देश में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इन राज्यों की सत्ता में आने के लिए मेहनत कर रही है। इसी महीने होने वाले चुनाव के लिए वोटिंग होगी, जिसके नतीजे 4 मई का आएंगे। कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी चुनाव के लिए पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है। अब पार्टी ने सीनियर नेता राज्यों में चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने, सरकार की नाकामियों को बताने, बागियों को मनाने और बेहतर तालमेल बैठाने के लिए काम कर रहे हैं। वहीं, पार्टी उम्मीदवार अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच जाकर वोट मांग रहे हैं।
चुनावों में कांग्रेस की राज्य ईकाइ और पार्टी आलाकमान के बीच समन्वय की खास जरूरत होती है, जिसके लिए पार्टी चुनाव प्रभारियों को नियुक्त करती है। इन्हीं चुनावी प्रभारियों पर राज्य ईकाइ से तालमेल बिठाकर रणनीति बनाने से लेकर चुनाव जीताने की जिम्मेदारी होती है। इसलिए इन पार्टी सीनियर नेताओं को राज्यों में कांग्रेस का प्रभारी बनाकर भेजती है। यह नेता बहुत सीनियर होते हैं, खासतौर से यह रणनीति बनाने में माहिर होते हैं और संगठन को अच्छी तरह से समझते हैं।
मगर, पिछले दर्जनों चुनावों में देखने को मिला है कि कांग्रेस के चुनाव प्रभारी पार्टी को जीताने में नाकाम साबित हुए हैं। इस लिस्ट में ऐसे कई नेता हैं, जिन्हें कांग्रेस ने कई राज्यों में चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा, लेकिन वह कांग्रेस को विपक्ष से उठाकर सत्ता की कुर्सी पर नहीं बैठा पाए हैं। इसमें भंवर जितेंद्र सिंह, अविनाश पांडे, भक्त चरण दास और बीएम संदीप कुमार जैसे नेता शामिल हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि न प्रदर्शन न जनाधार फिर भी इन नेताओं को कांग्रेस राज्यों की कमान क्यों सौंपती है?
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भंवर जितेंद्र सिंह
भंवर जितेंद्र सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। वे वर्तमान में असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव जनरल सेक्रेटरी और चुनाव प्रभारी हैं। पार्टी के लिए रणनीति बनाने में माहिर जितेंद्र सिंह पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं। वह टीम राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में सबसे ऊपर शुमार किए जाते हैं, जो राजस्थान के अलवर जिले के शाही परिवार से आते हैं। वह 1998 और 2004 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में अलवर सिटी सीट से विधायक चुने गए थे। 2007 में उन्हें कांग्रेस का सचिव बनाया गया।
राहुल गांधी के राजनीतिक प्रोजेक्ट्स में सहयोग करने वाले जितेंद्र सिंह साल 2009 में अलवर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। पार्टी ने उन्हें गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया, बाद में उन्हें रक्षा और युवा मामलों एवं खेल मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार मिला। मगर, इसके बाद वह 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव बड़े वोटों के अंतर से हार गए। वह 2014 में अलवर से लोकसभा चुनाव 2.83 लाख और 2019 में लोकसभा चुनाव 3.29 लाख वोटों से हार गए थे।
असम में संगठनात्मक चुनौतियां
वर्तमान में वह असम में 2026 के चुनाव की तैयारी में लगे हुए हैं। असम में उन्हें संगठनात्मक चुनौतियों और आंतरिक कलह का सामना करना पड़ा है। उनके प्रभारी पद संभालने के बाद भूपेन बोरा और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रद्युत बोरदोलोई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। वह दोनों सीनियर नेताओं को पार्टी में रोक नहीं पाए, हालांकि, उन्हीं के नेतृत्व में असम की बीजेपी सरकार में महिला मंत्री नंदिता गार्लोसा ने कांग्रेस का दामन थामा है। इसके अलावा कई पूर्व बीजेपी विधायक भी कांग्रेस में शामिल हुए हैं। इस बार असम में टिकट बंटवारे में जितेंद्र सिंह की अच्छी-खासी भूमिका रही है।
ऐसे में भंवर जितेंद्र सिंह के सामने डबल चुनौती है। पहली चुनौती उनके सामने असम में कांग्रेस को जीत दिलवानी है और पार्टी की 10 साल बाद सरकार में वापसी करवानी है। जबकि उनकी दूसरी चुनौती खुद को साबित करना है। दरअसल, जितेंद्र सिंह इससे पहले 2021 असम विधानसभा चुनाव में भी प्रभारी थे। पिछला चुनाव कांग्रेस उनके नेतृत्व में हार गई थी। वह उस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी थे और असम चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति व संगठनात्मक जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
इस बार पार्टी ने उनके ऊपर फिर से भरोसा जताकर सरकार बनवाने की जिम्मेदारी सौंपी है। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में असम में कांग्रेस को 3 सीटें मिली थीं। यह सीटें 2019 जितनी ही थीं इसलिए पार्टी के प्रदर्शन में कोई खास सुधार नहीं हुआ। जितेंद्र सिंह इससे पहले मध्य प्रदेश के भी चुनाव प्रभारी रह चुके हैं। कुल मिलाकर, प्रभारी रहते हुए जितेंद्र सिंह कोई बड़ी चुनावी जीत नहीं दिलवा पाए हैं।
