अधिकारियों ने कुछ समय के लिए पुर्तगाली लोगों को पकड़ लिया। ऐसे जैसे गिरवा रखा हो। बदले में वास्कोडिगामा ने भी 16 मछुवारों को पकड़ लिया। बाद में जैसे-तैसे मामला शांत हुआ तो वास्कोडिगामा कन्नूर पहुंचा। वहां के राजा कोलातिरी ने भी वास्कोडिगामा को परमिशन दे दी थी।

 

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उस वक्त तक मिस्र और अरब के देशों से आए तमाम मुस्लिम कारोबारी भी कालीकट में बसे हुए थे। अरब के कारोबारियों ने अच्छा-खासा व्यापार सेट कर लिया था और जमोरिन से उनके अच्छे संबंध थे और कालीकट में उनका प्रभाव भी अच्छा खासा था। यही वजह थी कि अपने पहले दौरे में वास्कोडिगामा कालीकट में अपना कारोबार स्थापित नहीं कर पाया था। वास्कोडिगामा समेत तमाम पुर्तगाली कारोबारी चाहते थे कि पूरी तरह से सिर्फ उनका कंट्रोल हो जाए। इसी के चलते बार-बार जमोरिन से पुर्तगालियों का टकराव हो रहा था।

 

नतीजतन वास्कोडिगामा को अपना पहला दौरा 1499 में खत्म करके लौटना ही पड़ा। बिना पूरा कंट्रोल हासिल किए ही वास्कोडिगामा ने अच्छी-खासी कमाई की थी। यही कारण था कि कुछ साल में वास्कोडिगामा फिर से लौटा। अगली बार जब वह लौटा तो ज्यादा तैयारी के साथ लौटा।

वास्कोडिगामा की दूसरी यात्रा और टकराव

 

पुर्तगालियों से टकराव का एक बड़ा कारण अरब के कारोबारी थे। भारत से लौटे वास्कोडिगामा का पूरा ध्यान इसी पर था कि कैसे अरबी कारोबारियों को कालीकट से बाहर किया जाए। तीन साल तक उसने तैयारी की और तमाम सूत्रों के जरिए अरबियों के बारे में बहुत सारी बातें पता लगाईं। वास्कोडिगामा की बताई बातों के आधार पर पुर्तगाल के राजा मैनुएल ने साल 1500 में पेड्रो अल्वारेज कैबरल की अगुवाई में एक और मिशन भेजा लेकिन जमोरिन ने फिर से उसकी मांग खारिज कर दी। गुस्से में तमतमाए पेड्रो ने अरबी कारोबारियों के एक जहाज पर ही कब्जा कर लिया। बात और बिगड़ने लगी। 

 

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कालीकट में मौजूद अरबी कारोबारियों और पुर्तगालियों के टकराव में जमोरिन ने अरबी कारोबारियों की मदद की। 50 से ज्यादा पुर्तगाली कालीकट में मारे गए, पुर्तगालियों की फैक्ट्रियों पर हमला किया गया। पेड्रो ने पलटवार किया और पूरे कालीकट में बमबारी कर दी। जब पेड्रो को यहां दाल गलती नहीं दिखी और उसे पता चला कि कोचीन के राजा जमोरिन से नाराज हैं तो वह उनका साथ पाने के लिए चला गया। कुछ साल और चला लेकिन पुर्तगालियों को कोई खास कामयाबी नहीं मिल रही थी। पुर्तगाल की ओर से बेहद शानदार कमांडर जाओ डा नोवा को भेजा गया लेकिन उसे भी कामयाबी नहीं मिली। आखिर में पुर्तगाल के राजा मैनुएल ने एक बार फिर से वास्कोडिगामा को भेजने का फैसला लिया।

 

