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एझावा, नायर और मुस्लिम..., केरल में जाति और धर्म की राजनीति का समीकरण क्या है?

केरल में दो प्रमुख जातियां ऐसी हैं जो चुनाव की दिशा और दशा बदलने का माद्दा रखती हैं। बीते कुछ साल में सभी दल मतदाताओं को जातियों के आधार पर भी रिझाने में लगे हुए हैं।

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केरल की राजनीति के प्रमुख चेहरे, Photo Credit: Social Media

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जिन राज्यों में इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं, उनमें एक नाम केरल का भी है। वही केरल जहां पिछले 10 साल से लेफ्ट गठबंधन की सरकार है और कांग्रेस अपनी वापसी के लिए पूरा जोर लगा रही है। हाल ही में तिरुवनंतपुरम में अपना मेयर बनाने के बाद उत्साह से लबरेज भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी दावा कर रही है कि मेयर के बाद वह अपना मुख्यमंत्री भी बनाने में कामयाब होगी। केरल देश के उन राज्यों में शुमार है जहां अभी तक BJP कभी भी सरकार नहीं बना पाई है। एके एंटनी और ओमान चांडी के बाद नई लीडरशिप के साथ मैदान में उतर रही कांग्रेस के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का चुनाव हो गया है क्योंकि पहले राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी इसी राज्य की वायनाड सीट से सांसद हैं।

 

14 जिलों, 20 लोकसभा सीटों और 140 विधानसभा सीटों वाला केरल कई पैमानों पर राज्य के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। हिंदुओं और मुस्लिमों के साथ-साथ केरल में ईसाई आबादी भी अच्छी-खासी है, यही वजह है कि पिछले कई साल से BJP जैसी हिंदुत्ववादी पार्टी भी चर्च से जुड़ने की कोशिश करती रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि केरल में जाति और धर्म का समीकरण क्या है।

केरल की जनसंख्या को समझिए

 

2011 की जनसंख्या के मुताबिक, केरल में 54.7 प्रतिशत आबादी हिंदू, 26.6 प्रतिशत मुस्लिम और 18.4 प्रतिशत आबादी ईसाई है। बाकी धर्मों के लोग सिर्फ 0.33 प्रतिशत हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में केरल में 2.77 करोड़ मतदाता थे जिसमें से 1.99 करोड़ लोगों ने वोट भी डाले थे। केरल की कुल 20 लोकसभा सीटों में से 18 पर कांग्रे की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (UDF) को जीत मिली थी। 

 

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हाल ही में हुए निकाय चुनावों में भी UDF ने एकतरफा जीत हासिल की और सत्ताधारी लेफ्ट के खेमे में खलबली मचा दी। ऐसे में अब चर्चा अलग-अलग समीकरणों पर होने लगी है। देशभर में अलग स्तर की सोशल इंजीनियरिंग करने के लिए मशहूर बीजेपी भी केरल में ईसाइयों और अलग-अलग जाति वर्गों को अपने साथ जोड़ने में जुटी हुई है। यही वजह है कि बीते एक दशक में केरल में जाति की राजनीति और तेज हुई है और अब लेफ्ट पार्टियां भी जाति के हिसाब से नेताओं को रिझाने में जुट गई हैं।

केरल का जाति समीकरण क्या है?

 

2011 की जनगणना के मुताबिक, केरल में लगभग 9.10 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति और 1.4 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति से है। केरल में सवर्ण हिंदू जाति नायर की आबादी लगभग 14 प्रतिशत, एझावा (हिंदू ओबीसी) की आबादी लगभग 23 प्रतिशत है। केरल में ईसाई आबादी 18.4 प्रतिशत है। केरल में इन जातियों के अपने बड़े सामाजिक संगठन हैं। उदाहरण के लिए एझावा संगठन है श्री नारायाण धर्म परिपालन (SNDP), जिसके मुखिया वेल्लापल्ली नतेसन हैं और नायरों का नायर सर्विस सोसायटी है जिसके मुखिया जी सुकुमारन नायर हैं। SNDP की पॉलिटिकल विंग का नाम भारत धर्म जन सेना (BDJS) है। नतेसन के बेटे इसके मुखिया हैं और यह पार्टी एनडीए का हिस्सा है। इसी तरह लैटिन कैथोलिक चर्च है जो ईसाइयों के संगठन भी माना जाता है।

 

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इन संगठनों का असर इतना है कि एक समय पर जाति और धर्म की राजनीति से दूर रहने वाला लेफ्ट भी आजकल इससे परहेज नहीं कर रहा। SNDP के नतेसन से पिनराई विजयन की करीबी के चलते सीपीआई और सीपीएम के बीच खटास भी पैदा हो गई है। सीपीआई चाहती है कि नतेसन जैसे नेता से दूरी बनाई जाए क्योंकि वह अक्सर मुस्लिमों के खिलाफ बयान देते रहे हैं। वहीं, नतेसन ने एलान किया है कि वह पिनराई विजयन को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए काम करेंगे।

पारंपरिक रूप से एझावा लेफ्ट के समर्थक रहे हैं और नायर कांग्रेस के साथ रहे हैं। हालांकि, केरल में नई एंट्री मारने वाली बीजेपी की नजर एझावा और नायर दोनों पर है और उसने दोनों को साधने की दिशा में काम भी किया है। इसके अलावा, ईसाइयों को अपने साथ लाने और दलितों को रिझाने के लिए भी बीजेपी खूब पसीना बहा रही है।

 

अगर नेताओं के हिसाब से जातियों को समझें तो केरल के मौजूदा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन एझावा हैं, तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर नायर हैं, पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी ईसाई हैं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के सी वेणुगोपाल नायर हैं, कांग्रेस के वीडी सतीशन नायर हैं, बीजेपी नेता राजीव चंद्रशेखर भी नायर हैं, बीजेपी सांसद सुरेश गोपी भी नायर ही हैं।

 

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