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'हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी' के नारे पर फिर उतरे राज ठाकरे, आखिर क्या था यह विवाद?

मुंबई में लगभग 60 साल पहले गूंजने वाला एक नफरती नारा फिर से चर्चा में है। इस बार इस नारे को उछाला है राज ठाकरे ने। समझिए क्या है इसके पीछे की कहानी।

raj thackeray during bmc election campaign

रैली को संबोधित करते राज ठाकरे, Photo Credit: PTI

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राज ठाकरे खुद को बाल ठाकरे का राजनीतिक वारिस माना करते थे। वही बाल ठाकरे जिन्होंने 'मराठी मानुष' का नारा देकर अपनी राजनीति चमकाई और 'हिंदुत्व की राजनीति' के सहारे मुंबई में शिवसेना को स्थापित किया। अब जब शिवसेना दो धड़ों में बंटी है और उद्धव ठाकरे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे वक्त में उन्हें अपने चचेरे भाई राज ठाकरे का साथ मिला है। वही राज ठाकरे जिन्हें उद्धव से ज्यादा कट्टर, तीखे बयान देने वाला और उग्र छवि का नेता माना गया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता अन्नामलाई के बारे में अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करने, यूपी-बिहार और हिंदी वालों को खदेड़ने की धमकी देने और 'हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी' के नारे के साथ राज ठाकरे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। उन्होंने दशकों पुरानी उसी राजनीति को फिर से छेड़ने की कोशिश की है जिसके चलते एक वक्त पर उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीयों और गुजरातियों तक को महाराष्ट्र में निशाना बनाया गया। 

 

महाराष्ट्र में हो रहे नगर निकाय चुनाव कों लिए साथ आए उद्धव और राज ठाकरे ने रविवार को एक संयुक्त रैली की। मुंबई की इस रैली में मराठी वोट बैंक को साधते हुए राज ठाकरे ने कहा कि दोनों भाई इसलिए साथ आए हैं क्योंकि मुंबई एक गंभीर खतरे का सामना कर रही है। दोनों नेताओं ने BJP पर मुंबई को 'लूटने' और इसे गुजरात से जोड़ने का प्रयास करने का आरोप लगाया।उन्होंने यह भी दावा किया कि मुंबई और महाराष्ट्र की संपत्तियां गौतम अदाणी की अगुवाई वाले ग्रुप को सौंपी जा रही हैं। राज ठाकरे ने आरोप लगाए कि 2014 में सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी सरकार लगातार अदाणी का पक्ष ले रही है। 

 

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15 जनवरी को होने वाले नगर निकाय चुनाव से पहले मुंबई की इस आखिरी संयुक्त रैली में उद्धव ठाकरे ने कहा कि उन्होंने और राज ठाकरे ने मराठी मानुष, हिंदुओं और महाराष्ट्र के लिए अपने मतभेदों को भुला दिया है। उन्होंने और राज ठाकरे ने खुद को मुंबई को बचाने के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में पेश किया। उन्होंने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का हवाला देते हुए कहा, 'दीर्घकालिक योजना मुंबई को गुजरात से जोड़ने की है। अगर बीएमसी हमारे पास रही तो वे अदाणी को जमीन नहीं बेच पाएंगे। यह मराठी मानुष का आखिरी चुनाव है। अगर उन्होंने अब कोई गलती की, तो मुंबई की लड़ाई हमेशा के लिए हार जाएंगे।’

बयानों का पर घिरे राज ठाकरे

 

हाल ही में मुंबई में BJP का प्रचार करने आए तमिलनाडु के नेता के अन्नामलाई के एक बयान पर खूब बवाल मचा था। उन्होंने कहा था, 'बॉम्बे सिर्फ महाराष्ट्र का एक शहर नहीं है, यह अंतरराष्ट्रीय शहर नहीं है।' इस पर शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस से पूछा था कि क्या वे इससे सहमत हैं कि मुंबई महाराष्ट्र का नहीं है? इसी मामले को लेकर रविवार को उद्धव ठाकरे ने सवाल पूछे कि क्या बीजेपी मुंबई का नाम बदलकर 'बंबई' रखना चाहती है? इस पर बीजेपी ने सफाई दी थी कि अन्नामलाई का कहने का मतलब कुछ और था, बस उन्होंने शब्द गलत चुन लिए।

 

वहीं, राज ठाकरे तो अन्नामलाई को घेरते हुए भाषाई शालीनता की सीमाएं लांघ गए। उन्होंने अन्नामलाई को 'रसमलाई' कहा और उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल भी मंच से ही किया। उन्होंने अन्नामलाई के लिए कहा, 'तुम्हारा महाराष्ट्र से क्या संबंध है? ऐसे ही लोगों के लिए बाला साहब कहते थे- हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी।'

