किसी जामाने में ईरान का नाम, फारस हुआ करता था। ईरान की संस्कृति, रोमन और मिस्र की संस्कृति से कम समृद्ध नहीं रही। ईरानी संगीत, कला, सभ्यता और संस्कृति का असर, शायद ही दुनिया का कोई ऐसा देश हो, जहां न हो। यह देश 1200 साल तक, पश्चिमी एशिया का सबसे प्रमुख देश रहा। अचमेनिद, पार्थियन और सासानी साम्राज्य की जमीन रहा यह देश, आज सुलग रहा है।
 

अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया है। वजह एक नहीं, कई हैं। ईरान पर कट्टरपंथी इस्लामिक देश होने का ठप्पा लगा है। यह ठप्पा, ईरान ने खुद पर लगाया है। साल 1979 में हुई एक शिया इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने इसे हासिल किया है। एक वजह यह भी है कि ईरान परमाणु शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है, जिसे इजरायल अपने लिए खतरा मानता है। 

क्या होता, अगर ईरान कट्टरपंथी देश न होता, गणतंत्र होता, धर्मनिरपेक्ष देश न होता? क्या आज जिस तरह के हालात ईरान में हैं, वैसे ही होते, क्या तब भी ईरान, इजरायल की आंखों की किरकिरी बनता? ऐसे कई सवाल अब लोग पूछ रहे हैं। आइए जानते हैं कहानी उस इस्लामिक क्रांति की, जिसके बाद ईरान, दशकों पहले चला गया है।  

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 साल 1979 की इस्लामिक क्रांति क्या थी?

ईरान की क्रांति को इस्लामिक स्कॉलर, इस्लामिक क्रांति बताते हैं। यह क्रांति 1978-79 से बी भड़की। ईरान में एक बड़े तबके को ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता रास नहीं आती थी। वह धर्मनिरपेक्ष छवि के व्यक्ति थे, जिनकी कट्टरपंथी इस्लाम से दूरी थी। क्रांति इस हद तक उग्र हुई थी कि 11 फरवरी 1979 को राजशाही खत्म हो गई। इसके बाद ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई। इस क्रांति में ईरान के हर वर्ग के लोग शामिल हुए। 

 

इस्लामिक क्रांति, सुधार लाने के लिए हुई थी। आम जनता इस क्रांति के लिए जमीन पर उतरी थी। लोग शाह, रजा पहलवी के खिलाफ सड़क पर उतर आए थे। उनका कहना था कि रजा पहलवी, अमेरिका और ब्रिटेन के इशारे पर काम करते हैं। दोनों देश मिलकर ईरान पर हस्तक्षेप करते हैं।  

ईरान के शाह मोहम्मद पहलवी और उनकी पत्नी। Photo Credit: Social Media

कितनी पुरानी है इस्लामिक क्रांति?

ईरान में क्रांति की शुरुआत साल 1905 से 1911 के बीच में हुई थी। लोग लोकतंत्र की मांग के लिए सड़कों पर उतरे लोग सुधार चहाते थे। विदेशी ताकतों ने दखल दिया। साल 1921 तक रजा शाह पहलवी को ब्रिटेन की मदद से सत्ता भी मिल गई। 1941 में ब्रिटेन और रूस ने उन्हें हटा दिया और उनके बेटे मोहम्मद रजा शाह को गद्दी पर बिठाया। 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया। अमेरिका और ब्रिटेन को यह रास नहीं आया। दोनों ने मिलकर तख्तापलट कर दिया और शाह की सत्ता मजबूत कर दी।

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शाह, ईरान को बना रहे थे यूरोप, ऐतराज किसे था?

मोहम्मद रजा पहलवी, उदारवादी  शासक थे। वह ईरान में 'श्वेत क्रांति' ला रहे थे। उन्हें आधुनिकरण पसंद था। वह महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देना चाहते थे, जमीन सुधार करना चाहते थे। फैक्ट्रियां, उद्योग, नए शहर और आधुनिकीकरण वहां पहुंचा दिया, जहां की किसी ने कल्पना भी नहीं थी। धीरे-धीरे ईरान की अर्थव्यवस्था बेहतर होने लगी थी। 

आम लोगों की शिकायत यह रही कि ईरान की समृद्धि का फायदा सिर्फ अमीरों और शाह को हुआ। उनके करीबियों को लाभ मिला, आम जनता गरीब रही। गांवों से लोग शहर आए, बेरोजगारी बढ़ी, महंगाई बढ़ी और पश्चिमी संस्कृति फलने-फूलने का मौका मिला।

ईरान का अमीर वर्ग, इसे अपनी संस्कृति पर हमला मानता था। मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता का विरोध होने लगा। विरोध दबाने के लिए शाह ने सख्ती दिखाई। इस्लामिक कट्टरपंथी और राष्ट्रवादी लोगों की गिरफ्तारियां हुईं, कई मौतें हुईं। राजनीतिक पार्टियों के अस्तित्व को नकार दिया गया। आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी को साल 1964 में निर्वासित कर दिया गया। 

