वेनेजुएला के तेल के बाद अब अमेरिका की निगाह रूसी तेल पर है। अमेरिका ने पिछले साल रूस की रोसनेफ्ट और लुकोइल समेत कई तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया था। अब खबर आ रही है कि इन कंपनियों की विदेशी संपत्ति को जब्त करने की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है। उधर, बुधवार को अमेरिका ने ब्रिटेन की मदद से अटलांटिक महासागर में रूसी झंडे वाले तेल टैंकर को जब्त किया है।

 

रूस ने भी जहाज को जब्त करने की पुष्टि की। इस कदम के बाद से रूस और अमेरिका के बीच तनाव है। रूसी परिवहन मंत्रालय ने इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का उल्लंघन बताया। अगर अमेरिका और रूस के बीच मौजूदा तनाव बढ़ता है तो इसका खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना पड़ सकता है। आइए एक नजर डालते हैं कि ट्रंप प्रशासन के इस जोखिम भरे कदम के क्या-क्या खतरे हैं?

 

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टकराव की आशंका: रूसी जहाज के जब्त करने के बाद अमेरिका और रूस के बीच सैन्य टकराव की आशंका भी बढ़ गई। रूस ने अपने टैंकरों की सुरक्षा की खातिर पनडुब्बियों की तैनाती की है। यहां तक की अपनी नौसेना भेजी है। अगर अमेरिका जब्ती की कार्रवाई को बार बार दोहराता है तो समुद्र रणभूमि में बदल सकते हैं, क्योंकि अमेरिका ने पहले ही प्रतिबंधों से रूस की आय काफी हद तक सीमित कर दी है। अब अगर शैडो फ्लीट को निशाना बनाया गया तो यह सैन्य टकराव की वजह बन सकता है।

 

बढ़ेंगी तेल की कीमतें: अमेरिका अभी तक रूस की दो-तिहाई तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। इन कंपनियों के साथ व्यापार करने वाली अन्य कंपनियों पर भी द्वितीयक प्रतिबंध की धमकी दी है। इस कारण कई कंपनियां डर गई हैं और रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति कम हो गई। इसका असर यह हुआ कि प्रतिबंध के बाद से दिसंबर तक तेल की कीमतों में प्रति बैरल 5 डॉलर का इजाफा हो चुका है। अगर अमेरिका लगातार रूसी टैंकरों को निशाना बनाता है तो आपूर्ति में और भी बाधा आएगी। नतीजा यह होगा कि तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।

 

जवाबी कार्रवाई की आशंका: दुनियाभर में आशंका जताई जा रही है कि रूस अमेरिकी झंडे वाले जहाजों पर जवाबी कार्रवाई कर सकता है। आशंका यह भी है कि चीन भी रूस का साथ दे सकता है। अगर ऐसा हुआ तो तनाव बढ़ना तय है। इस एक वजह यह है कि रूसी तेल टैंकर पर अमेरिकी एक्शन की निंदा करने वाला चीन इकलौता देश है। उसे डर है कि भविष्य में उसके भी तेल टैंकरों को निशाना बनाया जा सकता है। 

 

चीन को निशाना बना सकता अमेरिका: चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। ट्रंप प्रशासन ने वैसे तो चीन के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया है। मगर वेनेजुएला मामले के बाद से उसके हौसले बुलंद है। इस बात की संभावना अधिक है कि प्रशांत और दक्षिण चीन सागर पर अमेरिका रूस से चीन जाने वाले तेल टैंकरों को निशाना बना सकता है, क्योंकि अमेरिकी की असली रणनीति लैटिन अमेरिका और यूरोप में चीन और रूस के प्रभुत्व को कम करके प्रशांत क्षेत्र में घेरने की है। 

 

ब्रिटेन से बिगड़ सकते रिश्ते: ब्रिटेन ने खुलासा किया है कि रूसी जहाज को जब्त करने में उसकी सेना ने अमेरिका की मदद की। बुधवार को ही ब्रिटेन के रक्षा सचिव जॉन हीली ने बताया कि ब्रिटिश सेना ने अमेरिकी अभियान का समर्थन किया। हालांकि ब्रिटिश सैनिक जहाज पर नहीं चढ़े थे। रूस ब्रिटेन की इस हरकत को उकसावे वाली मान सकता है। अगर ऐसा हुआ तो रूस और ब्रिटेन के रिश्ते खराब हो सकते हैं। 

