पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 जारी है। पहले चरण के लिए वोटिंग 23 अप्रैल को हो गई है, जबकि 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग होनी है। इस बार बंगाल में तमाम मुद्दों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का रहा है। इसको लेकर टीएमसी, बीजेपी और चुनाव आयोग के बीच गहरा विवाद चल रहा है।  

 

एसआईआर के जरिए तकरीबन 91 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। इस लिस्ट में उन अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं जो पश्चिम बंगाल चुनाव में अधिकारी के तौर पर जमीन पर काम कर रहे हैं। यह हैरान करने वाला मामला है कि जो अधिकारी चुनाव करवा रहे हैं, उनका ही नाम वोटर लिस्ट से गायब है। 

 

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पीठासीन अधिकारी हुए वोट वंचित

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अजीजुल हक लगभग तीन दशकों से पश्चिम बंगाल में अलग-अलग चुनावों में पीठासीन अधिकारी रहे हैं। वह राज्य के उन 65 चुनाव अधिकारियों में से हैं जो सभी सरकार में रहकर चुनाव में काम किया है। इस बार भी कर रहे हैं। अजीजुल हक का इस बार वोटर लिस्ट से नाम कट गया है।

 

इन सभी 65 अधिकारियों ने बंगाल के वोटर लिस्ट से नाम हटाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अब इन अधिकारियों को कहा है कि सभी इसकी शिकायत SIR की शिकायत के लिए बनाए गए ट्रिब्यूनल के पास जाएं और उसके फैसले का इंतजार करें।

ट्रिब्यूनल की कछुआ चाल

दरअसल, 23 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग से पहले ट्रिब्यूनल अपने सामने पेंडिंग 34 लाख एप्लीकेशन में से लगभग 650 एप्लीकेशन को ही आगे बढ़ा पाया। इसमें से भी महज 139 नाम को वापस वोटर लिस्ट में जोड़ पाए। अब ट्रिब्यूनल के पास वर्तमान चुनाव के वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए दो दिन का ही समय बचा है।

 

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'मैं वोट नहीं दे सकता '

इंडियन एक्सप्रेस से अजीजुल हक ने कहा, 'यह बुरा है। मैं वोट नहीं दे सकता लेकिन मुझे नादिया जिले के पलाशीपारा विधानसभा इलाके में एक पीठासीन अधिकारी के तौर पर चुनाव कराने हैं। यहां 29 अप्रैल को वोटिंग होनी है।' हक नादिया जिले के कृष्णानगर कॉलेजिएट स्कूल में वरिष्ठ अध्यापक हैं।

चुनाव करवा सकते हैं, मगर...

इन चुनाव अधिकारियों का केस लड़ रहे वकील आदित्य समद्दर ने बताया कि यह स्थिति बहुत अजीब है। उन्होंने कहा कि इन सभी 65 अधिकारियों को उनकी सत्यापित चुनावी पहचान के आधार पर पोलिंग ऑफिसर के तौर पर नियुक्त किया गया है। वकील ने कहा, 'मेरे क्लाइंट वोट देने के लिए उतने भरोसेमंद नहीं पाए गए, लेकिन इतने भरोसेमंद पाए गए कि चुनाव में पीठासीन अधिकारी के तौर पर चुनाव कराने के लिए काम कर सकें। चुनाव कराने के लिए उन्हें सरकारी कर्मचारी के तौर पर वेरिफाई किया गया, लेकिन उनसे कहा गया कि वे अपना वोट नहीं डाल सकते।'