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ईरान में सार्वजनिक स्थल पर महिलाओं के बिना बुर्का जाने पर रोक है। Photo Credit: PTI

तेल का खेल, जिसने लिखी तबाही की कहानी 

साल 1970 के दशक में तेल की कीमतें ऊपर गईं। ईरान की अर्थव्यवस्था डगमगाई, महंगाई बढ़ी और लोगों की जिंदगी मुश्किल हो गई। आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी सरकार की जमकर आलोचना करते। वह पहले इराक में रहे, फिर फ्रांस चले गए। शाह के खिलाफ वह अक्सर बोलते। उनकी टेप रिकॉर्डिंग, लेख और किताबें ईरान में पहुंचते रहे।  आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने शाह को अमेरिका का गुलाम और इस्लाम-विरोधी बताया। गरीब, बेरोजगार और धार्मिक लोगों को आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी की बात सही लगी। उन्हें अपा जनसमर्थन मिला। उनके पीछे खड़े हो गए। 

आंदोलन क्यों उग्र हुआ? 

जनवरी 1978 तक ईरान में हालात बिगड़ने लगे। आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के खिलाफ खूब खबरें चलाई गईं। उनके समर्थक इसे लेकर भड़क गए। वह तब तक ईरान के इस्लामिक चेहरे हो गए थे। ईरान की उदारवादी नीतियां, बहुसंख्यक शिया आबादी को खटकने लगी थी। इन आंदोलनों में पुलिस ने गोली चलाई, कई मारे गए। प्रदर्शनकारियों का दमन हुआ। लोग अल्लाह के नाम के नारे लगाते, सरकारी अधिकारियों को मारते। धीरे-धीरे विरोध एक जन आंदोलन में बदल गया।

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आयतुल्ला खामेनेई की मौत पर भारत में शिया मुसलमानों ने प्रदर्शन किया है। Photo Credit: PTI

सितंबर 1978 में तेहरान में सैन्य शासन लगा दिया। जुमे के दिन सैकड़ों लोगों को पर गोलियां चलाई गईं। कई लोग मारे गए। सरकारी कर्मचारी, तेल के कुंए में काम करने वाले मजदूर हड़ताल पर चले गए। तेल उत्पादन ठप पड़ गया। दिसंबर 1978 तक लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने इसे मौके के तौर पर देखा। वह विदेश से ही उन पर इस्तीफे का दबाव बनाने लगे। 

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1978 तक खुमैनी की लोकप्रियता अपने शिखर पर पहुंच गई थी। Photo Credit: Social Media

आंदोलन इतने उग्र हुए कि शाही दरबार पर संकट मंडराने लगा। लोग उन्हें ढूंढकर मारना चाहते थे। ईरान के शाह को लगा कि अब यहां रुके तो मार दिए जाएंगे। जनवरी 1979 में उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई। उनकी गैरमौजूदगी में 1 फरवरी 1979 को आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने ईरान आने का प्लान बनाया। करोड़ों लोग उनके स्वागत में उमड़ पड़े। 11 फरवरी को सेना ने आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी को समर्थन दिया। सेना तटस्थ रही और शाह की सत्ता का अंत हो गया। 

यूरोप कल्चर वाला ईरान, बर्बाद कैसे हुआ?

अप्रैल 1979 ईरान की इस्लामिक क्रांति पर जनमत संग्रह हुआ। लोगों ने इस्लामिक गणराज्य बनने का फैसला किया। आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने 'विलायत-ए-फकीह' की व्यवस्था लागू की। शिया परंपरा में ऐसी मान्यता है कि इमाम के न  रहने पर, एक सर्वोच्च नेता को चुना जाए, वह धर्म का प्रकांड विद्वान हो, उसे ही सरकार चलाने का हक हो। यह एक राजनीतिक-धार्मिक शासन चलाने के लिए जरूरी है। फकीह को हिंदू में न्यायविद् या कानून का जानकार कहा जा सकता है। इस्लाम के संदर्भ में इसे कुरान का जानकार कह सकते हैं। 

ईरान की शासन व्यवस्था में 'सुप्रीम लीडर' को  रहबर कहा जाता है। राज्य के सारे अहम अधिकार, विलायत-ए-फकीह के पास ही होता है। शुरुआती दिनों में वामपंथी, राष्ट्रवादी और उदारवादियों ने खुमैनी को समर्थन दिया लेकिन जल्द ही उनकी कट्टरपंथी नीतियों की वजह से ये लोग हाशिए पर पहुंच गए। 

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महसा अमीनी ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में मार दी गईं थीं। Photo Credit: PTI

क्रांति ने क्या-क्या छीन लिया?