साल 1502 में आया वास्कोडिगामा इस बार ज्यादा तैयारी से आया। 20 जहाज में भारी भरकम हथियार और 800 से ज्यादा आदमी लेकर आए वास्कोडिगामा ने रास्ते भर तहलका मचाया। कालीकट में पुर्तगालियों पर हुए हमलों का बदला लेने के लिए वास्कोडिगामा ने रास्ते में मिले अरबी जहाजों पर या तो कब्जा कर लिया या उन पर हमला करके जहाज ही डुबा दिया। 

शांति की कोशिश नाकाम

 

अब वास्कोडिगामा की बढ़ी ताकत देखकर जमोरिन के भी हौसले पस्त हो गए और उसने कहा कि अब वह पुरानी बातें भुलाकर नई शुरुआत के लिए तैयार है। हालांकि, वास्कोडिगामा इतने से मानने वाला नहीं था। उसने शर्त रखी कि सभी अरबी कारोबारियों को कालीकट से बाहर किया जाए। जाहिर था कि जमोरिन ने इससे इनकार कर दिया। उसी समय जमोरिन ने कोचीन के राजा को कहा कि वह पुर्तगालियों का साथ न दें। कोचीन के राजा ने यही बात वास्कोडिगामा को बता दे। बात फिर बिगड़ गई।

 

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वास्कोडिगामा फिर भड़का और इस बार उसने पूरे कालीकाट पर बमबारी कर दी और वहां से कोचीन चला गया। वहां कोचीन के राजा से मिला और वहां कारोबारी समझौता कर लिया। कोचीन के राजा की अनुमति पर कोल्लम के शासक ने वास्कोडिगामा के साथ मसालों का व्यापार शुरू कर दिया। अब जमोरिन ने भी पुर्तगालियों को खदेड़ने का पूरा मन बना लिया था। अरब की नेवी की मदद से जमोरिन ने बड़ा बेड़ा तैयार किया। ख्वाजा कासीन और ख्वाजा अंबर नाम के दो अरबी कमांडरों को बुलाया। हालांकि, ख्वाजा कासीन को पुर्तगालियों ने पकड़ लिया और जमोरिन को मुंह की खानी पड़ी।

 

अब वास्कोडिगामा का काम कोचीन में स्थिर हो चुका था। उसने कोचीन की रक्षा का जिम्मा विसेंट सोडर को दिया और लौट पड़ा। यहां से लौटते समय रास्ते में फिर जमोरिन की सेना था। हालांकि, वास्कोडिगामा जैसे-तैसे करके निकल गया और उसे कोई नुकसान नहीं हुआ। फिर जमोरिन ने एक बड़ी सेना कोचीन भेजी। इस सेना ने वहां भयंकर तबाही मचाई और कोचीन साम्राज्य के उत्तराधिकारी नारायण को मार डाला। इसके बावजूद कोचीन के राजा ने उन पुर्तगालियों को जमोरिन के हवाले नहीं किया जो उनके संरक्षण में थे।

 

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दूसरी तरफ पुर्तगालियों से लड़ते-लड़ते जमोरिन का हाल बुरा हो गया था। मार्च 1504 में जमोरिन ने 50 हजार सैनिकों को कोचीन पर कब्जा करने के लिए भेजा। हालांकि, सिर्फ 100 पुर्तगालियों और कुछ स्थानीय लोगों ने इस हमले को रोक दिया। वहीं, पुर्तगालियों ने फिर से कालीकट पर बमबारी कर दी। कुछ और साल तक यह टकराव चलता रहा। साल 1509 में पुर्तगालियों ने मिस्र के सुल्तान, गुजरात सल्तनत और जमोरिन की संयुक्त सेना को हरा दिया।

 

इन टकरावों को बाद तीसरी बार वास्कोडिगामा साल 1524 में लौटा। इस बार वायसराय बनकर आए वास्कोडिगामा की 24 दिसंबर 1524 को केरल में ही मौत हो गई। कोचीन के सेंट फ्रांसिस चर्च में उसे दफनाया गया और साल 1539 में उसकी अस्थियां पुर्तगाल ले जाई गईं। 


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