गिरीश चोडांकर
गिरीश राया चोडांकर को कांग्रेस आलाकमान ने तमिलनाडु का चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा है। वह मूल रूप से शिक्षक रहे हैं। तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के साथ में वह पुडुचेरी के भी प्रभारी हैं। इन दोनों ही राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। वह गोवा से ताल्लुक रखते हैं और कांग्रेस की युवा कांग्रेस से राजनीति में आए हैं। चोडांकर कांग्रेस में संगठन के मंझे हुए खिलाड़ी और टीम राहुल गांधी के नेता हैं।
वह गोवा प्रदेश युवा कांग्रेस के महासचिव और अध्यक्ष रहे चुके हैं। इस दौरान उन्होंने युवा संगठन और जमीन पर मजबूती किया। वह NSUI के भी राष्ट्रीय प्रभारी रह चुके हैं। 2013 से ही वह राहुल गांधी के कार्यालय के साथ निकटता से काम कर रहे हैं। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया। बाद में उन्हें गोवा प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष 2023 से कांग्रेस वर्किंग कमेटी के स्थायी आमंत्रित सदस्य हैं।
मगर, चुनाव लड़कर जीतने के मामले में वह बहुत कमजोर नेता रहे हैं। गिरीश चोडांकर 1995 में मारगांव म्यूनिसिपल काउंसिल से पहली बार चुनाव जीते थे। इसके बाद चोडांकर 2002 में मारगांव से गोवा विधानसभा हार गए थे। 2017 में पणजी उपचुनाव में वह बीजेपी नेती रहे मनोहर पर्रिकर से 4,803 वोटों से हार गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में वह नॉर्थ गोवा से हारे बीजेपी के श्रीपाद नायक से हार गए थे।
गिरीश चोडांकर के पास तमिलनाडु जिम्मेदारी है। उनके सामने तमिलनाडु में कांग्रेस को बेहतर जीत दिलाने के साथ में डीएमके के साथ में तालमेल बिठाकर रणनीति बनाने की चुनौती है। इसी गठबंधन में रहते हुए पार्टी के सम्मान को बचाए भी रखना है और राज्य में कांग्रेस का विस्तार करना है। साथ ही केरल में गठबंधन के साथियों के साथ तालमेल बिठाकर पार्टी को जीत दिलानी है।
बीएम संदीप कुमार
बीएम संदीप कुमार कांग्रेस के एक वरिष्ठ संगठनिक नेता हैं। पार्टी ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। उनके पास केरल का प्रभार है। पार्टी ने उन्हें केरल में दीपा दासमुंशी के साथ सह प्रभारी बनाकर भेजा है। इससे पहले बीएम संदीप कुमार महाराष्ट्र के कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव के साथ में राज्य के को-इन-चार्ज रह चुके हैं। उनके समय में 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें पार्टी को 16 सीटें ही मिली थीं। मूल रूप से कर्नाटक के चिकमंगलूर के रहने वाले संदीप कुमार महाराष्ट्र के अलावा 2022 में गुजरात के अलावा दादरा एवं नगर हवेली, दमन-दीव में कांग्रेस सचिव के रूप में संगठनिक प्रभारी रह चुके हैं। वह दक्षिण गुजरात चुनाव के चुनाव प्रभारी। इस चुनाव में वह गुजरात कांग्रेस के प्रभारी रघु शर्मा के जूनियर के तौर पर नियुक्त किया गया था।
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बीएम संदीप कुमार ने लंबे समय तक कांग्रेस के युवा संगठन इंडिन यूथ कांग्रेस में काम किया है। वे मूल रूप से कर्नाटक से हैं। उन्होंने किसी अन्य राज्य के पूर्ण प्रभारी के रूप में काम नहीं किया है लेकिन कांग्रेस आलाकान ने उन्हें केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों का प्रभारी बनाया है। उनकी भूमिकाएं समय-समय पर बदलती रहती हैं। उन्होंने कोई बड़ा चुनाव भी नहीं लड़ा है। ऐसे में संदीप कुमार के सामने अपने आपको प्रूफ करने की चुनौती है।
अविनाश पांडे
इसी तरह से उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में अविनाश पांडे कांग्रेस के प्रभारी हैं साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। दिसंबर 2023 में उन्हें प्रियंका गांधी वाड्रा की जगह यूपी का प्रभार सौंपा गया था। उनके सामने देश के सबसे बड़े सियासी राज्य यूपी में पार्टी को फिर से खड़ा करने की चुनौती है। अविनाश पांडे महाराष्ट्र के नागपुर से आते हैं। नागपुर ईस्ट सीट से वह कांग्रेस के टिकट पर 1985-1990 तक विधायक रहे।
2008 में वह महाराष्ट्र से राज्यसभा चुनाव लड़े लेकिन राहुल बजाज से एक वोट से हार गए। इसके बाद वह 2010-2016 तक महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद रहे। उन्होंने महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव जैसे पद संभाल चुके हैं। अविनाश पांडे के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया है। यूपी में वह समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल बिठाकर कांग्रेस का विस्तार करने पर जोर दे रहे हैं। कुल मिलाकर अविनाश पांडे कांग्रेस के एक अनुभवी संगठनकर्ता माने जाते हैं और पार्टी की कई कमेटियों में सक्रिय रहे हैं।