ईरान महिलाओं के लिए तालिबान जैसा हो गया। जिस ईरान में महिलाओं को आजादी थी, छोटे कपड़े पहनकर घूम सकती थीं, सार्वजनिक स्थलों पर उनके आने-जाने पर रोक नहीं थी, बुर्के पहनने या सिर ढकने की बाध्यता नहीं थी। आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने पहले इस पर ही रोक लगाई। पश्चिमी संस्कृति पर पाबंदी लगी। शराब, सिगरेट पर प्रतिबंध रहे। फिल्मों पर सेंसर लगा। 

ईरान के बुरे दिन कैसे आए?

नवंबर 1979 की बात है। अमेरिकी दूतावास पर ईरान के लोग चढ़ गए। करीब 52 अमेरिकियों को ईरानी क्रांतिकारियों ने 444 दिनों तक बंधक बना दिया।  इसे इतिहास में 'ईरान होस्टेज क्राइसिस' के नाम से लोग आज भी याद करते हैं। यहीं से अमेरिका और ईरान दुश्मनी और गहरी हो गई। क्रांति के बाद ईरान में बदलाव आए। शाह के दौर की आधुनिकीकरण रुकी, इस्लामी नियम सख्त हुए। इतने सख्त कि तालिबान और ईरान में कोई अंतर नहीं रह गया। 


इस्लामिक क्रांति, ईरान के विकास के लिए नासूर बन गई। राष्ट्रपति चुनाव होते रहे, राष्ट्राध्यक्ष बदलते रहे लेकिन ताकत सिर्फ सुप्रीम लीडर के पास रही। साल 2009 में राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप पर बड़े विरोध हुए। साल 2019 और 2022 में भी इस्लामिक शासन व्यवस्था के खिलाफ क्रांति भड़की। साल 2025 से 2026 तक ईरान में सरकार विरोधी विरोध प्रदर्शन हुए। सैकड़ों लोग मारे गए। अयातुल्ला खामेनेई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे, उन पर गोलियां चलाई गईं। 

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ईरान की महिलाएं, इस्लामिक शासन से बाहर निकलना चाहती हैं। Photo Credit: PTI

जून जून 2025 में भी 12 दिनों की जंग छिड़ी। इजरायल और अमेरिका की तरफ से ईरान पर हमला बोला गया। किसी तरह सहमति बनी, इजरायल को बड़ा नुकासन हुआ। ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट बताती है कि 28 दिसंबर को तेहरान से विरोध प्रदर्शन भड़के, देखते ही देखते 31 प्रांतों में प्रदर्शन शुरू हो गए। 

प्रदर्शनकारी इस्लामी गणराज्य और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन खत्म करने की मांग करने लगे। सरकार विरोधी प्रदर्शनों में 10,600 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 496 प्रदर्शनकारी मारे गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो ईरान को इसका अंजाम भुगतना होगा। ईरान अंजाम अब भुगत रहा है। 

ईरान की महिलाओं ने बाल काटकर अपना विरोध प्रदर्शन जताया था। तस्वीर 2025 की है। Photo Credit: PTI

अब आगे क्या?

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया। शनिवार को ईरान के सु्प्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई मारे गए। ईरान में आंतरिक कलह अपने चरम पर है। उनकी मौत पर ईरान के लोगों ने ही जश्न मना रहे हैं। लोग इस्लामिक क्रांति के सबसे बड़े चेहरे के खत्म होने से खुश हैं। शिया इस्लाम में भरोसा करने वाले लोग, आयतुल्ला खामेनेई की मौत पर रो रहे हैं। भारत के शिया मुसलमानों ने कश्मीर से लेकर लखनऊ तक प्रदर्शन किया है। 

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ईरान के निर्वासित प्रिंस रजा पहलवी। Photo Credit: PTI

उम्मीद क्या है?

आयतुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद IRGC ने इस्लामिक क्रांति की रक्षा के लिए मरते दम तक लड़ने का एलान किया है। ईरान की सेना, सुप्रीम लीडर की मौत का बदला चाहती है। ईरान, एक साथ खाड़ी के देशों पर हमला कर रहा है। ईरान की एक बड़ी आबादी, अब इस्लामिक रिपब्लिक से मुक्ति चाहती है। शाह का शासन, इस्लामी शासन से उदार और बेहतर था।

 

कुछ लोग, शाह के उत्तराधिकारी और निर्वासित प्रिंस रजा पहलवी के शासन की मांग कर रहे हैं। वह उम्मीद में भी हैं। ईरान में डोनाल्ड ट्रंप, 'रिजीम चेंज' की बात कह रहे हैं। ईरान के लोग बेहतर जिंदगी, आजादी और धर्म की कम दखल की मांग कर रहे हैं। अभी ईरान राजनीतिक अस्थिरता के चरम पर है, अभी स्थितियां सामान्य होती नजर नहीं आ रही हैं।