असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचार करते हुए कहा कि बंगाल, असम और बिहार में अगले 20 साल तक डेमोग्राफी चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनी रहेगी। हिमंता अपने चुनाव प्रचार में रोहिंग्या, बांग्लादेशी मुसलमान और डोग्राफी वाली बहस से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। उनका चुनाव प्रचार, इन्हीं मुद्दों के इर्दगिर्द घूम रहा है।
हिमंता बिस्व सरमा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर आरोप लगाया कि ममता बनर्जी बांग्लादेशी मुसलमानों की ज्यादा पक्षधर हैं। हिमंता बिस्व सरमा का कहना था कि राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी में ज्यादातर बांग्लादेशी मुसलमान हैं, जिसका फायदा TMC को मिलता है।
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हिमंता बिस्व सरमा, मुख्यमंत्री, असम:-
मैं कभी हिंदू-मुस्लिम नहीं करता, सिर्फ बांग्लादेशी मुसलमानों की बात करता हूं। बंगाल में हिंदू और मुसलमान दोनों बदलाव चाह रहे हैं।
TMC ने हिमंता के खिलाफ दर्ज कराई शिकायत
TMC ने हाल ही में सरमा के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत की थी और उन्हें सांप्रदायिक भड़काऊ बयान देने का आरोप लगाया था। हिमंता बिस्व सरमा ने इन आरोपों से इनकार किया था और कहा कि कुछ लोग उनके बयानों में से बांग्लादेशी शब्द को जानबूझकर छोड़ देते हैं।
हिमंता बिस्व सरमा, मुख्यमंत्री, असम:-
दिल्ली में रहने वाले लोग, इस बात को महसूस नहीं करते, लेकिन यहां के मूल निवासी हर रोज इसका असर झेल रहे हैं।
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रोहिंग्या, डेमोग्राफी और मुसलमान की बात क्यों कतरे हैं हिमंता?
हिमंता बिस्व सरमा की राजनीति के केंद्र में अब डेमोग्राफी है। उन्हें लगता है कि असम के मूल निवासियों के बीच बांग्लादेशी घुसपैठिए घुस गए हैं, जो अब चुनाव में हार जीत तय करते हैं। असम, बांग्लादेशी घुसपैठियों का गढ़ बन गया है, क्योंकि बंगाल से उन्हें बिना किसी रोक-टोक के देश में आने दिया जाता है।
हिमंत बिस्व सरमा, इसे 'असमिया पहचान' के लिए खतरा मानते हैं। हिमंता, हिंदू मतदाताओं और मूल निवासियों को एक मंच पर लाने में सफल रहे हैं। रोहिंग्या और संदिग्ध प्रवासियों के मुद्दे को उठाकर वे खुद को 'असमिया हितों के रक्षक' के रूप में पेश करते हैं। वह अब बीजेपी के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में हिंदुत्व के नए पोस्टबॉय हैं।
असम में साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की कुल आबादी में करीब 35 फीसदी मुसलमान हैं। असम में कुल विधानसभा सीटों की संख्या 126 है। 30 से ज्यादा सीटों पर मुसलमान वोटर जीत हार तय करते हैं। अगर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण न हो तो हिमंता बिस्व सरमा का सत्ता में टिक पाना मुश्किल है।
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कैसे सियासी 'जुमले' कर रहे हिमंता की मदद?
हिमंत बिस्व सरमा पर आरोप लगते रहे हैं कि उनकी नीतियां मुस्लिम विरोधी हैं। वह मदरसों को बंद कराते हैं, इस्लामिक बाल विवाह के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, मदरसों के आधुनिकीकरण पर जोर देते है। वह भाषाई और जातीय सीमाओं से उठकर एक बड़ा हिंदू वोट बैंक तैयार कर चुके हैं। असम में असदुद्दीन ओवैसी और बदरुद्दीन अजमल जैसे नेताओं की मौजूदगी, हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण में उनकी और मदद करती है।
हिमंता की शैली आक्रामक है, उन्हें लोग एक साहसी नेता के तौर पर देखते हैं। वह विकासवादी राजनीति पर जोर रहे हैं लेकिन उनकी पिच धर्म के इर्दगिर्द ही घूमती है। ध्रुवीकरण के अलावा वह असम के बाहरी राज्यों में जब जा रहे हैं तो लाभार्थी योजनाओं पर भी जोर दे रहे हैं। अगर उनके चुनावी भाषणों को उनके ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्कैन करें तब भी उनकी राजनीति का आधार, यही जुमले नजर आते हैं।