 

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राज ठाकरे यही नहीं रुके। उन्होंने हिंदी बनाम मराठी का जिक्र छेड़ते हुए कहा, 'यूपी और बिहार के लोगों को समझना चाहिए कि हिंदी उनकी भाषा नहीं है। मैं किसी भाषा से नफरत नहीं करता लेकिन अगर आप इसे थोपने की कोशिश करोगे तो मैं लात मारकर भगाऊंगा। ये लोग हर तरफ से महाराष्ट्र आ रहे हैं और आप लोगों से आपका हिस्सा छीन रहे हैं। अगर जमीन और भाषा ही चली गई तो आप लोग खत्म हो जाएंगे। आज संकट आपके दरवाजे तक आ गया है। यह मराठी मानुष के लिए आखिरी चुनाव है, आपने इसे खो दिया तो आप खत्म हो जाएंगे।'

 

 

 

 

उन्होंने आगे कहा, 'मराठी और महाराष्ट्र के लिए एक हो जाओ। बहुत सारे लोगों के बलिदान के बाद मुंबई मिला है। हम उन्हें क्या जवाब देंगे? जो लोग बूथ लेवल एजेंट बनाए गए हैं वे चुनाव के दिन सुबह 6 बजे तैयार रहे हैं और अलर्ट रहें। लापरवाही न बरतें, अगर कोई भी आदमी दोबारा वोट देने आए तो, उन्हें उठाकर बाहर फेंक दें।'

 

अन्नामलाई का जवाब

 

राज ठाकरे के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अन्नामलाई ने कहा है, 'आदित्य ठाकरे और राज ठाकरे मुझे धमकी देने वाले कोन हौते हैं? इन लोगों ने सिर्फ मुझे गाली देने के लिए मीटिंग बुलाई थी। मुझे नहीं पता था कि मैं इतना अहम हो गया है। कुछ लोगों ने लिखा था कि अगर मैं मुंबई आऊंगा तो मेरे पैर काट देंगे। अगर मैं ऐसी धमकियों से डरता तो अपने गांव में ही बैठा रहता। अगर मैं कहता हूं कि कामराज भारत के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं तो इसका मतलब यह हो गया कि वह तमिल नहीं हैं? अगर मैं कहता हूं कि मुंबई वर्ल्ड क्लास सिटी है तो क्या इसका मतलब यह हो गया कि महाराष्ट्र के लोगों ने इसे नहीं बनाया? ये लोग सिर्फ इग्नोरैंट हैं।'

 

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क्या है 'हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी' वाला मामला?

 

दरअसल, बाल ठाकरे पहले एक कार्टूनिस्ट और पत्रकार हुआ करते थे। 1960 में गुजरात से अलग होकर महाराष्ट्र नया राज्य बना। भीतरी बनाम बाहरी की राजनीति चरम पर थी और मुंबई में तो देश के हर राज्य के लोग रहते थे। उस वक्त बाल ठाकरे ने मौका देखा और 'भीतरी बनाम बाहरी' की राजनीति को हवा देने की शुरुआत की। जब 1966 में उन्होंने शिवसेना का गठन किया तब दक्षिण भारतीयों के खिलाफ नारा दिया- 'उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी।' इस तरह वह मुंबई की मिलों में काम करने वाले दक्षिण भारतीयों को मुंबई से बाहर करना चाहते थे। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र और मुंबई के संसाधनों पर पहला हक मूल निवासियों यानी मराठियों का है।

 

बाल ठाकरे की यह बात तब सिर्फ नारे तक ही सीमित नहीं थी। 1970 के दशक में तमिल और तेलुगू भाषियों को मुंबई में निशाना बनाया गया और निशाना बनाने वाले लोगों ने अपनी पहचान 'शिवसैनिक' के रूप में स्थापित की। वही शिवसैनिक जो किसी के साथ मारपीट करने के बाद खुलकर इसे स्वीकार भी करते थे। उडुपी रेस्तरां और दक्षिण भारतीयों के घरों तक को निशाना बनाया गया। उन थिएटर्स पर हमले किए गए जिनमें तमिल, तेलुगू या मलयालम फिल्में दिखाई जाती थीं। बाल ठाकरे अपनी पत्रिका 'मार्मिक' में छपने वाले लेखों और कार्टून के जरिए भी अपनी इसी विचारधारा को हवा देते रहे। 

 

