दुनिया के तमाम देशों को भारत का रास्ता दिखाने वाले पुर्तगाली कारोबारी वास्कोडिगामा ने साल 1498 में भारत में कदम रखे। जगह थी कालीकट, जिसे आज कोझिकोड के नाम से जाना जाता है और यह केरल का हिस्सा है। यह घटना भारत का इतिहास बदलने वाली थी और वही हुआ। अंग्रेजों का पहला लालच केरल के मसालों को लेकर हुआ। अंग्रेजों को इसमें पैसा दिखा और भारत की तबाही की योजना तैयार हुई। हालांकि, केरल की कहानी किसी वास्कोडिगामा, सेंट थॉमस या फिर मसालों से कहीं बड़ी है। देश में सबसे ज्यादा शिक्षित आबादी वाला यह राज्य अपने मसालों, अपनी प्राकृतिक विविधता और तमाम धर्मों के खूबसूरत संगम की वजह से ही 'Gods Own Country' यानी 'ईश्वर का देश' कहा जाता है।
समुद्र के किनारे बसे इस प्रदेश में कभी सेंट थॉमस ने ईसाई धर्म का विस्तार किया तो कभी केरल में ही जन्मे आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का सिद्धांत पूरे देश में फैलाया। इसी केरल में देश की सबसे पुरानी मस्जिद बनी और यहूदियों ने भी केरल की धरती चूमी। आज इसी केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर, सबरीमला मंदिर और गुरुवयूर मंदिर हिंदुओं की आस्था के सबसे बड़े केंद्र हैं।
देश के पश्चिमी घाट पर बसा यह प्रदेश अपनी खूबसूरत वादियों, सुंदर समुद्र तटों, पहाड़ी इलाकों और शानदार मौसम के लिए मशहूर है। बैकवॉटर पर बसी पूरी अर्थव्यवस्था, स्थानीय कला और संस्कृति के साथ-साथ यहां के अनोखे मौसम में पैदा होने वाले मसाले पूरी दुनिया में केरल और भारत की खुशबू बिखेरते हैं।
केरल को समझिए
केरल में मौजूद एडक्कल की गुफाएं सबूत देती हैं कि कम से कम 5 हजार साल पुरानी चीजें तो आज भी यहां मौजूद हैं। पुराणों में मौजूद जिक्र बताते हैं कि केरल का संबंध विष्णु के अवतार परशुराम, महाबली और परई पेट्टा पंतीरुकुलम से है। हालांकि, ऐतिहासिक तथ्य लिखित रूप में मौजूद नहीं हैं। लोक कथाओं के मुताबिक, एक कहानी यह है कि राजा महाबली पर भगवान विष्णु के अवतार वामन की जीत के बाद केरल बना। दूसरी कहानी यह है कि भगवान परशुराम ने जब समुद्र को जीत लिया तो अपना फरसा फेंककर पहाड़ों को चीर दिया और केरल का निर्माण हुआ। अब इस कहानी का कोई साक्ष्य तो है नहीं तो इसे लोक कथाओं में ही गिना जाता है।इतना जरूर है कि केरल का सबसे मशहूर त्योहार ओणम जब मनाया जाता है तो भगवान विष्णु के इसी 'वामनावतार' की ही पूजा की जाती है।
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आगे चलकर साल 52 यानी आज से लगभग एक हजार 9 सौ साल से भी ज्यादा साल और वास्कोडिगामा के केरल आने से ठीक 1446 साल पहले सेंट थॉमस के केरल आने की बात कही जाती है। मामला कुछ-कुछ लोक कथाओं वाला ही है क्योंकि यह स्पष्ट तौर पर साबित नहीं होता कि सेंट थॉमस कहां से और कैसे आए। माना जाता है कि वह समुद्री मार्ग से आए और यरुशलम जैसे किसी क्षेत्र से आए थे। इसके ठीक 16 साल बाद यानी 68 ईसवी में यहूदी भी केरल आकर बसते हैं। इन यहूदियों के बारे में भी यही कहा जाता है कि वे भी संभवत: यरुशलम से आए थे। माना जाता है कि साल 788 में ही आदि शंकराचार्य का जन्म केरल के एर्नाकुलम जिले के एक गांव में हुआ था। आगे चलकर 1292 में मार्कोपोलो, 1498 में वास्कोडिगामा जैसे विदेशी कारोबारी भारत आते हैं।
केरल पर राज करने वाले चेर साम्राज्य का समय चौथी शताब्दी ईसी पूर्व से 5वीं शताब्दी ईसवी और फिर 8वीं शताब्दी ईसवी से 12शताब्दी ईसवी तक चलता है। चेर के अलावा चोल और पांड्य राजाओं ने भी प्राचीन केरल पर शासन किया। हालांकि, किसी भी एक राजा ने पूरे केरल पर राज्य नहीं किया। कुछ हिस्से पर चेर लंबे समय तक प्रभावी रहे तो बाद में जब चोल के हाथ में सत्ता आई तो उनके हाथ में भी केरल के कुछ हिस्से ही रहे। तब मुख्य रूप से केरल के अलावा तमिनलाडु के कुछ हिस्सों पर भी इन राजाओं का शासन होता था।