 

पटरी से उतर सकती शांति वार्ता: यह घटना बेहद अहम इसलिए है, क्योंकि अमेरिका ने पहली बार किसी रूसी जहाज को जब्त किया है। खासकर तब जब यूक्रेन युद्ध में शांति की संभावना तलाशी जा रही है। यह घटना रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को नाराज कर सकती है, क्योंकि यूक्रेन ने इसकी तारीफ की है। इससे ट्रंप की शांतिदूत बनने की कोशिश को झटका लग सकता है।  

क्या है पूरा मामला?

अमेरिका ने बुधवार को जिस जहाज को पकड़ा है, उसका नाम मैरिनेरा है। पहले इसे बेला-1 के नाम से जाना जाता था। अमेरिका का आरोप है कि यह टैंकर ईरान और वेनेजुएला का तेल सप्लाई कर रहा था। इससे अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन हो रहा था। अमेरिका ने अपने तर्क में कहा कि जहाज पर झूठा झंडा लगा था। यह राज्यविहीन था। जवाब में रूस ने कहा कि 24 दिसंबर को ही इस जहाज को रूसी झंडा इस्तेमाल करने की अनुमति मिल गई थी। रूस ने कहा कि किसी भी देश को किसी अन्य देश के अधिकार क्षेत्र में पंजीकृत जहाज को बलपूर्वक जब्त करने का अधिकार नहीं है।

भारत को कितना जोखिम?

ट्रंप प्रशासन भारत को रूसी तेल के मुद्दे पर लगातार निशाना बना रहा। हाल ही में एक नया बिल लाया जा रहा है। इसमें भारत समेत रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसद टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। अमेरिका ने भारत पर पहले ही 50 फीसद टैरिफ लगा रखा है। अमेरिका अधिकारियों ने भारत पर रूस को युद्ध फंडिंग का आरोप लगाया है। अब एक खतरा यह भी है कि अगर रूस से भारत तेल खरीदता है तो अमेरिका भारतीय टैंकरों के खिलाफ भी जब्ती की कार्रवाई कर सकता है, क्योंकि रूस की दो बड़ी कंपनियों पर उनसे पहले से ही प्रतिबंध लगा रखा है। बहाने में अमेरिका यह कहा सकता है कि इन टैंकरों के माध्यम से प्रतिबंधों का उल्लंघन किया जा रहा था।

 

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क्या होते हैं शैडो फ्लीट?

अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत समेत कई देशों ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है। मगर रूस आज भी शैडो फ्लीट के माध्यम से चीन समेत कई देशों को तेल बेचता है। शैडो फ्लीट का इस्तेमाल प्रतिबंध से बचने में किया जाता है। इन जहाजों पर झूठी पहचान और झंडे का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि प्रतिबंधों से बचा जा सके। एसएंडपी ग्लोबल के मुताबिक दुनियाभर में हर 5 में से 1 एक टैंकर का इस्तेमाल प्रतिबंधि देशों से तेल ले जाने में होता है। अगले 50 फीसद शैडो फ्लीट रूसी तेल ले जाते हैं। मतलब साफ है कि इन फ्लीट पर रूस की निर्भरता खूब है। 

काला सागर पर एक और रूसी टैंकर पर हमला

बुधवार को अमेरिका द्वारा रूसी टैंकर को जब्त करने के बाद काला सागर पर एक और रूसी तेल टैंकर पर हमला हुआ है। बताया जा रहा है कि यह जहाज रूस के नोवोरोस्सियस्क बंदरगाह जा रहा था। तुर्की के तट के करीब जहाज पर हमला हुआ है। इस पर पलाऊ का झंडा लगा था। इसका नाम एलबस बताया जा रहा था। ड्रोन से इसे निशाना बनाया गया है। कुछ दिन पहले भी एक रूसी टैंकर पर ही काला सागर में हमला हो चुका है। उसकी जिम्मेदारी यूक्रेन ने ली थी।