बाल ठाकरे दक्षिण भारतीय लोगों को 'यांडूगुंडा' कहते थे। सबसे पहले शिवेसना ने ट्रेड यूनियनों में कम्युनिस्टों का विरोध किया। उसी वक्त कृष्णा देसाई (कम्युनिस्ट पार्टी के नेता)  की हत्या हुई और आरोप शिवसेना पर लगे। इस सबका नतीजा यह हुआ कि 'मराठी मानुष' की भावना की समर्थक लोग शिवसेना के कट्टर समर्थक बनते गए। हालांकि, 1970 के बाद शिवसेना ने दक्षिण भारतीयों के विरोध की राजनीति छोड़कर हिंदुत्व की विचारधारा अपना ली थी और पूरे जोर-शोर से राम मंदिर आंदोलन के समर्थन में खड़ी दिखती थी। बाद में शिवसेना ने बीजेपी को भी साध लिया और उसके सहारे उत्तर भारतीयों को भी अपने पाले में ले आई।

क्या फायदा होगा?

 

दरअसल, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और बीजेपी के मजबूत गठबंधन के आगे शिवसेना (UBT) और MNS के लिए अस्तित्व बचाने की चुनौती है। यह बात राज और उद्धव ठाकरे के बयानों में तब नजर भी आती है, जब वे इस BMC चुनाव को 'मराठियों की आखिरी लड़ाई' कहते हैं। 2024 के विधानसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद शिवसेना (UBT) और MNS दोनों के सामने ही BMC का चुनाव खुद को मजबूत रखने की आखिरी लड़ाई है। लंबे समय से बीएमसी पर शिवसेना का कब्जा रहा है लेकिन अब शिवसेना दोफाड़ हो चुकी है और वह सत्ताधारी NDA से भी दूर हो चुकी है।

 

दूसरी तरफ, एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना न सिर्फ सत्ता में शामिल है बल्कि बीएमसी चुनाव में भी वह बीजेपी के साथ मिलकर लड़ रही है। ऐसे में उद्धव ठाकरे का 'असली शिवसेना' वाला दावा भी अब दांव पर है। लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे तो विधानसभा चुनाव में एकनाथ शिंदे की शिवसेना आगे रही थी। हालांकि, शिवसेना की असली पहचान बीएमसी से ही बनी थी ऐसे में इस चुनाव को ऐसे देखा जा रहा है कि यही तय करेगा कि 'असली शिवसेना' किसकी है।

बंबई का नाम मुंबई कैसे हुआ?

 

मौजूदा वक्त में मुंबई के नाम को लेकर भी बयानबाजी हो रही है। मौजूदा नाम मुंबई दो शब्दों मुंबा और आई से मिलकर बना है। आई मतलब मां और मुंबा मतलब मुंबई शहर के कोलियों और अन्य लोगों की पूज्यनीय मुंबा देवी। यह नाम आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल किए जाने से पहले भी चर्चा में था और बहुत सारे लोग इसका इस्तेमाल भी करते थे।

 

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लंबे समय से शिवसेना 'बॉम्बे' या 'बंबई' नाम का विरोध करती आ रही थी।  साल 1995 में जब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने तो बाल ठाकरे को मौका दिखा। उसी वक्त बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई कर दिया गया। 


लगातार छवि बदलने की कोशिश

 

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में अंतर यह है कि राज हमेशा आक्रामक मोड में रहते हैं जबकि उद्धव ठाकरे सौम्य छवि के नेता रहे। उद्धव ने बीजेपी संग सरकार चलाई तो कांग्रेस और एनसीपी संग जाकर मुख्यमंत्री भी बने। दूसरी तरफ राज ठाकरे अपनी उसी विचारधारा पर चलते रहे और महाराष्ट्र तो दूर वह मुंबई में भी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को मजबूत नहीं कर पाए। दूसरी तरफ, शिवसेना (UBT) ने अपनी छवि में इस कदर बदलाव किया कि मुंबई के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी उसके उम्मीदवारों को जीत मिली।

 

इसी क्रम में आदित्य ठाकरे एक बार लुंगी पहने भी नजर आए थे। कभी 'लुंगी हटाओ, पुंगी बजाओ' का नारा देने वाले बाल ठाकरे के पोते आदित्य ने इस अंदाज में वोट मांगकर यह संदेश देने की कोशिश की थी कि उनकी विचारधार सबको साथ लेकर चलने की है। हालांकि, अब राज ठाकरे के साथ आने के बाद फिर से शिवसेना-MNS गठबंधन ने 'मराठी मानुष' की विचाराधारा को तेजी से उछाला है। इसका फायदा कितना होगा यह 16 जनवरी को पता चल ही जाएगा।


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