चोल साम्राज्य और केरल
केरल और तमिलनाडु के एक बड़े हिस्से पर चोल साम्राज्य का राज रहा। मूल रूप से ये तमिल राजा थे। कावेरी नदी की घाटी में फलने-फूलने वाला यह साम्राज्य सिर्फ इस नदी के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था। 9वीं शताब्दी के आसपास शुरू होकर 13वीं शताब्दी तक चलने वाले इस साम्राज्य में बड़े क्षेत्र में अपना विस्तार किया। राजराजा चोल प्रथम और उनके वंशजों ने इस क्षेत्र को आर्थिक, सांस्कृतिक और सैन्य रूप से इस क्षेत्र को बेहद समृद्ध किया और कई देशों में संबंध स्थापित किए। राजेंद्र चोल प्रथम एक ऐसे राजा हुए जो आज भी तमिलनाडु और केरल के इतिहास में अमर हैं।
केरल में रहे राजाओं को आप आसानी से ऐसे समझिए कि जो दक्षिम केरल यानी तिरुवनंतपुरम का हिस्सा है वह त्रावणकोर साम्राज्य के अंतर्गत आता था। उत्तरी हिस्से पर चेर साम्राज्य का शासन रहा। तमिलनाडु से लगने वाले क्षेत्रों पर पांड्य साम्राज्य का शासन रहा।
अंग्रेजों के जमाने का केरल
हमने शुरुआत में जिक्र किया था कि केरल में वास्कोडिगामा के पैर पड़ना भारत की तकदीर बदलने जैसी घटना थी। पुर्तगाली कैप्टन अपने जहाज को लेकर एक अंजाने सफर पर निकला तो शायद उसे भी अंदाजा नहीं था कि पूरे एशिया के साथ-साथ यूरोप के देशों की किस्मत लिखी जाने वाली है। वास्कोडिगामा के आते ही कालीकट के राजा जमोरिन ने उसका स्वागत किया लेकिन इन्हीं जमोरिन से उसका टकराव हुआ। बाद में वास्कोडिगामा ने कोचीन के साथ कारोबार शुरू किया और यहां से मसाले यूरोप के देशों तक पहुंचने लगे।
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पुर्तगालियों ने जमोरिन के दुश्मनों से हाथ मिलाया और फूट डालो राज करो वाली नीति पर काम किया। इसी के चलते मैसूर के सुल्तान ने केरल पर कब्जा कर लिया। पुर्तगालियों के चलते ही भारत में पपीता, काजू, संतरा जैसी कई फसलें आईं। अंग्रेजों की वजह से ही केरल में चर्च बने और इन्हीं की नकल करके ऐसे घर बनने शुरू हुए जिनकी स्थापत्य कला यूरोप से प्रभावित होती थी। कोचीन में मैनुअल फोर्ट साल 1503 में बना और केरल के लोगों ने आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल सीखा।
यहां जब हम अंग्रेजों की बात कर रहे हैं तो उन्हें पुर्तगाली समझिए। पुर्तगालियों ने ही कालीकट, कोचीन, चलियम जैसे नए शहर विकसित किए और कोल्लम, कोडुंगलूर जैसे पुराने शहरों को और सुविधा संपन्न बनाया। आगे चलकर डच और ब्रिटिश लोगों के आने के चलते पुर्तगाली कमजोर हो गए। हालांकि, सबसे पहले भारत आए पुर्तगाली ही सबसे आखिर में भारत से साल 1951 में गए जब भारत सरकार ने गोवा और दमन-दीव को उनके कब्जे से लेकर अपने में शामिल किया।
केरल और आंदोलन
पूर्व में कई धर्मों, कारोबारियों और विचारों का स्वागत कर चुके केरल में तमाम कुरीतियां भी फैली हुई थीं। इन कुरीतियों के खिलाफ समय-समय पर कई आंदोलन या यूं कहे कि पुनर्जागरण हुए। ऐसा ही एक है नारायण गुरु की अगुवाई में हुआ आंदोलन। ब्राह्मणवादी जातिवादी व्यवस्था को चुनौती देते हुए नाराण गुरु ने 1888 में अरुविप्पुरम में शिव लिंग स्थापित करके कहा था, 'मैंने अपने शिव को स्थापित किया है, ब्राह्मण शिव को नहीं।' नारायण गुरु खुद एझावा समुदाय से आते थे, जो पिछड़ी जातियों में गिनी जाती है। मौजूदा वक्त में केरल में एझावा जातियों का सबसे मजबूत संगठन श्री नारायण धर्म प्रतिपालन योगम (SNDP) नारायण गुरु ने ही शुरू किया है।
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नारायण गुरु के अलावा सहोदरन अय्यप्पन, मन्नतु प्द्मनाभन, के केलप्पन, अय्यनकाली, डॉ. पालपू, चट्टांबी स्वामिकाल, अब्दुल खादर मौलवी, सी कृष्णन जैसी शख्सियतों ने केरल में समाज सुधार के तमाम काम किए। इनमें वायकॉम सत्याग्रह, केरल का नमक सत्याग्रह, गुरुवयूर सत्याग्रह आदि प्रमुख हैं।
कैसे बना केरल राज्य?
मौजूदा स्थिति में आपको दिखने वाला केरल साल 1 नवंबर 1956 को भारत का राज्य बना। भारत के आजाद होने और केरल के नया राज्य बनने के बीच यानी कि 1947 से 1956 तक केरल अलग-अलग तरह के प्रशासन में रहा। मौजूदा वक्त में दिखने वाला केरल अंग्रेजों के जमाने में तीन अलग क्षेत्रों मालाबार, त्रावणकोर और कोचीन में बंटा हुआ था। त्रावणकोर अब का तिरुवनंतपुरम है, कोचीन अब का कोच्चि है और मालाबार में मध्य केरल के ज्यादातर तटीय जिले आते हैं।
सबसे पहले तो त्रावणकोर और कोचीन को एक करके 1 जुलाई 1949 को त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया था। उस वक्त त्रावणकोर के महाराज चितिरा तिरुनाल बाल राम वर्मा को इस राज्य का राजप्रमुख बनाया गया।
त्रावणकोर के साथ-साथ कोचीन के राजा से भी राय ली गई थी। उस वक्त राम वर्मा परीक्षित कोचीन के राजा थे। उनसे बातचीत करने के लिए भारत सरकार की ओर से वी पी मेनन कई बार गए। आखिर में सरदार वल्लभ भाई पटेल भी उनसे मिलने गए। सरदार पटेल ने त्रावणकोर के राजा बाल राम वर्मा को राजप्रमुख बनाने के साथ-साथ राम वर्मा परीक्षित को उप राज प्रमुख बनाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, राम वर्मा परीक्षित ने इसे स्वीकार न करते हुए सिर्फ इतना कहा कि कोच्चि के राज परिवार के सबसे वरिष्ठ शख्स वलिया थंपुरन कहा जाए।
आखिर में बात बन गई और 1 जुलाई 1949 को इस समझौते पर राम वर्मा परीक्षित और बाल राम वर्मा के दस्तखत हुए। तब टी के नारायण पिल्लई को त्रावणकोर-कोच्चि राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। एक और रोचक देखने को मिली देश की कई रियासतें राजशाही छोड़ने के लिए तमाम शर्तें रख रही थीं लेकिन कोचीन के राजा ने बिना शर्त इसे स्वीकार कर लिया। उन्होंने पंचांग की एक प्रति भर मांगी थी।
साल 1956 में जब केरल राज्य बना तो त्रावणकोर-कोचीन को मालाबार और कासरगोड के साथ मिलाकर नया राज्य बनाया गया। उससे पहले मालाबार मद्रास (अब तमिलनाडु) राज्य का हिस्सा था और कासरगोड कर्नाटक के दक्षिण कन्नड जिले का एक तालुका था। इसी अदला-बदली में त्रावणकोर-कोचीन के कुछ हिस्से मद्रास यानी तमिलनाडु के हिस्से में भी गए।
आज की तारीख में केरल में कुल 14 जिले हैं। त्रावणकोर वाले इलाके को दक्षिण केरल, कोचिन वाले इलाके को सेंट्रल केरल और मालाबार वाले इलाके को उत्तरी केरल कहा जाता है।
तमाम जाति, धर्मों और संस्कृतियों को समेटे दिखने वाला केरल अपनी प्राकृतिक छटा, अपने कारोबारी ईकोसिस्टम और पढ़ाई-लिखाई वाले माहौल के लिए विश्व विख्यात है। मसालों से लेकर नारियल जैसी फसलों के दम पर कई उद्योग चलाने वाला केरल कई मामलों में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है।
केरल के इतिहास, भूगोल, समाज और राजनीति से जुड़ी तमाम बातें आपको इसी ‘आमुखम केरलम’ सीराज में आगे पढ़ने को मिलेंगी।
